Posted on

खानदान 22

indian wedding

प्रहलाद बहुत सुन्दर बच्चा था। जब पैदा हुआ था, तभी अच्छा-खासा वज़न में तीन किलो का बेबी पैदा हुआ था। रंग में भी सफ़ेद गोरा था,एकदम। अभी सुनीता का शरीर कच्चा होने कारण अनिताजी ने सुनीता को घी और मेवे खिलाने शुरू कर दिये थे, ताकि शरीर को खोई हुई ताकत वापस आ सके। माँ अपने माँ-बापू के साये में थी, और नाती अपने नाना-नानी के यहाँ। हालाँकि यह ज़िम्मेदारी इंदौर वालों की बनती थी, पर दर्शनाजी का तो पोता होने के बाद कुछ अता-पता ही न था। न ही नवजात शिशु को लेकर इंदौर से ही कोई फ़ोन आया करते थे। कुछ अजीब सा लगता है, घर में इतने साल बाद पोता आया था, और कोई खैर-ख़बर ही न ली थी.. न ही कोई मिलने ही आया था, एक रमेश को छोड़कर। दिल्ली वालों ने इस बात पर ज़रा भी ध्यान न दिया था, कि इंदौर से कोई उनकी बेटी को पूछ रहा है, कि नहीं.. वे तो बस! एक आदर्श माता-पिता की तरह से अपनी बेटी की सेवा में लगे हुए थे.. अक्सर लोग यहीँ गलती कर जाते हैं,  सही को सही और गलत को गलत समय रहते ही बोल देना आवश्यक हो जाता है। आख़िर ब्याह के पश्चात सुनीता पुरी तरह से ससुराल वालों की ज़िम्मेदारी थी.. न कि मायके की। होता क्या है, कि लोग बहु को ब्याह कर घर तो ले आते हैं, पर ज़िम्मेदारी माँ-बाप की ही रहने देना चाहते हैं। इस तरह के पिछड़े हुए रिवाज़ हमारे समाज में होने नहीं चाहिए.. ससुराल वाले और लड़का जिसका ब्याह के बाद सही ज़िम्मा बनता है, अपना मुहँ चुराते हैं, और अपनी बहू का पूरा बोझ उसके मायके वालों पर रिवाज़ों के नाम पर डाल देते हैं। बात यह होती है, कि रिवाज़ कुछ नहीं होते हैं.. बस! लोग रिवाज़ों के नाम पर अपना खर्चा बचा रहे होते हैं। मुकेशजी को भी फ़ालतू के मायके के रिवाज़ न चलाकर सुनीता को इंदौर में ही रहने देना चाहये था, ताकि लोगों और असलियत का पता चले, जो कभी न कभी तो सामने आती ही है.. आख़िर ब्याह-शादी एक या दो दिन का रिश्ता न होकर उम्र भर का बन्धन होता है.. या तो सही ढँग से रिश्ता कायम हो.. नहीं तो देखावे की डोर को खींचने का कोई फ़ायदा न होता है.. झूठे दिखावे का बोझ न ढोकर ग़लत रिश्ते को ख़त्म करने में ही भलाई होती है.. गलतियों का बोझ न ढोकर आगे बढ़ने में ही सच्ची पहचान होती है।

यहाँ पर मुकेशजी और उनका परिवार सुनीता को अपने घर मे बेटी का फर्ज़ अदा कर अच्छा तो बहुत बन रहा था.. पर इंदौर वाले सिर्फ़ और सिर्फ़ पैसे के प्रेमी इस अच्छाई का पहले दिन से ही फ़ायदा उठा रहे थे। मुकेशजी को भी रामलालजी और उनके परिवार की सोच का कहीं अहसास था, पर एक बेटी के पिता होने के नाते से मुकेशजी आने वाले दस साल के बाद जो बेटी को सुख मिलने वाला था, उसके बारे में सोचकर इन छोटी-मोटी औपचारिकताओं को नज़र अंदाज़ किये जा रहे थे। वो दस साल के बाद बिटिया को मिलने वाला कौन सा ख़ास सुख था.. “ हिस्सा ”।

