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खानदान 38

indian wedding

सुनीता प्रहलाद के लालन-पालन में लगी रहती थी.. और रमेश शाम को सज-धज कर तैयार हो कर सफ़ेद रंग की मारुति कार में बैठकर जो सुनीता दहेज में लेकर आई थी..  निकल जाता था। सुनीता ने कभी रमेश से उसके जाने पर कोई भी सवाल नहीं पूछा था। लेकिन थोड़ा-थोड़ा रमेश के व्यवहार में बदलाव देख रही थी। रमेश सुनीता के साथ अब रूखा होता जा रहा था, और गलत भाषा का भी इस्तेमाल करने लगा था। इसका कारण सुनीता भी थी.. वो खुद भी रमेश के साथ ठीक ढँग से ताल-मेल न बिठा पाई थी.. अब रमेश को तो बाहर निकलना ही था। अगर सुनीता को रमेश पसन्द नहीं था.. तो पहले ही छोड़ देना चाहये था.. और नहीं, तो जैसा आदमी होता है.. उसे वैसे ही स्वीकार कर लेना चाहये। खैर! नहीं आ रही थी, सुनीता की बात  समझ में। करवा-चौथ का त्यौहार हो चुका था.. दीवाली आने वाली थी। रामलालजी के परिवार में हमेशा की तरह से दिवाली की ज़ोर-शोर से तैयारियाँ हो रहीं थीं। इस परिवार में दीवाली का त्यौहार बहुत ही धूम-धाम से मनाया जाता था।

आज ही के दिन दीवाली थी.. घर में पूजा कर और दीपक वगरैह जला कर रमेश ने प्रहलाद और सुनीता से कहा था,” चलो! तुम्हें कहीं बाहर घुमा कर लाता हूँ”।

सुनीता और प्रहलाद रमेश के साथ निकल लिये थे..” यह क्या! कारपेंटर की दुकान! .. हम तो सोच रहे थे , कि पता नहीं आप हमें कहाँ पर घुमाने ले जाएँगे”। सुनीता ने रमेश से कहा था।

“ ऐसे नहीं बोलते, कारपेंटर क्या आदमी नहीं होते!.. ज़रा आराम से उतर कर आ जाओ गाड़ी में से!”। रमेश ने दुकान के मालिक की तरफ़दारी करते हुए कहा था।

“ नही! मेरा वो मतलब नहीं था.. मैं तो ऐसे ही..”।

सुनीता और प्रहलाद गाड़ी से नीचे उतर आये थे.. कारपेंटर की दुकान अच्छी-खासी सजी हुई थी। दुकान के सभी सदस्य नए-नए कपड़ों में दीवाली की पूजा के लिये तैयार खड़े थे। “ अरे! जनाब! आप तो आज बहुत अच्छे लग रहे हैं”।

लाल रंग की सुंदर साड़ी पहने हुए, उसी मेहँदी वाली लड़की ने रमेश से कहा था। दुकान में अब पूजा शुरू हो गई थी.. मेहँदी वाली लड़की अब रमेश के साथ सटकर खड़ी हो गई थी.. सुनीता और प्रहलाद अलग खड़े थे.. जब आपको अपनी जगह संभालनी ही नहीं आती है.. तो उसे कोई और ले ही लेता है। यह बात पूरी तरह से सुनीता के साथ लागू हो रही थी। सुनीता आराम से पूजा में प्रहलाद को लिये अलग खड़ी थी.. पर यह लड़की अब सुनीता को खटकी थी। पूजा समाप्त हो चुकी थी.. “ सेतू, बेटा! यह प्रसाद सब में बाँट दे”।

मेहँदी वाली लड़की की माँ ने कहा था। “ ओह! तो इसका नाम सेतू है”। सुनीता को अब नाम पता चल गया था।

