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खानदान 6

indian wedding


सुनीता रमेश और रमेश के परिवार के साथ पूरी तरह से एडजस्टमेंट करने की कोशिश कर रही थी। एक दो बार रमेश सुनीता को बाहर घुमाने भी ले गया था,लेकिन ज़्यादा दूर तक नहीं बस यूहीं आसपास तक ही,उसी गाड़ी में जो मुकेश जी ने दहेज में दी थी।

एक बात खटकने वाली फ़िर से थी,और यह कि रमेश अक्सर सुनीता से ही पेट्रोल वगरैह के पैसे माँगा करता था…पैसे वाली पार्टी होकर भी क्या चक्कर था..पैसे! पैसे! का। सबसे ज़्यादा चिक-चिक परिवार में पैसे की ही थी। सुनीता को परिवार में रह कर थोड़ा सा अजीब लग रहा था। विनीत जी की दोनों बेटियाँ मीना और टीना देखने में बिल्कुल भी रईस परिवार की न लगा करतीं थीं, अजीब ढँग की फ्रॉक पहन कर नीचे ज़मीन पर बैठ कर खाना वगरैह खातीं थीं, विनीत जी के ब्याह को तो आठ साल हो गए थे,पर उनके परिवार पर भी शहर की छाप न होकर हरियाणे के पिछड़े गाँव की छाप नज़र आती थी।

सुनीता ने रमेश से एक दिन कहा भी था,”आप अलग घर ले लो”। रमेश का कहना हुआ था,”हाँ! हाँ अलग घर बनायेंगे.. काँच का”। जैसे-तैसे सुनीता रमेश के साथ एडजस्ट करने की कोशिश कर ही रही थी..कि एक दिन सभी लोग घर के हॉल में बैठ कर आपस में बतिया रहे थे,कि अचानक से ही रमा के मुहँ से निकल पड़ा था,”न्यू मार्केट में सिन्दूर भरने के लिए बुलवाया था न”।

सुनीता वहीं बैठकर यह बात सुन रही थी,असल में यह सब बोला भी सुनीता के लिए ही जा रहा था। क्या था..न्यू मार्केट..किसे बुलाया था..न्यू मार्केट में.. यह सारा का सारा वार्तालाप रमेश को लेकर ही था। बातों को बीच में काटते हुए दर्शनाजी का कहना हुआ था”वही पंजाबन ऋचा..बड़ी मुश्किल से पीछा छुड़वाया था,डंडे लेकर जाना पड़ता था..उसके पीछे”।

सुनीता वहीं चुप-चाप बैठी सोच में डूबी हुई थी,”किसके पीछे डंडे लेकर जाना पड़ता था, और कौन ऋचा भई!”रमेश के साथ ही ऋचा का नाम क्यों जोड़ा जा रहा था। सुनीता ने ऋचा वाली बात सीधे रमेश से न पूछ कर रमा से ही पूछ डाली थी..रमा ने तो मुस्कुराते हुए अपनी तरफ से सुनीता को समझाया था,” अरे! थी, एक पंजाबन लड़की ,यहीं पीछे रहा करती थी..रमेश को छत्त पर खड़े होकर लाल झंडे दिखाया करती थी”। पर रमा ने सुनीता को साथ मे यह भी समझाया था,कि ,”वो तो तू चिन्ता मत कर रमेश की पहली ज़िन्दगी अग्नी के तरफ़ सात फेरों में ही जल कर रह गयी है। अब तो उसकी नई ज़िन्दगी की शुरुआत हुई है”। पर कम उम्र होने के कारण सुनीता के दिमाग़ में ऋचा वाली बात घर कर गयी थी। सुनीता का नेचर ही ऐसा था,कि कोई भी बात बस एक बार सुननी चहिये थी,बस दिमाग़ से मुश्किल से निकला करती थी।

अब तो सुनीता ने ऋचा के किस्से की तह तक जाने की ज़िद ही पकड़ ली थी। यह नहीं कि जो हो गया सो हो गया अब जाने देते हैं, और आगे चलते हैं..रमेश के पीछे ही पड़ गयी थी..सुनीता..बताओ न,कौन थी, ऋचा?..पूछना हुआ था.सुनीता का रमेश से। रमेश ने यह कह कर टाल दिया था,”अरे!कुछ नहीं,ऐसे ही थी,कोई”। छोटी-छोटी बातों से परेशान होना और उन्हें दिल से लगा लेना वाला स्वभाव दर्शनाजी और रमा ने भाँप लिया था,और इसी बात को दोपहर के वक्त फ़ायदा उठाते हुए हुए बढ़ा चढ़ा कर सामने रखा था।

