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खानदान 47

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सुनीता मायके में ही थी, और जुड़वाँ बच्चों की माँ बनने वाली थी.. यह खुशखबरी अब रमेश को सुनीता ने फ़ोन पर ही दे दी थी। एक बात यहाँ सुनीता की भी समझ नहीं आ रही थी.. ऐसा आदमी जिसे न तो बात करने की तमीज़ थी.. और न ही खड़े होने की अक्ल थी.. उसके साथ परिवार बढ़ाने का सोचा भी कैसे था.. अथार्थ सुनीता भी रमेश के साथ बराबर ही दोषी और एक कमज़ोर श्रेणी की महिला थी.. जो न ही निर्णय लेने में सक्रिय थी.. और न ही अपने आप को ही सक्षम साबित ही कर पा रही थी। यह ख़बर कि सुनीता एक बार फ़िर से माँ बनने वाली है..  अब पूरे इंदौर परिवार में फ़ैल गई थी। रमेश सुनीता को लेने दिल्ली आ गया था। दिल्ली में मुकेशजी के यहाँ बबलू का रिश्ता एक दिल्ली में रहने वाले परिवार से ही तय हो गया था। अच्छे खानदानी लोग थे.. बबलू के भी ससुराल वाले। वैसे देखा जाय तो मुकेशजी की तीनों ही संतानों का रिश्ता नामी परिवार में हुआ था.. अब किसी के चेहरे पर तो लिखा न होता है.. कि कौन अन्दर से कैसा है। ब्याह-शादी तो केवल एक लॉटरी का टिकट होता है.. जो केवल खुलने पर ही पता चलता है। कुछ ऐसा ही लॉटरी का टिकट इंदौर का खुला था.. बन्द टिकट के लिफ़ाफ़े के ऊपर तो अच्छा-ख़ासा लिखा था.. उद्योगपति श्री रामलालजी.. बिसनेस पार्टनर अपने ही दो सुपुत्र। पर लिफाफा खुलने के बाद तो माजरा ही कुछ और निकला। खैर! कोई बात नहीं.. जीवन में इस तरह के सरप्राइज भी परमात्मा दे ही दिया करते हैं।

रमेश दिल्ली आ चुका था.. अब कोई बच्चा तो था न, रमेश घर में क्या परेशानी चल रही है.. भाँप गया था। हालाँकि रमेश को बताया किसी ने भी न था। पर हल्का-फुल्का सा आईडिया रमेश को हो गया था। मुकेशजी की एक कंपनी बन्द करने के आर्डर सरकार द्वारा आये थे.. पर अभी उनकी बाकी की दो कंपनी चल रहीं थीं.. जो कि सुनीलजी चला रहे थे.. सारा पैसा बाकी की दो कंपनियों में डाइवर्ट हो रहा था। घर में बिसनेस में क्या माजरा चल रहा है.. यह रमेश ने अच्छी तरह से नोट कर लिया था। अब आख़िर घर का दामाद था.. रमेश!.. कुछ भी छुप थोड़ी ही सकता था। माँ ने सुनीता को भतीजे होने की खुशी में अपने हाथ से सोने के कंगन उतार कर पहना दिए थे.. ये कहकर,” इन्हें ही सिद्धान्त के होने का तोहफ़ा समझना.. इस बार ज़्यादा कुछ न दे पाएँगे, वक्त और हालातों के कारण हम विवश हैं”।

“ कोई बात नहीं माँ! यह तोहफ़ा कोई कम थोड़ी ही है.. आपने अपने सोने के कंगन उतार कर दिये हैं.. बल्कि इनकी भी कोई ज़रूरत न थी”। सुनीता ने अनिताजी को समझाते हुए कहा था।

सुनीता रमेश के साथ इंदौर आ गई थी। इंदौर में आने के बाद रमेश और दर्शनाजी की अच्छी-खासी हमेशा की तरह बैठक हुई थी.. और रमेश ने घर का दामाद होते हुए भी दिल्ली वालों पर आई मुसीबत को अपने तरीक़े से पूरा माँ के आगे गा दिया था। और माता श्री तो रमेश की भी उस्ताद निकलीं थीं.. एक बार भी अपने नवाब को यह न समझाया था, कि किसी के वक्त का यूँ ढिंढ़ोरा नहीं पीटा जाता.. यह तो वक्त है.. किसी की तरफ़ कभी-भी आकर खड़ा हो जाता है। पर क्या कर सकते थे.. परिवार में पैसा ही इतना था.. जिसने तमीज़ तहजीब सब कुछ खो कर आँखों पर पट्टी जो बाँध रखी थी। ऐसा नहीं था, कि पैसे वाले केवल दुनिया में रामलालजी का परिवार ही था.. भरे पड़े हैं, हिंदुस्तान में अमीर। पर इस परिवार के पास धन की तो कोई भी कमी न थी.. पर शिक्षा, संस्कारों और विचारों से नंगा-भूखा परिवार था… जिसका ये लोग औरों के लिये ढिंढोरा पीटा करते थे।

