दादी नहीं रहीं.. यह ख़बर सुन रामलालजी के परिवार की रोज़ वाली रौनक में थोड़ी सी भी कमी न आई थी। चलो! कोई बात नहीं, नहीं होगा दादी से लगाव! होता है।” सौ बरस की होंन वाली होगी”।
दर्शनाजी ने अपनी सासु-माँ के लिये कहा था। उनका कहना था, कि श्रीमती लौंगश्री लगभग सौ बरस की होने वाली होंगी। अब क्योंकि दादी न रहीं थीं, इसलिये कुछ भी हो अब तो गाँव जाना बनता ही था। सुनीता परिवार के सारे कार्यकलाप सामने ही खड़े होकर देख रही थी.. अभी उम्र कम होने के कारण और पीछे मायके की हर तरह से मजबूत होने की वजह से किसे जाना चाहये था, या फ़िर किसे जाना चाहये.. इन सब बातों से थोड़ा परे ही थी.. केवल परिवार में दर्शक बनी खड़ी थी। रामलालजी के मुहँ से अब भी गाँव जाने को लेकर कुछ भी न निकला था। परिवार में आपस में ही गाँव जाने को लेकर चर्चा चल रहा था, जिसमें रामलालजी का कोई भी रोल नहीं था। आख़िर में फैसला हो चुका था.. विनीत और दर्शनाजी ही दादी के अंतिम समारोह में गाँव जाएँगे। रमेश की तो इस वक्त परिवार में कोई औकात वैसे भी न थी.. केवल अपनी माँ का ही खुट्टा था वो।
विनीत और दर्शनाजी पूरी तरह से तैयार हो अब गाँव जाने के लिये तैयार खड़े थे.. रामलालजी ने अभी भी अपनी माँ के अंतिम समारोह में जाने की जिज्ञासा प्रकट ही न कि थी, पत्नी और बेटे को टाटा बोलने ऐसे खड़े थे.. जैसे कि कोई रिश्तेदार खड़ा हो। पहला ऐसा इंसान अपना खुद का ही बेटा देखने को मिल रहा था.. जो अपनी माँ को अँतिम विदाई खुद ही देना नहीं चाहता था.. जबरदस्ती कोई भी किसी से कुछ नहीं करवा सकता.. रामलालजी को शायद खुद भी अपनी माँ से कोई लेना-देना नहीं था, दर्शनाजी तो केवल एक बहाना मात्र थीं। खैर! माँ-बेटे गाँव के लिये रवाना हो चुके थे.. इधर रमेश ने अपने ससुर साहब मुकेशजी को दादी की शोक सभा में शामिल होने व माँ और भाई के आने की ख़बर दे दी थी।
मुकेशजी दादी के जाने से शोकाकुल हो गए थे.. सज्जन पुरूष जो थे। मुकेशजी ने अनिताजी को लेकर अपने संबंधी के गाँव में उनकी माँ की शोक सभा में शामिल होने का निर्णय ले लिया था.. जो कि हर इंसान का फ़र्ज़ बनता है.. गए हुए इंसान की आत्मा की शांति के लिये प्रार्थना करना.. दीन-दुनिया के हर काम से ज़्यादा ज़रूरी होता है.. बीता हुआ कल और गया हुआ कोई भी रिश्ता कभी वापिस लौट कर नहीं आते। दुनिया तो यूँहीं चलती रहती है।
मुकेशजी और अनिताजी अब गाँव जाने के लिये विनीत और दर्शनाजी के संग पूरी तरह से तैयार थे.. पर अपनी गाड़ी से पहले अपनी बिटिया के ससुराल वालों और अपने मेहमानों को स्टेशन लेने गए थे। स्टेशन से गाड़ी में बैठने के बाद विनीत ने गाड़ी चलाने का काम मुकेशजी से अपने हाथ में ले लिया था। यह कहकर,” लाओ! बाबूजी में संभालता हूँ”।
मुकेशजी, अनिताजी और दर्शनाजी आपस में हुए वाकये और दूसरी तरह की बातचीत करते हुए चल रहे थे.. कि अचानक से बातों ही बातों में मुकेशजी के मुहँ से अपनी समधन दर्शनाजी को देखकर निकल गया था,” छोड़ो! मैडम सब! दोनों बेटों का बटवारा करो, और चलो हरिद्वार नहाने चलते हैं। बच्चे सँभाल लेंगें सब”।
सज्जन पुरुष और नेक दिल इंसान की हैसियत से मुकेशजी ने दर्शनाजी से विनीत के आगे यह बात दर्शनाजी से बोल दी थी.. पर दर्शनाजी एक कुशल राजनीतिज्ञ और आम महिला न होने के कारण मुकेशजी को तो पलट कर जवाब नहीं दिया था.. पर उनके कहे हुए शब्द अपने मन की डायरी में दर्ज कर लिये थे, जो आगे तीर चलाने के काम आने वाले थे।
मुकेशजी की गाड़ी अब गाँव के अन्दर पहुँच चुकी थी,” ओर! कढ़े बढ़ रया से!”।
गाँव के अन्दर घुसते ही विनीत और दर्शनाजी का साक्षत्कार रामलालजी के छोटे भाई राममेहर से हो गया था । जिसने अपने हरियाणवी लहज़े में विनीत और दर्शनाजी का स्वागत करते हुए कहा था.. और किधर को!
“ बक़वास करे है, यो साला”।
विनीत ने अपने चाचा के लिये ये मीठे शब्द बोले थे.. चाचा और विनीत लगभग एक ही उम्र के जो थे। विनीत ने मुकेशजी को भी समझा दिया था,” ऐसे ही चलता है, बाबूजी इधर हम लोगों में आप लोगों की तरह से हाँजी और नाजी नहीं चलता”।
गाड़ी गाँव में घर के द्वार पर रुकी थी। “ इब के करण आ गई, इब भी न आई होंदी!”।
“ अब क्या करने आ गई, अब भी नहीं आती”।
दर्शनाजी को गाड़ी से नीचे उतरते ही उनके दूसरे नम्बर के देवर ने ताना मारा था। और देखा जाए तो बात भी सही थी.. इतने फोन जाने पर भी, कि माँ बीमार है, और शायद फ़िर कभी न मिले.. कोई न आया था.. अब आकर कौन से नाटक की खानापूर्ति कर रहीं थीं.. दर्शनाजी। पतिदेव को तो झाँकने तक न दिया था.. वाकई में इस औरत के नाटकों ने तो अच्छे-अच्छे राजनीति करने वालों को पीछे छोड़ दिया था। वाह! रे दर्शनाजी! कमाल की औरत निकली। अब देखना यह था.. कि गाँव में चल रहे दादी के शोक समारोह में अपने साथ लाए हुए मेहमानों को मध्य-नज़र रखते हुए अपनी इज़्ज़त बनाते हुए कौन सा नया नाटक मंच पर पेश करेगी ये शातिर दिमाग़ औरत श्रीमती दर्शनाजी।

