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खानदान 34

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सुनीता के मायके से सुनीता को भइया और भाभी लेने आ पहुँचे थे.. सर्दियों का समय था, इसलिये दिल्ली से इंदौर आने वाली सभी गाडियाँ कोहरे के कारण बहुत देरी से पहुँच रहीं थीं। सुनीता और उसके ससुराल वाले सवेरे से ही मेहमानों का इंतेज़ार कर रहे थे। इधर घर में भी दर्शनाजी ने दिल्ली से आ रहे रिश्तेदारों की ठीक-ठाक ख़ातिरदारी का इंतेज़ाम कर रखा था.. शाही खातिर का इंतेज़ाम तो न था.. पर हाँ! इंदौर वालों के हिसाब से तो उम्दा ही था। अब वैसे तो रामलालजी के परिवार में आने वाले को पानी भी मुश्किल से ही पूछा जाता था.. और दिल्ली वालों के लिये तो रमेश और उसकी अम्माजी ने भोजन-पानी की ठीक ही व्यवस्था कर रखी थी। यहीं परिवार की मानसिकता का पता चल रहा था..  घर में आने वाला हर मेहमान भगवान के बराबर होता है.. अतिथि की तुलना उसकी जेब से कभी नहीं करनी चाहये.. मेहमान को थाली में भोजन प्रेम व आदर से ईश्वर का भोग समझ कर ही कराना चाहये। पर यहाँ पर भी दर्शनाजी बिसनेस वाली ही चाल चल रहीं थीं। कौन सा मेहमान जाते वक्त कितनी जेब गर्म करके जा रहा है.. उसको उतना ही भोग लगाती थीं, और लगवाती भी थीं। सुनीता के मायके वाले बढ़िया पैसे वाले लोग थे.. सुनील जब भी इंदौर आता था.. तो बहन की सास और अपने जीजा की जेब हर बार पाँच सौ रुपये से ही गर्म करके जाया करता था। रामलालजी ने कभी-भी दिल्ली वालों से एक रुपया भी विदा में न लिया था.. हालाँकि मुकेशजी रामलालजी की जेब में ज़बरदस्ती रुपये डालने के लिये आगे बढ़ा करते थे.. पर रामलालजी ने साफ़ तौर पर कह दिया था,” आप कुछ भी कर लीजिये, पर यह हम न लेंगें”।

विनीत भी जब कभी रमेश की ससुराल दिल्ली गया तो उसनें भी कभी अपनी जेब में मुकेशजी या फ़िर अनिताजी से एक रुपया भी न रखवाया था। खैर! अब शाम होने को थी, और दिल्ली से देरी से आ रही रेल-गाड़ी अब इंदौर लगने को थी। रमेश अपने साले को लेने स्टेशन पहुँच गया था। भइया-भाभी के इंदौर आने पर सुनीता खुश थी। छोटा भतीजा अभिमन्यु और मुकेशजी के यहाँ आयी हुई नई मेहमान यानी मुकेशजी की नन्ही पोती और सुनील की छोटी बिटिया संस्कृति भी साथ आये थे। अगले दिन शाम को दिल्ली की वापिसी की ट्रेन थी.. अब सारे दिन भइया-भाभी खाली बैठकर करते भी क्या.. तो सुनीता के दिमाग़ में सबको दिन के समय शहर घुमाने का प्लान दिमाग़ में आया था.. सो! झट्ट से सुनीता ने रमेश के आगे कह डाला,” सुनो! ट्रेन का टाइम तो शाम का है.. क्यों न इन लोगों को इंदौर घुमा लाएँ, अभिमन्यु भी कितना खुश हो जायेगा”।

रमेश को आईडिया बिल्कुल भी बुरा न लगा था.. सभी लोग वहाँ बैठे हुए थे.. और दर्शनाजी भी वहीं थीं। अम्माजी के चेहरे के हाव-भाव इंदौर घुमाने के नाम से एकदम बदल गए थे, जो सुनील ने देख लिये थे.. और बात बदलते हुए तुरन्त बोला था,” नहीं! नहीं! हमें कहीं भी नहीं जाना है, मैं तो वैसे भी बहुत थक गया हूँ, सोच रहा हूँ, कि ऊपर सुनीता के कमरे में जाकर थोड़ा सा आराम कर लिया जाए”।