रमेश ने सुनीता को कारपेंटर के पूरे परिवार से मिलवाया था। सुनीता ने एक बात पर यहाँ पर गौर किया था.. रमेश एक ख़ास अधिकार की अनुभूति करते हुए, सुनीता को सभी परिवार के सदस्यों से मिलवा रहा था। एक ख़ास रिश्ते का अनुभव कर रहा था, रमेश उस लड़की सेतू के साथ। सेतू की एक बहन और छोटा भाई थे.. माँ तो खैर! होनी ही थी। सेतू की छोटी बहन एक अजीब सी हैरानी भरी हुई नज़रों से सुनीता को घूर रही थी। अब सीधी भोली सुनीता सारी बातों से बेख़बर बस! थोड़ा सा शक करता हुआ दिमाग़ लेकर सभी परिवार के सदस्यों से मिली थी। रमेश पूजा के बाद सुनीता और प्रहलाद को सेतू के घर भी लेकर गया था।” अरे! इतना छोटा सा दो कमरे का घर!”। सुनीता ने मन में सोचा था…” ग़रीब लगते हैं”। अपने आप में ही बोली थी सुनीता।

सेतू के घर से लौटते वक्त सुनीता ने रमेश से गाड़ी में कहा था,” सेतू लोग बहुत ग़रीब से लगे मुझे!”।

“ अरे! सीधे-साधे लोग हैं.. बेचारी सीधी-साधी है”। रमेश ने सुनीता के आगे सेतू की तारीफ़ करते हुए कहा था।

यह क्या,” यह इंसान तो थोड़ा भी कोई कम पैसे वाला हो, उसकी जम कर बेइज़्ज़ती करता है.. भूखे-नंगे, ये और वो। अब रमा के घर वालों की भी तो कितनी बेइज़्ज़ती करता है.. अपनी माँ के साथ मिलकर। पर यह परिवार बेचारा सीधा-साधा कब से हो गया। और ये लड़की.. सेतू भी सीधी-साधी है”। सुनीता ने मन में इस कारपेंटर के परिवार को लेकर और रमेश के बारे में मन में ही विचार किया था।

अब सुनीता का दिमाग़ इस सेतू को लेकर थोड़ा-थोड़ा काम करने लगा था।

अब तो रमेश के पास क्रेडिट कार्ड भी आ गया था.. तो नई-नई शौक-मौज की खरीदारी भी शुरू हो ही गई थी। अब क्रेडिट कार्ड से ही रमेश ने लेनेवो का कंप्यूटर ख़रीद डाला था। सुनीता कंप्यूटर को देख कर और उसकी पच्चास हज़ार कीमत जान कर हैरान रह गई थी। “ इतने पैसे कैसे चुकाओगे आप!”। सुनीता ने रमेश से सवाल किया था।

“ मुझे बेवकूफ़ समझ रखा है क्या!.. या कोई भूखे-नंगे हैं, हम! सब हो जाएगा”। रमेश का सुनीता को जवाब था।

रमेश का अपने ऊपर परमात्मा से भी ज़्यादा विश्वास देखकर सुनीता कुछ हैरान थी। “ माँ तो किसी भी कोने से करोड़पति नहीं लगती.. इसके पिताजी इसको पैसे देते नहीं हैं.. भाई का नाटक अलग चल रहा है.. फ़िर ये आदमी किसके भरोसे पर यह जुआ खेल रहा है”। एक बार फ़िर सोच में डूबी थी.. सुनीता।

सेतू और क्रेडिट कार्ड के रंगीन नज़ारे अब दिन रोज़ देखने को मिल रहे थे। परिवार में इन दोनों ही बातों का अभी खुलासा नहीं हुआ था। क्या सेतू और क्रेडिट कार्ड का पता चलने पर सुनीता का साथ देगा.. रामलालजी का परिवार.. या फ़िर एक नए नाटक को देखने के लिये तैयार खड़े हो जायेंगे परिवार के सदस्य दर्शक की तरह।