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खानदान 29

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सुबह के साढ़े-सात बजे का समय पर्दा रामलालजी के परिवार से उठता है.. “ कुछ बनया के नहीं! लेट हो जंगा मैं”।

रामलालजी ने दर्शनाजी को आवाज़ लगाई थी।

रामलालजी दर्शनाजी से फैक्ट्री जाने से पहले पूछ रहे थे.. कि कुछ चाय-नाश्ता तैयार हुआ कि नहीं.. काम के लिये देरी हो रही है। उधर से जवाब आया था..

“लाऊँ सूं.. फुक्कन लाग री सूं”।

दर्शनाजी का जवाब आया” ला रही हूँ, बना रही हूँ”।

सुबह-सवेरे होते ही पति-पत्नी यानी के रामलालजी और दर्शनाजी की नोक-झोंक शुरू हो जाया करती थी। एक दूसरे को हरियाणवी भाषा में जुमले कसना सुबह से ही शुरू हो जाया करता था। सुनीता रामलालजी के जाने के समय नीचे ही घर के काम-काज में लगी होती थी। दोनों ही सास-ससुर बच्चों की तरह से लड़ना सुबह से ही शुरू हो जाया करते थे, सुनीता को दर्शनाजी के हरियाणवी भाषा में कसे हुए जुमलों पर बहुत हँसी आती थी.. दूसरा दर्शनाजी को अपने पतिदेव को ताने कसने में मज़ा भी बड़ा आता था। दर्शनाजी ने ही एक बार जब वे अच्छे मूड में थीं.. तो बताया था,” मेरी और पापे की शादी बचपन में ही हो गई थी”।

दर्शनाजी ने बताया था,की उनका और रामलालजी का ब्याह बचपन में ही हो गया था। दर्शनाजी ने अपने और रामलालजी के बचपन को लेकर परिवार में क़ाफी क़िस्से सुनाए थे.. कुछ भी कहो क़िस्से थे, मज़ेदार। दर्शनाजी ने बताया था, कि,” यो सैंडल पहर कर कुएँ पर खड़ा दिखाया करदा, अपने छोटे बहन भाइयों ने कमर पर लादें.. मेरी बहन देखदी ही बोल्या करदा .. मने भी दिवा नई सैंडल”।

दर्शनाजी का कहना था.. रामलालजी अपने छोटे बहन-भाइयों को अपनी कमर पर लाद कर कुँए पर खड़े रहते थे। जैसे ही उनकी बहन जो उसी गाँव में ब्याही थीं, पानी भरने आया करतीं थीं.. रामलालजी का कहना हुआ करता था.. “ खुद तो नए सैंडल पहन कर आतीं हैं, और मैं पुराने सैंडलों में खड़ा रहता हूँ”।

कभी-कभी दर्शनाजी अपने और रामलालजी के कुछ प्यारे क़िस्से भी सुना दिया करतीं थीं। सुनीता के हिसाब से सासु-माँ का कभी अच्छा मूड भी हुआ करता था, पर भरे परिवार में और कोई भी कमी न होते हुए भी.. न जाने ये औरत इतनी बुरी तरह क्यों अपना सिर पटक कर अपशगुन किया करती थी।

“ ओ आ गया कुत्ता! ”।

दोपहर के समय जब रामलालजी घर पर भोजन के लिये आते थे, और उनकी गाड़ी रुका करती थी, तो इसी तरह से पूज्य पतिदेव को दर्शनाजी कुत्ता कहकर ही संबोधित किया करतीं थीं।

“ मने तू कुत्ता! गधा! न बोल्या कर सबके सामने”।

रामलालजी बेचारे दर्शनाजी से रिक्वेस्ट करते रह जाया करते थे, कि वो उन्हें पूरे परिवार के आगे यूँ कुत्ता और गधा न बोला करें.. उन्हें शर्म भी आती है, और बुरा तो लगता ही है।

इतनी बडी संपत्ति के मालिक होते हुए भी रामलालजी दर्शनाजी की पूरी परिवार के सामने गन्दी गालियाँ खाने पर मजबूर थे.. क्योंकि वो एक कमज़ोर और डरपोक इन्सान थे। जहाँ परिवार का मुखिया कमज़ोर होता है.. और औरत के हाथ में हुकूमत होती है, वहाँ परिवार का डूबना निश्चित होता है। रामलालजी केवल नाम के ही मालिक थे.. हुक्म तो उनकी श्रीमतीजी का ही चलता था। घर के सारे फैसले दर्शनाजी ही लिया करतीं थीं.. और सभी फ़ैसले उल्टे और परिवार के ख़िलाफ़ हुआ करते थे.. पर कमाल की बात यह थी, कि अम्माजी के फैसलों के ख़िलाफ़ जाने की हिम्मत रामलाल विला में परमात्मा की भी न थी।

रामलालजी और दर्शनाजी में इतना प्रेम था, कि दोनों में आपस में मार-पिटाई भी हो जाया करती थी.. भयकंर रूप से तो नहीं, बस! सबके सामने एक दूसरे के थप्पड़-चट्टू रख दिया करते थे.. हाँ! एक बात तो तय थी, कि पति-पत्नी का फ्री शो सारे परिवार के सामने हुआ करता था। दोनों ही पति-पत्नी के आपसी संबंधों को मध्य नज़र रखते हुए दोनों ही लड़के अपने माँ-बाप का अलग-अलग तरह से फ़ायदा उठा रहे थे।

विनीत जानता था, बापू माँ और रमेश दोनों से ही परेशान रहता है.. रमेश से इसलिये क्योंकि वो माँ के कहे में आकर बापू को जो उल्टा-सीधा जो बोल दिया करता था। विनीत पूरी तरह से रामलालजी की तरफ़ था, एक बार रमा के मुहँ से निकला भी था,” मेरी माँ कहती है, जो आदमी पॉवर में हो, यानी मालिक को मक्खन लगा कर रखना चाहिए ”।

बापू की सेवा करने के बहाने से विनीत की नज़र पूरी फैक्टरी पर थी। इधर रमेश माँ की अंधी भक्ति और किसी और लालच में पिता की नज़र में अपना स्थान खोता जा रहा था। क्या सुनीता रमेश को रची हुई साज़िश के बारे में समझा पाएगी.. या फ़िर साजिशों के जाल में अपनी और रमेश की ज़िंदगी को उलझते देख अपनी क़िस्मत और परमात्मा की मर्ज़ी मान बैठेगी।