“ हिस्सा” .. आख़िर संपत्ति की तो रामलालजी के परिवार में कोई कमी थी ही नहीं, वैसे भी दर्शनाजी का तो रोज़ का डॉयलोग हो ही गया था, कि” राजा के घर मे मोतियाँ की के कमी”।

ये जो राजा के घर में मोती बिखरे पड़े थे, यह सारा पारिवारिक नाटक उन्हीं मोतियों को समेटने का ही तो था, जो आगे के दस साल तक जाना ही नहीं था। घर के सदस्यों की नज़र मोतियों के भंडार पर ही तो थी, जो वक्त रहते समेटने की प्लानिंग जो चल रही थी। प्लानिंग में सबसे अव्वल नम्बर पर विनीत और रमा ही आ रहे थे। सबसे बढ़िया अंडरग्राउंड प्लांनिंग जो कर रहे थे, दूसरा नम्बर दर्शनाजी का था, जिन्हें अपने ऊपर खुद से भी ज़्यादा भरोसा था, कि आख़िर पति के मोती उनके ही मोती तो हैं.. जायेंगे कहाँ!

यहाँ प्रहलाद अब धीरे-धीरे नाना के घर में किलकारियां भरता हुआ अब केवल अपने पहले रिश्ते यानी के माँ को पहचानने लगा था। अनिताजी सुनीता को शिशु की परवरिश के विषय में रोज़ कुछ न कुछ बताया करतीं थीं। एक दिन सुनीता ने गौर किया, कि प्रहलाद की नाक हल्की हल्दी जैसी पीली क्यों लग रही है.. पास आकर एकदम ध्यान से देखा तो,” हाँ! नाक तो पीली ही थी”।

एक दो दिन बीत गए, फ़िर सबनें प्रहलाद की तरफ़ देखा,” अरे! यह क्या! बच्चा तो एकदम पिला ही पड़ता चला जा रहा था, नाक, आँख और नाखून तक पीले पड़ गए थे”।

सुनीता माँ से बोली थी,” एक दो दिन मैने भी प्रहलाद का चेहरा देखा था, पीला सा दिख रहा था”।

“ हमें बताया क्यों नहीं” अनिताजी ने कहा था।

अब सभी प्रहलाद की चिन्ता में कि बच्चा पीला क्यों पड़ रहा है, प्रहलाद को अस्पताल लेकर भागे थे। अस्पताल पहुँचकर डॉक्टर साहिब का कहना था,” कोई चिन्ता वाली बात नहीं है, बच्चे को पीलिया हो गया है… जो घरेलू नुस्खों से ही ठीक हो जायेगा”।

सुनीता प्रहलाद के पीलिये को लेकर चिन्ता में आ गई थी, पहले कभी सुनीता ने घर में किसी और सदस्य को पीलिया देखा न था, प्रहलाद को पीलिया हुआ तो घबरा गई.. अभी नई-नई माँ जो बनी थी। खैर! डॉक्टर द्वारा बताए गए घरेलू नुस्ख़े चालू कर दिये गए थे.. सुबह-शाम धूप दिखाना और बच्चे को केवल माँ का ही दूध देना.. ऊपर का कोई आहार नहीं। सुनीता ने रमेश को भी फोन पर प्रहलाद के पीलिये की ख़बर कर थी.. सुनकर गाँव से सीधे दौड़े चले आये थे।

दर्शनाजी पोते की पीलिये होने की ख़बर से भी बच्चे को देखने रमेश के साथ बिल्कुल भी न आयीं थीं।

क्या चल रहा था.. दर्शनाजी के मन में, ऐसी दादी तो पहली बार देखने में आ रही थी.. जो न पोता हुआ तब आई और अब बीमार पड़ गया है, तब भी आकर ही नहीं दे रही थी। देखा जाय तो खून के रिश्तों में बहुत ताकत होती है, मूल से ब्याज प्यारा होता है.. पर दर्शनाजी ने तो खून के रिश्ते का प्रहलाद को लेकर मतलब ही बदल कर रख दिया था। किस दिमाग़ और सोच की महिला थी, ये दर्शनाजी..  कुछ समझ न आ पा रहा था। इंदौर में कुछ और दिल्ली में कुछ नज़र आया करती थी।