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खानदान 18

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हरियाणे से लौट कर सुनीता रमेश के साथ अब वापस दिल्ली आ गई थी। रमेश हरियाणे सुनीता को घूमाकर आज थोड़ा खुश नज़र आ रहा था, उसने सुनीता की तारीफ़ में अनिताजी से कहा भी था,” मम्मीजी आज तो सुनीता बहुत ही अच्छी लग रही थी, एकदम टीचर जैसी”।  रमेश के मुहँ से तारीफ़ के शब्द दोनों माँ बेटियों को बहुत ही अच्छे लगे थे। सुनीता जब रमेश के साथ ऊपर कमरे में अकेली थी, तो उसनें खुशी के मारे रमेश से पूछ ही डाला था,” कैसा लगा आपको हमारा घर! सुनीता का मतलब अपने पिताजी के फ्लैट से था। जिसके जवाब में रमेश के मुहँ से निकला था,” एकदम कबूतर खाना”।

रमेश द्वारा सुनीता को हर किसी बात में दिये जा रहे खट्टे जवाब उसे चाह कर भी रमेश के पास आने की बजाय उसे दूर खींचते जा रहे थे। कैसे क्या करती सुनीता.. थोड़ा बहुत कुछ जो समझने की कोशिश भी करती थी, तो रमेश के रूखे और घटिया डॉयलोग काम ख़राब कर दिया करते थे। रमेश का बात करने का अंदाज़ सुनीता को हर बार अपना रमेश को समर्पण करने से पीछे खींच लेता था। पूरी तरह से सुनीता का रमेश के लिये समर्पित न होना ही विवाह के बंधन या फ़िर यूँ कह लीजिये घर बसाने की नींव की एक कमज़ोर कड़ी बनता जा रहा था।

अब हरियाणे में बातचीत का तरीका मन को लुभाने वाला न होता है, यह बात तो किसी ने भी सुनीता को ठीक से समझायी ही नहीं थी। सुनीता सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने दिमाग़ के हिसाब से ही रमेश को लेती चली जा रही थी, वो रमेश की जगह खड़े होकर रमेश के बारे में न सोच रही थी.. दोनों सुनीता और रमेश के अलग-अलग ढँग से सोचने के कारण ही शायद दो अलग-अलग रास्ते भी बनना शुरू हो गए थे.. जिनका फायदा उठाने के लिये पहले से ही कुछ लोग तैयार बैठे थे।

अब रात को सुनीता वापिस इंदौर जाने की तैयारी में लग गई थी, अपने माँ-बापू के लाए हुए तोहफे बैग में पैक करने में वयस्त थी, तभी एकदम रमेश ने सुनीता को ऑर्डर देते हुए कहा था,” एक बात कान खोल कर सुन लो, अगर इंदौर जाकर तुमने उस बिल्ली से बात करने की कोशिश की तो तुम्हारे हाथ-पैर तोड़ दूँगा”।

सुनीता रमेश के मुहँ से इस तरह से निकले हुए शब्द सुन कर घबरा गई थी, और एकदम गुस्से में आ गई। क्योंकि सुनीता मायके में थी, इसिलए उसने यह बात फटाफट नीचे जाकर अपने पिताजी से कर डाली,” सुनिए, पिताजी! रमेश मेरे हाथ-पैर तोड़ने की बात कर रहा है, कह रहा है उस रमा को बिल्ली बोलकर की यदि मैने उससे बातचीत करी तो मेरे हाथ-पैर ही तोड़ डालेगा”।

हाथ-पैर तोड़ने की बात सुन मुकेशजी एकदम गुस्से में लाल-पीले  हो गए, और उन्होंने रमेश को बुलवा भेजा था।गुस्से में तमतमाये मुकेशजी रमेश को देखते ही रमेश पर बरस पड़े थे,” क्यों भई! क्या नाटक है, ये! क्यों तोड़े जा रहें हैँ, लड़की के हाथ-पैर”।

यही नहीं मुकेशजी का सारा पुराना गुस्सा रमेश के परिवार वालों को लेकर एकदम भड़क उठा था,” क्या! समझती है, वो बुढ़िया अपने-आप को.. दो पैसे ज़्यादा भर लिए तो बात तक करने की तमीज़ भूल बैठी। ये मत समझना कि लड़की दे दी है, तो कुछ बोलेंगे ही नहीं..  भुला देंगें सारे नाटक और उतार देंगें प्रॉपर्टी का भूत। अरे! फैक्ट्री क्या खड़ी कर ली, पता नहीं क्या समझ रहें हैं, अपने-आप को”।

मुकेशजी के इस तरह से बात करने ने हिला के रख दिया था, रमेश को। रमेश को बिल्कुल भी उम्मीद न थी, कि ससुरजी इस प्रकार के शब्दों के बाण भी छोड़ सकते हैं। रमेश को अपनी माँ को बुढ़िया बोलना बहुत ही बुरा लगा था। मुकेशजी की बातों में दम था, और बोलने में पावर थी..  जिसने की रमेश को रोने पर मजबूर कर दिया था। रमेश ने रोते-रोते बेहोश होने का नाटक भी कर के दिखाया था… रमेश बेहोश होने का नाटक कर रहा है, ये उसके हाव-भाव से साफ ज़ाहिर हो रहा था। रमेश का नाटक करना सुनीता के परिवार में किसी को भी अच्छा नहीं लग रहा था। अनिताजी और सुनीता के बड़े भाई ने जैसे-तैसे मुकेशजी का गुस्सा शाँत करने को कोशिश की, और बात को सँभाल लिया था। यह कहकर,” रहने दीजिए पिताजी! देख लेंगें दिमाग़ को ठंडा रखिये”।