सुनीता भाईसाहब के थकान की बात सुनते ही उन्हें अपने साथ ऊपर कमरे में ले गई थी। कमरे में जाकर जब सुनीता ने भाईसाहब के हाल-चाल करीब से जानने चाहे थे, तो सुनील ने बहन को समझाते हुए कहा था,’ अरे! मुझे कोई थकान नहीं है.. पर यदि हम लोग इंदौर घूमने निकल पड़ते तो अम्माजी को ज़रूर खर्चे का अनुमान लगाते ही ब्लड प्रेशर हो जाता। मैं उनके चेहरे के हाव-भाव समझ गया था, इसलिये थकान का बहाना कर ऊपर आ गया हूँ। पर तुम इस विषय में ज़्यादा मत सोचना.. हम इंदौर फ़िर कभी घूम लेंगें”।

सुनीलजी भी दर्शनाजी का कौड़ी को लेकर लगाव जान गए थे। सुनीलजी और उनकी पत्नी अपनी बहन को लेकर जाने लगे थे.. चलते वक्त सुनील जी ने रमेश और बहन की सासु-माँ के हाथ में पाँच सौ का पत्ता रख दिया था.. पाँच सौ के पत्ते को देखकर दर्शनाजी के चेहरे पर रौनक देखने लायक हुआ करती थी। पर यहाँ सोचने और गौर करने वाली बात यह थी, कि चलो! सुनील की पत्नी अनु को तो भूल भी गई होंगी.. दर्शनाजी! पर अभिमन्यु और संस्कृति तो अभी छोटे बच्चे थे.. और अपनी बुआ की ससुराल पहली बार आ रहे थे। जब विदा लेते वक्त हाथ बढ़ाना आ रहा था, तो बच्चों को तो कुछ देना बनता ही था। चलो! सुनीता की तो अभी नई-नई बात थी.. पर संयुक्त परिवार था.. और ऊपर से करोड़पति.. तो भई! दर्शनाजी को इस विषय में सोचना चाहये था। पर वो कैसे सोचतीं, आख़िर महारानीजी ने एकतरफा बिसनेस करने में महारत हासिल करी हुई थी.. यानी केवल माल लेने में ही पीएचडी होल्डर थीं.. दर्शनाजी।

सुनीता अपने भाई-भाभी के साथ मायके के लिये विदा हो गई थी। जाड़े के कुछ दिन मायके में बिताने के बाद अब सुनीता प्रहलाद को लेकर वापस इंदौर आ गई थी। रामलालजी के परिवार में कुछ त्यौहार बेहद अच्छे ढँग से मनाए जाते थे.. इस परिवार में दीवाली के त्यौहार को विशेष महत्व दिया जाता था.. सुनीता को ससुराल की दूसरी दीवाली प्रहलाद के संग बेहद पसन्द आई थी। पहली दीवाली पर तो सुनीता दिल्ली में ही थी.. और रमेश भी वहीं पर पहुँच गया था। जिस पर दर्शनाजी ने ताना भी कस दिया था,” हमनें बेच कोनी रख्या अपना लड़का!”।

यानी दर्शनाजी का कहने का मतलब था, कि उन्होंने अपने लड़के का सौदा नहीं कर रखा है, उसकी ससुराल वालों के साथ।

खैर! इंदौर में दीवाली, दशहरा और सारे तीज त्यौहार बहुत ही धूम-धाम से मनाए जाते थे। सुनीता को रामलालजी के परिवार में केवल त्यौहार ही मन भाए थे। त्यौहारों पर सुनीता और रमा अच्छे ढँग से तैयार हुआ करतीं थीं.. दर्शनाजी पूरे परिवार के लिये खीर पकवान तैयार कर पूरी मेज भर दिया करतीं थीं। इस बार भी सुनीता और प्रहलाद जब रमेश के साथ दिल्ली से इंदौर वापस आये थे, तो मकर संक्रांति का त्यौहार नज़दीक आ गया था। यह त्यौहार हरियाणे में बहुत माना जाता है.. और बेहद धूम-धाम से मनाया जाता है। दर्शनाजी ने सुनीता को बताया था, क्योंकि वो अभी नई थी.. कि,” हमारे हरियाणे में मकर संक्रांति पर खीर हलवा ज़रूर बनता है, हमारे यहाँ इस त्यौहार की बहुत मान्यता है”।

रामलालजी के यहाँ मकर संक्रांति का त्यौहार बेहद धूम-धाम से मनाया गया.. सभी ने नए वस्त्र पहन गाय को गेहूँ का भोजन करवा परिवार में खीर और हलवे का भोग लगाया। वाकई ठीक ही कहतीं हैं.. दर्शनाजी! हरियाणे में मकर संक्रांति की बहुत मान्यता है।

सुनीता, रमेश, प्रहलाद और पूरे रामलालजी के परिवार की ओर से आप सभी को मकर संक्रांति की हार्दिक बधाई!