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खानदान 39

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विवाह के बाद जब सुनीता का रामलालजी के घर में गृह-प्रवेश हुआ था.. तो सुनीता का चेहरा एकदम मस्त और गोल-मोल था। खाते-पीते और भरे-पूरे खानदान की जो थी.. सुनीता। सुनीता के चेहरे पर एक आत्मविश्वास अलग ही झलका करता था। सुनीता के रामलाल विला में आने के बाद से ही सुनीता के चेहरे की लालिमा कम होती चलीगई, और चेहरा मुरझाने के साथ-साथ सुनीता का आत्मविश्वास भी कम होने लगा था। कम हो भी क्यों न सुनीता का आत्मवुश्वास.. ब्याही तो सुनीता करोड़पति खानदान में थी.. और व्यवहार से किसी भी प्रकार से करोड़पति न लगते थे। हर प्रकार से चिंतित थी.. सुनीता इस परिवार में। चलो! अन्य सदस्यों को तो छोड़ो पर सबसे ज़्यादा चिन्ता का विषय रमेश ही था.. जो बार-बार सुनीता के दिमाग़ के शक के दायरे में था.. पर सुनीता पता नहीं कौन से डर से अपने मन की बात किसी को भी खुल-कर बता नहीं पा रही थी। वैसे जब आप किसी दुविधा में हों या फ़िर आप को कुछ गलत होने की आशंका हो.. तो अपनों या फ़िर किसी नज़दीकी रिश्तेदार से अपने मन की बात कह देनी चाहये.. सही समय पर सही सलाह और मदद मिल जाती है.. समाज क्या कहेगा.. यह सोच बिल्कुल ग़लत है.. क्योंकि एक न एक दिन समाज के आगे सब कुछ आ ही जाता है। छोटी से छोटी बात हमारे समाज में आग की तरह फैल जाती है।

सुनीता दर्शनाजी की आदर्श बहु होने का रोल बढ़िया निभा रही थी.. उधर रमेश सेतु के साथ अपनी ज़िंदगी को पूरी तरह से एन्जॉय कर रहा था। सुनीता के चेहरे की रंगत रमेश के बारे में सोच-सोच कर बिगड़ रही थी.. उधर रमेश को किसी भी बात से सिवाय अपने-आप के लेना-देना नहीं था। आराम से देहज की कार में लिये उस सेतु को मौज मरता-फिरता था। एक दिन अचानक ही रमेश सेतू को देहज में दी हुई मारुति कार में घर ले आया था.. और ऐसे ख़ातिरदारी करी, की सुनीता देखती ही गई थी। रूहअफजा से लेकर बाज़ार से समोसे और कचौरी तक भाग कर ले आया था.. रमेश..  वैसे देखा जाय तो दर्शनाजी तो घर आए मेहमान के साथ बिसनेस ही शुरू कर दिया करतीं थीं.. कौन कितना देकर जाएगा.. उसी हिसाब से उसे खिलाना-पिलाना है। पर यहाँ तो कुछ उल्टा ही आलम था.. दर्शनाजी को अच्छी तरह से पता था.. कि ऊपर सुनीता के कमरे में कौन बेठा हुआ है.. लेकिन फ़िर भी अनजान बनी आराम से नीचे बैठीं हुईं थीं। ऊपर सेतू की मस्त ख़ातिरदारी चल रही थी। जिसे देख सुनीता के मन में विचार आया था, कि,” जब मेरे घर से कोई आता है.. तो हरियाणे के रिवाज़ के मुताबिक काम होता है.. अब हरियाणे के रिवाज़ कहाँ गए”।

सुनीता ने रमेश के कहने पर सेतू को अच्छी तरह से सब-कुछ खिलाया-पिलाया और ठीक-ढँग से बातचीत भी करी थी। सुनीता सेतू के संग एकदम सहज थी.. क्योंकि अभी रमेश और सेतू के रिश्ते की गहराई से अनजान थी। सेतू को रमेश अपनी ही गाड़ी में वापिस भी छोड़ कर आया था। सेतू के जाते वक्त दर्शनाजी ने रमेश से कहा था,” उसके सामने क्यों ले गया.. इसने! इब देखिये तमासे!”।

दर्शनाजी का कहने का मतलब था, कि इस लड़की सेतू को सुनीता के सामने ऊपर क्यों लेकर गया.. तमाशे तो अब होंगें। रमेश ने अपनी माँ की इस बात पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया था। जब रमेश सेतू को घर छोड़ कर लौटा था, तो सुनीता ने रमेश से भोलेपन में कहा था,” जब कोई मेरे घर से आए, तो इसी तरह से ही उनकी भी ख़ातिरदारी करना!”। पर रमेश ने सुनीता की कही हुई बात का न ही कोई जवाब दिया था, और न ही कोई विशेष ध्यान। सुनीता को इस तरह से रमेश से बात करने की बजाय मामले को आर या पार रमेश की माँ को साथ लेकर उतार देना चाहये था। बात की दरसअल गहराई यह थी.. कि रमेश अपनी हर छोटी और बड़ी बात अपनी माँ से किया करता था.. और रमेश की परेशानी का हर हल दर्शनाजी अपनी सोच के हिसाब से ही निकाला करतीं थीं। सेतू रमेश और सुनीता के आपसी कमज़ोर रिश्ते का हल था। रमेश खुद एक कमज़ोर इंसान था.. जिसने अपनी माँ को कसकर पकड़ रखा था.. इस उम्मीद में कि शायद उसकी माँ ही उसे जीवन रूपी इस भवसागर से पार उतार देंगीं।

क्रेडिट कार्ड के पैसों से बढ़िया ज़िन्दगी चल ही रही थी। अब रामलालजी तो जॉइंट बिसनेस होने पर भी पैसे देते न थे.. रमेश को। इतना बढ़िया कलाकार था.. ये रमेश, कि सुनीता को कुछ समझने ही नहीं देता था। अब रोज़ एक नया खिलौना घर में आ रहा था.. जिसकी कोई ज़रूरत ही नहीं थी.. पर रमेश एक फैक्ट्री का मालिक था.. और प्रहलाद छोटा नवाब.. अब हो या न हो वो बात अलग है। घर तो रामलालजी ने बसा ही रखा था..  और रमेश का जीवन खूब रंगीन और मज़ेदार शुरू हो गया था।

सेतू भी अब प्रहलाद के खेलने के लिये नए-नए स्टफ टॉयज़ बना कर देने लगी थी। रमेश सेतू की घर में बेहद तारीफ़ किया करता था,” सेतू खाना-वाना भी बहुत अच्छा बनाती है.. सब कुछ जानती है”।

अब नया तमाशा शुरू हुआ था.. सुनीता को रमेश ने घर के गेट का डिज़ाइन दिखाया था। पर रामलालजी के घर में तो गेट था, और अभी नए गेट की तो कोई चर्चा भी नहीं थी..  फ़िर ये गेट का डिज़ाइन और गेट “ हमारी ही फैक्ट्री में बनेगा “.. अब रमेश ने घर के गेट बनाने का कौन सा अलग से कारोबार शुरू किया था.. अगर कोई काम शुरू किया था, तो अच्छी बात थी, या फ़िर कोई नाटक का नया एपिसोड शुरू हो रहा था।