चलो! कोई बात न थी, अब रमेश को पता चल चुका था, कि ससुराल वाले सीधे-साधे बेवकूफ़ न है, हर तरह का इलाज करना जानते है… पर कुछ भी हो रमेश भी कम ढीठ न निकला।

माहौल शाँत हुआ था, और सुनीता को रमेश के साथ इंदौर के लिए समझा-बुझा कर भेज दिया गया था। अभी एक बार फ़िर से पिताजी ने ही रमेश और सुनीता के टिकट करवाये थे।

रमेश के चेहरे से लग रहा था, कि रमेश ससुराल में हुए वाकये को भूल चुका है। सुनीता अभी नादान थी,पिताजी से रमेश की शिकायत कर तो बैठी थी, पर अब रेल में सुनीता को दर्शनाजी का ख़ौफ़ सता रहा था.. रमेश हर बात अपनी माँ को ज़रूर बता दिया करता था, चाहे बताने लायक हो या न हो। रमेश की बातों को सुनकर ही दर्शनाजी उसे अपनी सहूलियत के हिसाब से रास्ता दिखाती चलती थी। रमेश को केवल अपनी माँ के ही दिखाए हुए रास्ते अच्छे लगा करते थे। सुनीता ने रमेश से डर के मारे ट्रैन में ही बोल पड़ी थी,” प्लीज! अम्माजी को जो हुआ मत बताना.. आपको भी बिल्ली को लेकर इस तरह से बात नहीं करनी चाहिए थी”।

रमेश ने सुनीता की बातों का कोई भी जवाब न देते हुए बस! इतना ही कहा था,” ठीक है, पर दिल्ली फोन पर बात करते हुए रोना मत”।

दिल्ली फ़ोन पर बात करते हुए रोना मत,रमेश ने इसलिये कहा था, क्योंको सुनीता अक्सर इंदौर से अपने माँ-बापू से बात करते वक्त एक बार तो पक्का ही रोना शुरू कर दिया करती थी।

अब दोनों आराम से घर पहुँच गए थे… घर का माहौल भी एकदम दर्शनाजी के कंट्रोल में व्यवस्थित था। दर्शनाजी की मर्ज़ी के बगैर तो खैर पत्ता भी नहीं हिलता था। घर में नया ताज़ा मुद्दा रमा ही थी।दर्शनाजी और रमेश ने मिलकर ही रमा का नाम बिल्ली रखा हुआ था। दर्शनाजी के पास अब एक ही काम होता था,” रमेश या उस बिल्ली से बात करे है!”।

कहने का मतलब की सुनीता और रमा आपस में बात करतीं हैं। दर्शनाजी की नई नीति “ फुट डालो और शासन करो” शुरू हो गई थी। अब दर्शनाजी ने अपनी नई गोटी यानी के रिश्तों से खेलना शुरू कर दिया था। खुद तो सबके साथ हँसती बोलती थी, पर सुनीता और रमा आपस में बात बिल्कुल भी नहीं करेंगी ऐसा रमेश का दिमाग़ बनाती जा रही थी। रमेश के दिमाग़ में घर के हर सदस्य के प्रति ज़हर भरा जा रहा था। रमेश को दर्शनाजी सुनीता की हर दिन की रिपोर्ट देने लगीं थीं.. “  आज इसने बिल्ली से बात की, कि नहीं, आज यह बिल्ली को देखकर हँस रही थी, वगरैह-वगरैह”।

अब क्या हुआ कि अचानक से एक दिन सुनीता के घर से इंदौर में लैंडलाइन पर फ़ोन कॉल आ गया था, सुनीता अपने माँ-बापू से बात कर एक बार फ़िर रोने लगी थी, कि अचानक से वहाँ पर रमेश का आना हुआ था.. रमेश के मन में पहले से ही दिल्ली वाली बात को लेकर गुस्सा कहीं दबा हुआ था, जो अब अपनी माँ और रमा को वहाँ बैठा देख फूट पड़ा था,” जब में दिल्ली जा रिया था, तो उड़े इसके बापू ने मेरे गेल के-के बक़वास करीं थीं, तने भी बूढ़ी कहन लाग रहे थे”।

रमेश ने अपनी माँ को अपनी बात न बता कर ससुराल वालों की यानी मुकेशजी की कही हुई सारी बातें विस्तार से बतायीं थीं। पर दर्शनाजी ने एक बार भी रमेश से उन बातों के बोले जाने का कारण तक न पूछा था। लेकिन माँ बेटों में कोई राज़ की बात ज़रूर हुई होगी.. बिल्ली यानी के रमा को लेकर.. जो केवल माँ और बेटा ही जानते थे। रमेश ने इतना बुरी तरह से हंगामा किया था, अपने घर पर कि सुनीता एक बार फ़िर से घबरा गई थी।

दर्शनाजी को अब एक नया और एकदम ताज़ा मसाला मिल चुका था.. रमेश का उसकी ससुराल यानी के दिल्ली वालों को लेकर दिमाग़ खराब करने के लिये। दर्शनाजी रमेश को ससुराल के ख़िलाफ़ करते हुए उसका किस तरह से इस्तेमाल करेंगीं.. क्या सुनीता रमेश पर काबू पा अपना घर बसाने में कामयाब हो पाएगी या फ़िर दर्शनाजी के फ़ॉर्मूले ही रमेश के दिमाग़ पर छाते चले जायेंगे और सुनीता किसी एक कोने में खड़ी सोचती ही रह जायेगी।