बात कुछ इस तरह से सामने आई थी,कि.. ऋचा एक पंजाबी परिवार की लड़की थी,जो रमेश लोगों के ठीक पीछे वाली गली में रहा करती थी। उस जमाने मे जब रमेश केवल चोबीस या पच्चीस साल के रहे होंगें, ऋचा स्कूल में पढ़ा करती थी। रमेश को मोटरबाइक पर आता जाता देख अपना दिल दे बैठी थी। देखने में तो रमेश हैंडसम थे ही। रमेश और ऋचा का काफ़ी दिनों तक बेहद सीरियस चक्कर चला था।

अब ससुराल में सुनीता के सामने ऋचा का नया मसला शुरू हो गया था,जिसके विषय में हर रोज़ कोई न कोई नई बात जरूर सामने आती थी। दर्शनाजी ने ऋचा वाली बात को हरियाणवी में कुछ इस तरह से पेश किया था,”उस छोरी ने तो मेरे छोरे के लिये ज़हर भी खा लिया था,और हमारे पीछे-पीछे स्टेशन तक भी आ गयी थी”। अब सुनीता को यह ऋचा वाला क़िस्सा बिल्कुल भी हज़म न हो रहा था,इस ऋचा को लेकर थोड़ी सी बेचैन भी रहने लगी थी।

रमेश के किसी दोस्त ने सलाह दी..”बता दे यार भाभी को सब कुछ ऋचा के बारे में” फ़िर एक दिन रमेश ने ऋचा के विषय में सुनीता को खुल कर कुछ इस तरह बताया”ऋचा उस वक्त स्कूल में पढ़ा करती थी,और मैं मीना को स्कूल से अपनी मोटरबाइक पर लेने और छोड़ने जाया करता था। उन्हीं दिनों ऋचा मुझे पसन्द करने लगी थी,और मुझे भी वो बहुत अच्छी लगने लगी थी। ऋचा एक अच्छी लड़की थी, पंजाबी परिवार की इकलौती सन्तान थी, जिसके माँ और बाबूजी दोंनो ही डॉक्टर थे। खुद भी ऋचा पढ़ाई में बहुत होशियार हुआ करती थी..हमेशा अव्वल आती थी। देखने में भी सुन्दर लड़की थी। मुझे भी ऋचा बहुत अच्छी लगती थी। ऋचा की इंग्लिश भी बहुत ही अच्छी थी,अंग्रेज़ी भाषा पर ऋचा का कमांड अच्छा था,उसका लिखने का सलीका भी मुझे बेहद पसन्द था,अंग्रेज़ी में मुझे बहुत सारे लव लेटर लिखे थे,वो सारे लव लेटर मैंने एक अटैची में संभाल कर रखे हैं.. तुम्हें दिखाऊंगा।

अपना लव लैटर शुरू करते वक्त मुझे dear Mr स्मार्ट एंड हैंडसम बॉय लिखा करती थी। मुझे ऋचा के वो प्रेम पत्र लिखने का तरीका बेहद पसन्द था। मैं और ऋचा हर रोज़ मिलने लगे थे,पूरे इलाके में मेरा और ऋचा का चर्चा था। ऋचा के माँ- बाप ने ऋचा को पढ़ने के लिये ग्वालियर भेज दिया था, मैं वहाँ भी उससे मिलने पहुँच गया था। ऋचा ने मुझे कई सारे तोहफे भी दिए थे..उसका दिया हुआ लाल रंग का स्वेटर आज भी मेरे पास है। शादी करना चाहती थी,मुझसे।

एक बार तो ऋचा ने मुझे यहीं इंदौर में न्यू मार्किट में बुलाया था, मैं भागा-भागा पहुँचा था.. सिन्दूर लिए खड़ी थी,हाथ में.. कहने लगी मेरी माँग भर दो चलो शादी कर लेते हैं.. पर मैं ही रुक गया था। एक बार तो ऋचा ने मेरे पीछे ज़हर ही खा लिया था..मैं भागा-भागा अस्पताल पहुंचा था..बोली मुझसे शादी कर लो नहीं तो मैं अपनी जान ही ले लूँगी।

ये घर वाले ऐसे हैं, की उसके घर के आगे डंडे बजाते थे..और तो और और मेरी अम्मा ने तो हद ही कर डाली थी,शाम को जब भी ऋचा दिख जाया करती थी,तो चप्पल और थप्पड़ दिखाया करती थी। एक बार तो इस विनीत ने और बाबूजी ने तो ऋचा के घर के आगे बैंड बाजा तक बजाया था,जाकर। घर वालों ने मुझे और ऋचा को लेकर बहुत ज़्यादा हंगामा खड़ा कर दिया था। ऋचा ने मुझसे भाग कर शादी करने को कहा था। बस, ऋचा को लेकर हमारे घर मे युहीं झगड़े चलते रहते थे..कई बार उसने मुझे भाग कर शादी करने का ऑफर दिया था।

