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खानदान 52

indian wedding

रमेश और सुनीता प्रहलाद और नेहा संग सब इंदौर वापिस आ गए थे.. माँ-बापू ने सुनीता को हमेशा की तरह से काफ़ी सारी विदा देकर रमेश के साथ इंदौर भेज दिया था.. दर्शनाजी भी संग ही आईं थीं। “ भरत का सुन दी ही मेरी चीख निकली थी, मैंने सोचा था.. आप नहीं रहोगे”।

रेल में साथ-साथ सफ़र करते वक्त.. दर्शनाजी ने सुनीता से भरत के लिये अपना दुख.. और सुनीता को यह बताया था.. कि उनकी सोच के हिसाब से और सुनीता की हालात को देखते हुए ऐसा लग रहा था.. कि सुनीता नहीं रहेगी। खैर! जो भी हो.. सभी लोग साथ में इंदौर पहुँच गए थे। इंदौर में प्रहलाद और नेहा को देख सभी बेहद खुश हुए थे.. भरत के जाने का एक-आध बार को छोड़कर कोई ख़ास ज़िक्र नहीं किया था। रामलालजी ने नेहा को प्यार और पूरे दुलार के साथ गोद में उठा.. गले से लगा लिया था। रामलालजी को वाकई में घर के सभी बच्चों से प्यार था। उन्होंने बच्चों में कभी-भी मतभेद नहीं किया। परिवार ने नेहा के आने की खुशी समाज के संग नहीं बाँटी और न ही कोई घर में ही मिठाई वगरैह मँगवा या फ़िर कुछ अच्छा भोजन बनवा कर बच्ची के आने का स्वागत किया।

बस! एक आम जीवन की शुरुआत हो चुकी थी.. प्रहलाद तो पास के बच्चों के स्कूल में जाने लग गया था.. और नेहा धीरे-धीरे बड़ी हो रही थी। पर घर के माहौल में रत्ती भर भी शांति न थी.. और होती भी कैसे.. दर्शनादेवी जैसी चोटी की कलाकार जो मौजूद थीं। हालाँकि सुनीता का कमरा परिवार से अलग था.. पर फ़िर भी सुनीता रमेश पर कोशिश करने पर भी अपनी छाप छोड़ने पर असमर्थ हो रही थी। ऐसा लग रहा था.. मानो की एक गमले में पौधे के साथ-साथ “बिल्ली”, “बुढापा”,” बुड्ढा” और ये “मूँछ” नाम के जँगली पौधे रमेश नाम के पेड़ को पनपने ही नहीं दे रहे थे.. और इन जँगली पौधों को गमले में से उखाड़ कर फेंका भी नहीं जा सकता था.. क्योंकि पेड़ के सबसे ऊपर दर्शनाजी यानी के रमेश की भाषा में बुढ़ापा नाम की मोटी इली जो बैठी थी। यह इली इन जँगली पौधों को बिल्कुल भी नहीं हटने दे रही थी।सबसे मुश्किल काम रमेश नाम के इस पेड़ से इस इली का हटना था.. जो नामुमकिन सा लग रहा था.. इस इली ने रमेश नाम के पेड़ पर अपना असर इस तरह छोड़ रखा था.. की पेड़ का विकास ही रुक गया था.. कभी-कभी इस खतरनाक इली को देखकर ऐसा लगता था.. कि अगर यह इली इस पेड़ पर ही बैठी रह गई.. तो इस पेड़ का वजूद ही ख़त्म हो जायेगा। क्योंकि उस इली से निकलने वाला ज़हर खतरनाक था.. जो पेड़ को ख़त्म ही नहीं राख करके छोड़ता। पर ये जो इली रमेश नाम के पेड़ पर घर किये बैठी थी.. इसकी खुराक क्या थी.. क्या माँगती थी.. ये दर्शनादेवी नाम की इली.. इसकी ख़ुराक सिर्फ पैसा थी.. अगर इस इली को पैसा नहीं मिलता था.. तो यह आदमी को भी निगलने की हिम्मत रखती थी। दर्शनादेवी नाम की इली की भयंकर कमज़ोरी पैसा थी.. जो इसे रमेश नाम के पेड़ पर बैठकर उन्हें यह ख़ुराक उम्रभर मिलने की उम्मीद नहीं थी। इसलिये सुनीता की इस इली के रमेश नाम के पेड़ को छोड़ने की एक आख़िरी उम्मीद बाकी थी।

रमेश के दिमाग़ में सुनीता और रमा के रिश्ते को लेकर लगातार दर्शनादेवी द्वारा इंजेक्शन दिये जाते थे.. और तकरीबन रोज़ शाम को किसी न किसी बक़वास और घरेलू मुद्दे पर रमेश का किसी न किसी से भयंकर गाली-गलौच वाला झगड़ा भी करवा दिया करतीं थीं। पता नहीं क्यों इस औरत को बदतमीज़ी किये बग़ैर खाना हज़म नहीं हुआ करता था.. कोई नई बात नहीं है.. होतीं हैं.. संयुक्त परिवार में इस तरह की औरतें!