अब तो सुनीता जुड़वाँ बच्चों की माँ बनने वाली है.. नई तारो-ताज़ा खबर थी.. रामलालजी के घर में दर्शनाजी ने तो अपना दिमाग़ भी लगाना शुरू कर दिया था..’ दो लड़के हो गये, तो एक मूछ को दे देंगें’।

मूछ विनीत का लाड़ का नाम था। दर्शनाजी ने तो पहले से ही ढिंढोरा पीटना शुरू कर दिया था.. कि रमेश के अगर दो लड़के हो गए तो, उनमें से एक लड़का विनीत को गोद दिलवा देंगें। अब यहाँ पर सोचने वाली बात यह थी.. कि वैसे तो यदि सुनीता रमा की तरफ़ देख भी लिया करती थी, तो सासू-माँ वो हंगामा करवाया करतीं थीं.. जो आने वाली सात पुश्ते याद रखें.. और ऊपर से ये लड़का गोद लेने वाली बात कहाँ से आ गई थी। ज़बरदस्त राजनीति चल रही थी.. रामलालजी के परिवार में।

दूसरी तरफ़ सुनीता और रमेश के रिश्ते के बीच की कड़वाहट कम होने की बजाय दिन रोज़ बढ़ रही थी.. अब तो रमेश तीन-तीन बच्चों का बाप बनने वाला था.. पर पति-पत्नी के आपसी मामले में कोई भी सुधार न था। इसी बीच रमेश भी काफ़ी बीमार पड़ गया था.. डॉक्टर ने रमेश को पेट में पथरी की शिकायत बताई थी। बेटे के बीमार होने पर भी दर्शनाजी की चुगलियां कुछ कम नहीं हुईं थीं। बेटा बिस्तर में पड़ा था.. और माँ लगातार रमेश के कान भरने में लगी रहती थी,” या कोनी माने, बिल्ली गेल बात करीं जा है”।

कुछ तो दर्शनाजी रमा और सुनीता की चुगली करतीं ही जातीं थीं.. और कुछ रमेश के कान उसकी ससुराल के ख़िलाफ़ यानी दिल्ली वालों के लिये भी भरतीं ही रहतीं थीं। मस्लन रमेश जब इस बार दिल्ली गया था. तो रमेश को रसोई की अलमारी में रखा हुआ बड़ा स्टील का ग्लास पसन्द आ गया था.. रमेश ने अनिताजी से उस ग्लॉस की फरमाइश कर दी थी. अब मुकेशजी भी दामाद की फरमाइश सुन रहे थे, तो उनके मुहँ से निकल ही गया था,” अरे! रमेशजी सोचने वाली क्या बात है!.. आप इस ग्लॉस को इंदौर ले जाना”। सज्जन पुरुष जो थे.. मुकेशजी!

अब बाद में अनिताजी को पता चलता है.. कि ग्लॉस अनु का है.. जो की वो अपने मायके आगरा से लेकर आई थी। अब अनिताजी की भी कोई गलती न थी.. बहू का लाया हुआ ग्लॉस यूँ दामाद को कैसे उठा कर दे देतीं। दर्शनाजी को रमेश जैसे समझदार आदमी को सीधी बात समझाते हुए कह देना चाहये था,” बाज़ार से जाकर ऐसा ही ग्लॉस ले आओ!.. राजा के घर में मोतियों की कमी थोड़े ही है”।

बजाय रमेश को सही रास्ता दिखाने के माँ ने ससुराल वालों के ख़िलाफ़ भड़का दिया था.. नींबू और मसाला छिड़कने के लिये रमा और सुनीता काफ़ी थे। रमेश के दिमाग़ में पूरी चांट तैयार हो चुकी थी। हुआ यूँ की सबके सामने रमेश को दूध डालते वक्त सुनीता से दूध का पैकेट गलती से गलत ढँग से फट गया था.. और पूरा दूध उसी वक्त टेबल पर फैल गया। दूध के फैलने ने रमेश के दिमाग़ में माँ द्वारा पकाई हुई चांट को भी फैला दिया था, जो इस कदर सबके सामने शब्दों के रूप में फैल गई थी।

“ बैंड बाजेगा उनका.. देख लिए तूं”।

रमेश अपनी माँ को देख कर गँवारों की तरह और बेहद बदतमीज़ी भरे अंदाज़ में चिल्ला रहा था.. रमेश का निशाना अपनी ससुराल की तरफ़ था.. और रमेश की माँ सामने खड़ी हो फूला न समा रही थी। रमेश का बक़वास करने का अंदाज़ इतना भद्दा था.. कि सुनीता के पैर काँपने लग गए थे.. और वो प्रहलाद को लेकर अपने कमरे में चली गई थी।

थप्पड़ क्यों नहीं मारा था.. रमेश के मुहँ पर सुनीता ने.. क्यों प्रहलाद को लेकर ऊपर चुप-चाप कमरे में चली गई। काश! सुनीता ने एक ज़ोर का लाहफा रमेश के मुहँ पर नारी के सम्मान में ही धर दिया होता.. तो रमेश जैसे कुत्ते आज समाज में भौंकने से डरने लगते।