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खानदान 28

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पता नहीं क्यों सुनीता और रमेश का तालमेल बैठ ही नहीं पा रहा था।अब तो दोनों के जीवन में प्रहलाद भी आ गया था.. फ़िर भी पति-पत्नी का रिश्ता न जाने क्यों मज़बूती ही नहीं पकड़ रहा था। सुनीता के विचार किसी और दिशा में थे, वहीं रमेश और ही किसी विचारों का इंसान था। दोनों का पारिवारिक परिवेश में भी ताल-मेल न था। उधर दर्शनाजी के भयंकर नाटकीय अंदाज़ ने माहौल को पूरी तरह से दुविधा में डाल रखा था। परिवार में हर मोहरे का अभिनय जो था.. वो केवल दर्शनाजी के नाटकीय अंदाज़ के हिसाब से ही चल रहा था। दर्शनाजी रानी की लाल वाली गोटी थीं.. बाकी सारी की सारी गोटियाँ इस लाल गोटी के इर्द-गिर्द घूम रहीं थीं।

प्रहलाद को परिवार में किसी भी तरह की कोई कमी न थी, पैसे वालों का पोता जो था। सब कुछ होते हुए भी, उस परिवार में सुनीता को एक बहुत बड़ी कमी का एहसास बार-बार हो रहा था.. अपना और हमारा। यानी के सुनीता के हिसाब से जो वास्तु सुख वो और प्रहलाद उस परिवार में भोग रहे थे.. वो तो रामलालजी का दिया हुआ था.. उस परिवार में रमेश का खुद का क्या था!.. उस परिवार में सुनीता को कोई भी चीज़ भोगते हुए उसमें उधार के अहसास वाली बात आ ही जाती थी। जो कुछ सुनीता महसूस कर रही थी, वो सब वो खुल कर रमेश से कहने में असमर्थ थी। सुनीता को रमेश बार-बार अपनी माँ का बेबी नज़र आ रहा था। हर इंसान की अपनी खुद की एक पहचान होती है, जो सुनीता को रमेश के अन्दर ढूंढ पाना असंभव सा लग रहा था। दिमाग़ के तार उस रमेश को देख कर सुनीता के हर बार उलझ जाते थे.. उधर माँ-बापू को किया हुआ वादा भी था,” कुछ भी हो घर बसा कर दिखाओ”।

कोशिश करते हुए भी सुनीता रमेश और उसकी माँ के नाटकों का शिकार होती चली गई थी। नाटकों में उलझी सुनीता अपने मन के कहीं किसी कोने में सच को छुपाए अपने रमेश के प्रति समर्पण में नाकयाब रही। जहाँ पति-पत्नी के रिश्ते के बीच मन से एक दूसरे के प्रति समर्पण नहीं होता, वहाँ रिश्ते में दरार आ जाती है.. रमेश और सुनीता के बीच आई हुई इस छोटी सी दरार जिसने आगे चलकर बड़ा रूप लिया.. दर्शनाजी ने अपनी जगह इसी दरार के बीच में बना डाली थी.. और अपना हाथ रमेश के सिर पर रख दिया था।

सुनीता का देहज में लाया हुआ सोना और सुनीता और रमा आपस मे बात करतीं हैं. यह परिवार में नया मुद्दा था। दर्शनाजी ने रामलालजी को गालियाँ बरसाने के अलावा ये दो नए मुद्दे भी अब सारे परिवार के बीच फेंक डाले थे। और तो और रमेश को विनीत की दोनों बेटियों से लगाव था.. आख़िर चाचा जो था..  पर दर्शनाजी तो अपना काम चारों तरफ़ से ही करे चल रही थी.. इसलिये थोड़ा-थोड़ा यानी के बूंद-बूंद ज़हर इन दो मासूम लड़कियों के लिये भी रमेश के मन में भरना शुरू कर दिया था। रमेश की दुनिया केवल अपनी माँ और माँ की सोच तक ही सीमित होती चली जा रही थी। पर अक्सर देखा यह गया है,कि बेटा ब्याह के बाद पराया होता ही चला जाता है.. फ़िर सुनीता अपनी छाप रमेश पर छोड़ने में क्यों हर बार असफल होती जा रही थी।

परिवार में लक्ष्मी के आने-जाने का सही पता केवल तीन ही लोगों को था.. दर्शनाजी, विनीत और रमा। वो इसलिये क्योंकि रामलालजी और विनीत ही फैक्ट्री से लेना-देना रख रहे थे.. रमेश अपनी माँ के वफादार कुत्ते की भूमिका निभा था।