सुनीता रमेश को एक दुश्मन की तरह दिखने लगी थी.. और अब रमेश सुनीता के साथ भी अपशब्दों का इस्तेमाल करने लगा था। जिस दिन पहली बार रमेश ने सीमा लाँघी थी.. तभी सुनीता को सख़्त कारवाई करते हुए.. अपने ख़ुद के वजूद से अवगत कराना चाहये था.. पर पता नहीं बेचारी कौन सी भारतीय स्त्री का उदहारण पेश कर रही थी। खैर! सोच रही थी.. एक न एक दिन सब ठीक हो जाएगा। अब वो एक न एक दिन कब आने वाला था.. यह तो भगवान ही जानते थे।

दो बच्चों को लेकर सुनीता की ज़िंदगी की नाव नाटकों के बीच से होती हुई.. निकल रही थी.. करोड़पति परिवार के बीच से। दोनों बच्चे अब थोड़े बड़े हो चले थे.. एक दिन सुनीता रात को अपने कमरे में यूँहीं बैठी थी.. कि मन हुआ चलो! आज अलमारी के लॉकर में से अंगूठियां निकाल कर देखते हैं.. आख़िर पिता ने देखने लायक सोना सुनीता पर चढ़ाया था। अलमारी का लॉकर खोलते ही अंगूठियों वाला डिब्बा खोलकर सुनीता का मुहँ खुला रह गया था.. खाली डिब्बा देख.. सुनीता के पैरों के नीचे से ज़मीन सरक गई थी। अंगूठी के अलावा माँ का दिया हुआ.. बहुत सा और सोना भी चोरी हो गया था। बाहर का कोई आदम घर में घुसने की हिम्मत नहीं कर सकता था.. और बाहर का ही क्यों घर में भी किसी परिन्दे की कमरे के अन्दर पर मारने की हिम्मत नहीं थी। सुनीता ग़ुस्से से तमतमा उठी थी.. छोटा सा प्रहलाद भी दूसरे कमरे से माँ के पास आ खड़ा हुआ था.. अलमारी से सोना चोरी हो गया.. यह बात बच्चा बखूबी समझ गया था.. पर मासूम जान एकदम चुप था। सुनीता की समझ में आ गया था..  चोर रमेश ही है।

“ कहाँ गयीं मेरी सारी अंगूठियां!.. बताओ!”।

सुनीता रमेश के कमरे में आते ही ज़ोरों से चिल्लाई थी।

“ मुझे क्या पता!”।

रमेश ने पूरे आत्मविश्वास के साथ सुनीता की आँखों में आँख डालकर जवाब दिया था।

“ मुझे पता है..  तुमनें बेच खायीं’।

सुनीता ने रमेश से चिल्लाकर ऊँचे स्वर में बात की थी.. दोनों की आपसी बहस की आवाज़ें दूर-दूर तक जा रहीं थीं।

“ तू ले गई होगी!.. अपने मायके बेचने के लिये!”।

रमेश ने मुस्कुराकर और व्यंग करते हुए.. सुनीता से कहा था।

“ शट-उप!.. तूने नहीं तो क्या! तेरे बाप ने बेच दिया .. सोना!”।

“ तेरे बाप ने देहज में दिया था.. क्या!.. अरे! मेरे बाप का पैसा लगा था”।

सुनीता ग़ुस्से में लाल-पीली हो रमेश पर बुरी तरह से चिल्ला रही थी..  दोनों मासूम बच्चे अपनी माँ के साथ खड़े तमाशा देख रहे थे.. नीचे परिवार के सभी सदस्य मौजूद थे.. पर कोई भी ऊपर कमरे में नहीं आया था। सभी लोग नीचे ही बैठकर तमाशे के सीधे प्रसारण का आनंद ले रहे थे। तमाशा तेज़ी पर पहुँच चुका था.. बस! हाथा-पाई शेष थी.. की रमेश तुरन्त ही मैदान छोड़ अपनी माँ के पास नीचे भाग खड़ा हुआ था। माताजी के चेहरे पर खुशी की लालिमा फुट रही थी.. मानो झगड़ा न होकर कोई जश्न मन रहा हो परिवार में। इतनी खुश तो दादी-माँ पोता-पोती के पैदा होने पर भी नहीं हुईं थीं.. बच्चों के जन्म के वक्त तो ऐसा मुहँ बनाकर बैठीं थीं.. मानो कोई खुशी न आकर कोई अनर्थ हो गया हो।

खैर! सुनीता.. रमेश के पीछे-पीछे नीचे हॉल की तरफ़ दौड़ी चली आई थी..

“ अम्माजी इन्होंने मेरी अंगूठियां, और बाकी का थोड़ा सोना भी निकाल कर बेच दिया!”।

परेशान होती सुनीता ने सासु-माँ से कहा था।

“ अच्छा!..!

सासु-माँ इतनी खुश थीं.. कि आगे सुनीता से कुछ भी न कह पाईं थीं।

सुनीता बेचारी परेशान अभी वहीँ खड़ी थी।

“ हवा को आने दो!.. हवा को जाने दो!”।

क्या!.. यह भी कोई हल था.. सुनीता की समस्या का.. कौन सलाह दे रहा था.. सुनीता को।