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खानदान 21

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छोटे भतीजे अभिमन्यु, सुनीलजी और माँ के साथ सुनीता अब अस्पताल पहुँच गई थी। डॉक्टर साहिबा ने अपनी प्रक्रिया शुरू कर दी थी, सुनीता सुबह के लगभग दस बजे अस्पताल में दाख़िल हुई थी, और दोपहर के दो बजे ईश्वर ने सुनीता को एक पुत्र की माँ होने का आशीर्वाद दे दिया था। सबनें कहा था,” देखा! अभिमन्यु के मुहँ से निकले हुए शब्द ठीक निकल गए, घर मे एक छोटा सा काका आया है”। पुत्र के आने से सुनीता बहुत खुश थी, नन्हें से फ़रिश्ते को गोद में पा कर सुनीता माँ बनने की पीढ़ा को भुला चुकी थी। घर में खुशी का माहौल बन गया था, अभिमन्यु पुरे अस्पताल में नाचता फ़िर रहा था,” देखो! नया काका हमारे घर आया है”। सारे अस्पताल में हर एक के पास जाकर अभिमन्यु बस यही बात कह रहा था। मुकेशजी और अनिताजी भी नाना-नानी बनने की खुशी मना रहे थे। सुनील जी अपने भानजे के लिये बाज़ार से जाकर छोटे-छोटे प्यारे से नए कपड़े खरीद कर लाए थे। मासूम फ़रिश्ते के आने से घर का सारा माहौल ही एकदम बदल गया था। मुकेशजी ने खुशी में अभिमन्यु के खेलने के लिये अस्पताल में ही कुछ खिलौने और गुब्बारे मँगवा कर दिये थे। सुनीता खुश और पुत्र के आने से संतुष्ट थी, सोच रही थी कि,” रमेश और अम्माजी को पता चलेगा तो दौड़े चले आएँगे”।

रमेश के पिता बनने की ख़बर सुनीलजी द्वारा फ़ोन पर दे दी गई थी। सुनीता और मुकेशजी सोच रहे थे, विनितजी के पास तो केवल दो बेटियाँ ही हैं, घर मे यह पहला पुत्र है.. इस बच्चे की ख़बर सुन कर इंदौर वाला परिवार न जाने कितना खुश होगा.. खुशी में नाच ही उठेगा। सुनीता की सोच के हिसाब से,” अम्माजी तो पोते की दादी बनने की खुशी में नाचती हुई दौड़ी चली आएँगी”।

रमेश को जैसे ही पिता बनने की ख़बर मिली थी, वह शाम होने से पहले ही अस्पताल दौड़े चले आये थे।” यह क्या! अम्माजी कहाँ हैं!”। सुनीता ने रमेश को देखकर सवाल किया था।

“ वो नहीं आई”। रमेश ने अपनी माँ के लिये कहा था।

सुनीता अपनी सासु- माँ के न आने से हैरानी में पड़ गई थी,” अरे! इतने दिनों के बाद घर में पहले बेटे की खुशी आयी है, अम्माजी नहीं आईं, मैं तो सोच रही थी, कि पोते के आने की खुशी में दौड़ी चली आएँगी.. और वैसे भी रमेश तो पहली बार पिता बने हैं, हरियाणे से तो अम्माजी को रमेश के साथ ही आना चाहये था.. चलो! इंदौर होता तो कोई बात नहीं थी”।

खैर! यह सब सुनीता ने केवल अपने मन में ही सोचा था, पर रमेश से कुछ भी न बोली थी। रमेश का अपने पुत्र को अस्पताल में देख खुशी का ठिकाना न था।खुशी में रमेश अनिताजी के सामने बोल ही पड़ा था,” इसको हम नवाब बना कर रखेंगें, हमारे घर में कोई कमी है, क्या!”।

“ नवाब नहीं, आम आदमी ही रहने देना” अनिताजी रमेश से बोलीं थीं।

अभी नन्हे बालक का कोई नाम नहीं सोचा गया था। तभी मुकेशजी का अचानक कहीं बाहर से अस्पताल में अन्दर आना हुआ था, उनके हाथ मे एक छोटी सी पर्ची थी, जो उन्होंने अनिताजी के हाथ में थमा दी थी.. अनिताजी ने मुकेशजी से लेकर पर्ची खोली थी, जिस पर लिखा था,”प्रहलाद”।

“ प्रहलाद! कौन!” अनिताजी ने पूछा था, रमेश और बाकी सभी परिवार के सदस्य वहीं अस्पताल में सुनीता के बेड के आसपास खड़े थे।

मुकेशजी ने मुस्कुराकर सुनीता की गोद में नन्हें फ़रिश्ते की ओर इशारा किया था। “ अच्छा!” सभी एकसाथ कह उठे थे,” तो इस बेबी का नाम सोचा है, आपने “ प्रहलाद ”।

नाम वाकई में बहुत प्यारा था। सभी प्रहलाद नाम से खुश थे, और तो और रमेश को भी अपने बेटे का नाम “ प्रहलाद” बहुत पसन्द आया था।

मुकेशजी के बालक के रखे हुए नाम को सभी ने बहुत सराहा था। और रखते भी क्यों न मुकेशजी बेहतरीन नाम, एक अच्छे लेखक जो थे।

अस्पताल की देख-रेख के पश्चात अब सुनीता डॉक्टर का आदेश पा अपने घर आ गई थी। घर आने से पहले अस्पताल छोड़ते वक्त मुकेशजी ने सभी अस्पताल के कर्मचारियों और डॉक्टर साहिबा को नाती आने की खुशी में मिठाई के डब्बे बंटवाये थे।

मुकेशजी के परिवार में अभिमन्यु के साथ-साथ अब प्रहलाद का भी गृह प्रवेश हो गया था। इधर रमेश सुनीता को माँ के घर पर ही छोड़ कर दर्शनाजी के पास हरियाणे लौट गया था।

मुकेशजी ने पोते की बधाई देने के लिये इंदौर फ़ोन लगाया था, पोते की खबर ने रामलालजी को प्रसन्न कर दिया था। खुश तो विनितजी भी हुए थे, पर भतीजे के आने की खुशी में उन्होनें कहा था,” चलो! परिवार में वारिस आ गया”।

पोते के आने के खुशी में कौन सा जश्न मनायेगा इंदौर का परिवार.. किस तरह पोते को अपनी गोद में ले खुशी ज़ाहिर करेंगीं दर्शनाजी।