वैसे तो रमेश सुबह की चाय पीकर दोपहर के बारह बजे तक के लिये सो जाया करता था.. लेकिन कुछ दिनों से सुनीता ने एक बात पर गौर किया था, कि रमेश सुबह ही उठकर किधर चला जाता है.. और लौटता है.. तो हाथ में नोटों की गड्डी होती है। इस बात को एक दिन रमा ने भी रसोई में खड़े होकर कहा था,” अरे! यह कहाँ जा रहा है, सुबह-सुबह”।

सुनीता ने रमेश के पास आये हुए पैसों के बारे में बिल्कुल भी न पूछा था। बल्कि रमेश के मुहँ से खुद ही निकल गया था,” कबाड़े के पैसे हैं, जो फैक्ट्री में पड़ा रहता है”।

भई! अब कारोबार बड़ा था.. तो कबाड़ा पड़ा ही रहता होगा फैक्ट्री में.. इस कबाड़े से आ रहे पैसे के बारे में रमा और दर्शनाजी को पता था। सुनीता रमेश के हाथ में रुपये पैसे तो देख लेती थी, पर पूरी तरह से उस आ रही लक्ष्मी के बारे में पता नहीं लगा पाती थी। चलो! परिवार का सामूहिक कारोबार था, और उस परिवार की आमदनी का भी यही तरीका था.. पर इन पैसों से रमेश को लेकर घर बसाने वाली बात बिल्कुल भी न लग रही थी। कितना पैसा लाता है, और कितना खर्च कर देता है, इसका कोई  हिसाब-किताब न था। और वैसे भी घर बसाना तो सुनीता को ही लग रहा था, रमेश के हिसाब से तो उसके अपनी माँ-बाप और परिवार का घर बसा-बसाया ही था। घर से रमेश का मतलब अपने और सुनीता के घर से अलग से नहीं था। रमेश इस वक्त अपनी माँ का हैप्पी गो लकी बॉय था।

उधर विनीत भी कोई न कोई फैक्ट्री में ही पैसों का जुगाड़ करता था। पर विनीत की आमदनी का क्या हिसाब- किताब है, यह किसी को कानों कान ख़बर नहीं थी। विनीत के मुहँ से हमेशा यही सुनने को मिलता था,” बापू पैसे कोनी देता!”।

कहने का मतलब रामलालजी से हुआ करता था, कि वो पैसे देते ही नहीं हैं।

शुरू से यह एक ही नाटक रामलाल परिवार में धड़ल्ले से चल रहा था.. “ पैसे ही कोनी”।

दो-दो फैक्ट्री चल रहीं थीं.. पर पैसों के पीछे क्लेशखोरी चौबीस घन्टे मचा कर रखी जाती थी। और तो और भोजन को लेकर भी दर्शनाजी ने भूखा-पन मचा कर रखा हुआ था।

अब परिवार में राजनीति का खेल पूरी तरह से शुरू हो गया था.. जिसका दूसरा और अहम शिकार अब सुनीता बन चुकी थी। रमेश को अपने काबू में न कर पाने वाली कमज़ोरी को दर्शनाजी ने अपने हाथ में ले लिया था.. जिसका इस्तेमाल उन्होनें रमेश के द्वारा ही सुनीता के ख़िलाफ़ करवाना शुरू भी कर दिया था।

अब दर्शनाजी का नया निशाना सुनीता और उसका परिवार था। क्योंकि वो रमेश का सुनीता को लेकर असंतोष समझ रही थी, और किसी कोने में यह भी जानती थी, कि सुनीता एक संस्कारी लड़की है, हो न हो रमेश पर अपने तरीके से काबू पा ही लेगी, और दर्शनाजी के हाथ से उसका लड़का हमेशा के लिये पत्नी का होकर रह जायेगा। आने वाले रमेश और सुनीता के हर एक पलों पर काबू पाने की कोशिश में कौन-कौन से तीर चलेंगें दर्शनाजी की तरफ़ से.. सासु-माँ के निशाने क्या रंग लाएँगे सुनीता और रमेश के दाम्पत्य जीवन पर..  क्या हर वार को झेलकर भी सुनीता अपनी कामयाबी का झंडा लहरा पायेगी या फ़िर टूट कर बिखरने को मजबूर हो जायेगी।