मेरी और ऋचा की खबर तो हरियाणे गाँव तक पहुँच गई थी, हरियाणे से चाचा ने कहा था..”तू उस छोरी को यहाँ हरियाणे भगा ला, बाकी हम सम्भाल लेंगें”। खैर!यूँहीं ऋचा के साथ वक्त बितता गया,और उसका एडमिशन अब दिल्ली के फैशन इंस्टिट्यूट में हो गया था,मैं ऋचा से मिलने फ़िर एक बार दिल्ली पहुँचा था…देखा तो ऋचा किसी और ही बन्दे के साथ घूम रही थी, मुझसे रहा न गया..और मैने उसके गाल पर ज़ोर से एक थप्पड़ दे डाला था..और इस किस्से को हमेशा के लिए ख़त्म कर दिया था। अरे!में एक बात तो बताना भूल ही गया..जब भी पैसे मांगा करता था,मुझे हमेशा पैसे दे दिया करती थी”।

सुनीता ने रमेश की प्रेम कथा सुनकर फ़िर एक बार अंदाज़ा लगा लिया था,”इतनी जबरदस्त प्रेम कहानी होने के बावजूद भी इस इंसान ने ऋचा से ब्याह क्यों नहीं किया,क्यों नहीं अपने परिवार के ख़िलाफ़ जाकर इसने ऋचा से शादी की”। क्या परिवार के प्रति प्रेम बड़ा था रमेश का, या फ़िर ऋचा के साथ अलग होकर अपने पैरों पर घर बसाने में असमर्थ था”।

सुनीता को अपनी सोची हुई दूसरी वाली बात ही सही लग रही थी। सुनीता का अंदाज़ा एकदम सही तरफ़ ही जा रहा था,इनके घर वाले इनको पैसे देते ही नहीं, और खुद कमाने की काबलियत रमेश जी में नज़र नहीं आ रही है। हमारे यहाँ भी तो इन्होंने खाली जेब पहुँच कर वैष्णो देवी जाने का नाटक किया था। खैर!अब जो भी हो हरियाणे के फैमिली ड्रामे की शुरुआत हो चुकी थी,जिस नाटक का नया हिस्सा अब सुनीता थी। कहीं पर रमेश सुनीता के साथ न होकर अपने परिवार के साथ ही शामिल था।

दर्शनाजी अक्सर कहते हुए घूमती रहतीं थीं,”पता नहीं कितनी लड़कियों से पीछा छुड़वाया है,हमनें इसका,चलो अब तो शादी हो गयी है,लाइन पर आ जायेगी गाड़ी”। इसी तरह से कुछ दिन सुनीता ने फ़िर से इंदौर में बिताए थे। पर एक ही बात सुनीता को खटक रही थी..रमेश अपने हिसाब का न होकर अपनी माँ के हिसाब का है। इन्हीं दिनों सुनीता के ससुराल वालों ने इंदौर में सुनीता और रमेश की रिसेप्शन पार्टी रखी थी,पर हैरानी की बात तो यह थी,कि विनीत जी ने सुनीता के घर वालों को निमंत्रण दिया ही नहीं था। जिससे साफ़ ज़ाहिर हो रहा था.. कि विनीत जी को रमेश के अच्छे घर में हुए रिश्ते से कोई भी खुशी न थी। सुनीता को उसके घर वालों का रिसेप्शन पार्टी में आमंत्रित न करना बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा था। विनीत जी ने तो यहाँ तक कह दिया था..”आना होगा तो अपने-आप आ जाएँगे”।

सुनीता को इंदौर में घर बसाना कम व गेम प्लान ज़्यादा लग रहा था। अभी सुनीता को रमेश ठीक से समझ ही नहीं आ रहा था। रमेश को अपने-आप को पेश करने के तौर-तरीके से उसके बारे में पता लगाना मुश्किल लग रहा था। पहले दस कदम सुनीता रमेश के साथ आगे ले चुकी थी। सुनीता के तौर तरीकों पर परिवार की पूरी नज़र थी। सुनीता कैसे, क्या और क्यों करती है,इन सभी बातों की चुगली रमा और दर्शना जी लगातार कर रहीं थीं, जिससे सुनीता एकदम अनजान और बेख़बर थी। परिवार ने सुनीता और रमेश को लेकर अपना फैसला कर लिया था। फैसला सभी का एक ही था, पर उस तक पहुँचने के रास्ते सब के अलग थे। सुनीता एक भोली और अनजान सी चिड़िया इंदौर नाम के घोंसले में आ तो बैठी थी,पर क्या होगा, कैसे होगा,इन सभी बातों से बेख़बर थी।