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खानदान 60

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सुनीता पिताजी की कोई भी मदद न होने के कारण बहुत ही दुखी हो गई थी। मायका मुसीबत में होने के कारण चाह कर भी कोई भी मदद नहीं कर पा रही थी, सुनीता अपने परिवार की। अंदर ही अंदर बहुत शर्मिंदगी महसूस हो रही थी.. सुनीता को। “ रमेश बता रिया था.. चौधरी.. दो लाख रुपये मांगें था.. मैंने बोल दिया, रमेश ताईं.. उसके तो रिश्तेदार करोड़पति सें.. उन धोरे ले लेगा!” दर्शनाजी ने सुनीता के आगे कहा था।

सुनीता सारी कहानी समझ गई थी,” माँ का खुट्टा है..!” मन ही मन बोली थी।

मन से हारी-थकी सुनीता अपने पिता के हाल-चाल पूछने क्योंकि घर से बात न कर सकती थी..  इसलिये बाहर टेलीफोन बूथ की ओर सोचते हुए और घूमते हुए निकल गई थी।

“ क्या!.. होगा.. पिताजी अब!”। सुनीता ने मुकेशजी से बहुत ही बोझिल आवाज़ में बात की थी। सुनीता की आवाज़ में बहुत सारे अनकहे प्रश्नों के उत्तर छुपे थे। मुकेशजी एक समझदार व्यक्ति थे.. बेटी के बात करने के अंदाज़ से ही सब कुछ भाँप गये थे.. अपने आप को सँभालते हुए उन्होंने सुनीता से कहा था,” होना क्या है.. बैंक में पैसे जमा हो गये हैं.. चिंता वाली कोई बात नहीं है”।

मुकेशजी ने अपनी परेशानी को एकतरफ रखते हुए.. और बिटिया से सहज बातचीत करते हुए, एक पिता का फ़र्ज़ अदा कर सुनीता को घर भेजा था। समझदार सुनीता पिता से ज़्यादा कुछ भी न कह पाई थी.. मन की बातें मन में ही रखते हुए.. घर वापस आ गई थी।

रमेश के पैर में तो खैर!.  फ्रैक्चर था ही. और उसकी देखभाल भी अच्छे ढँग से हो रही थी। अच्छे ढँग से देखभाल करना.. और चेहरे पर पति-पत्नी का मुखोटा पहनना.. मन अंदर ही अंदर अपनी एक अलग कशमकश में था। और मन की परेशानी का कारण साफ़ था.. इधर मायके की परेशानी बढ़ रही थी.. रमेश अपनी ही मैं में था.. उसको तो किसी से कोई लेना-देना ही नहीं था। सुनीता के मन में रमेश को देखते हुए.. एक अलग सी परेशानी खड़ी हो रही थी.. जिसका उसका मन कोई भी हल न निकाल पा रहा था। नतीजा यह था.. कि रमेश और सुनीता के रिश्ते के बीच एक अनदेखी दरार आ गई थी। जहाँ पति-पत्नी एकदूसरे को नहीं समझे.. वहाँ रिश्ता केवल दिखावे का ही रह जाता है.. प्यार नाम मात्र का भी नहीं रह जाता।

रिश्ते में किसी भी तरह की दरार क्यों न आ गई हो.. पर गाड़ी तो दो बच्चों के संग चल ही रही थी। प्रहलाद अब बड़े स्कूल में जाने लगा था.. सुनीता की ड्यूटी प्रहलाद को रोज़ सुबह बस स्टॉप से लाने और ले जाने की थी। इस बस स्टॉप से लाने और ले जाने तक के रस्ते में सुनीता की नजरें एक अजनबी शख्स के साथ टकरा गईं थीं.. देखने में अच्छा-ख़ासा था.. जो वक्त सुनीता के प्रहलाद को बस स्टॉप पर छोड़ने जाने का होता था.. ठीक वही समय वो अजनीबी शख्स या अपनी गाड़ी साफ़ कर रहा होता था.. या फ़िर मॉर्निंग वॉक कर लौट रहा होता था। पर ऐसा कोई भी दिन नहीं जाता था.. जब वह सुनीता से नहीं टकराये। देखने में पढ़ा-लिखा अफसर लगता था।

“ गुड मॉर्निंग!.. मैं वरुण और आप..!”

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