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खानदान – २

indian wedding


बाबुल का आशीर्वाद,माँ की दुआएँ और भाइयों व रिश्तेदारों का प्यार लिए सुनीता अब रेल में सवार होकर इंदौर जाने के लिए तैयार हो गयी थी। पिताजी और सुनीता के बड़े भैया भाभी अन्य रिश्तेदारों व सुनीता के पिताजी के दफ़्तर के पूरे स्टॉफ के साथ सुनीता को नई दिल्ली रेलवे स्टेशन विदा करने आये थे। सुनीता के ससुर साहब श्री रामलाल जी.. जो कि इंदौर के जाने-माने उधोगपति थे, सुनीता के पिताजी द्वारा दिए गए सुनीता को दहेज में गहने लेकर सबसे पहली सुबह वाली रेल से रवाना हो गए थे। रेल चल चुकी थी,और सुनीता ने अपने परिवार को टाटा बोल अपने नए हमसफर रमेश के साथ ज़िन्दगी की पटरी और अपने नए जीवन की रेल यात्रा आरंभ कर दी थी।
नए हमसफ़र रमेश के साथ आमने -सामने बैठकर सुनीता को अपने नए जीवन का बहुत प्यार भरा और सुखद अहसास हुआ था। हज़ारों सपनें अपनी आँखों में लिए खिड़की से बाहर सुनीता चलती हुई रेल में से देखती जा रही थी। अच्छे-ख़ासे माहौल में पली-बड़ी थी,सुनीता। ब्याह से पहले के परिवेश में किसी तरह का कोई आभाव नहीं देखा था। बेहद खानदानी और संस्कारों से सुसज्जित थी,ये भी नहीं कह सकते कि बला की खूबसूरत है। न बुरी न ज़रूरत से ज़्यादा खूबसूरत…एक अच्छी लड़की होने के लगभग सारे गुण मौजूद थे..सुनीता में। रेल अपनी रफ्तार से दौड़ रही थी…अचानक रमेश ने सुनीता की तरफ़ देखकर कहा था,”इंग्लिश नहीं आती मुझे,सीखा देना”। सुनीता यह बात सुनकर थोड़ी सी हैरान रह गयी थी,हालाँकि हमारे हिसाब से हो जाता है, कभी ..ज़रूरी तो नहीं हर व्यक्ति अंग्रेज़ी का ज्ञाता ही हो। जिसको अंग्रेज़ी नहीं आती क्या वो बेवकूफ़ होता है..ऐसा बिल्कुल नहीं है, हमारे देश में अंग्रेज़ी भाषा का सम्पूर्ण रूप से ज्ञान रखने वाले केवल तीस प्रतिशत लोग ही होंगें, बाकी थोड़े-बहुत टूटी -फूटी अंग्रेज़ी बोल अंग्रेज़ बनने का ढोंग कर लेते हैं.. लेकिन आज भी हमारे देश की अधिकांश जनता अपनी मातृभाषा हिंदी से ही आपस में बेहतर ढँग से जुड़ी हुई है। सुनीता का यूँ रमेश का प्रश्न सुनकर हैरान होना कोई हैरानी की बात नहीं थी, नए ज़माने की लड़की थी, मॉडर्न माहौल में पली बड़ी..स्कूल में भी अंग्रेज़ी का माहौल बचपन से देखा व घर में भी देसी स्टाइल न होकर अंग्रेज़ी मॉडर्न स्टाइल ही रहा था, सुनीता के पिताजी जो फ़ौज में अफ़सर थे, तो भई घर में अंग्रेज़ी माहौल का आना कोई हैरानी की बात न थी। खैर! प्रश्न अपनी जगह था, रेल आगे इंदौर की तरफ़ आगे बढ़ रही थी। सुनीता के दिमाग़ के ब्याह वाले कोरे पन्ने पर यह पहला सवाल था,”अरे! देखने में तो लम्बा अच्छा हैंडसम दिखता है, सुना है,दो-दो फैक्ट्री भी हैं..बिज़नेस मैन होकर भी…”। चलो कोई बात नहीं कम उम्र थी, बीस साल की उम्र होती ही कितनी है,कोई तजुर्बा थोड़े ही होता है,ज़िन्दगी का। बच्चा थी,सुनीता अभी। सफ़र लम्बा था.. माँ ने एक स्टील का डिब्बा साथ में रखकर दिया था,देखने में बहुत ही सुंदर डिब्बा था..ऊपर की तरफ़ शीशे दार। भई अब तो दोपहर का वक्त हो आया था, इंदौर पहुँचने में तो देखा जाए रात ही हो जायेगी। भूख के मारे सुनीता का तो दम ही निकला जा रहा था, और निकले भी क्यों नहीं कभी भूखी प्यासी रही ही नहीं। रमेश ने तो सुनीता से एक बार भी खाने-पीने के बारे में पूछा तक न था,वो तो चलो कोई बात न थी, होता है, पुरुषों को ज़्यादातर बारिकियों का ज्ञान नहीं होता है। खैर! सुनीता ने अपना स्टील का डब्बा खोल ही लिया था, जिसमें माँ ने काजू भरकर दिए थे…रमेश को भी ऑफर किया था”आप भी ले लीजिए भूख तो लग ही रही होगी, लगता है,पहुँचते, पहुँचते रात ही हो जाएगी”। आख़िर तमीज़ वाली लड़की थी,सुनीता। रमेश ने आराम से डिब्बे में से निकाल-निकाल ड्राई फ्रूट्स का मज़ा लिया था।सुनीता यह सब बहुत ध्यान से देख रही थी। “यह क्या? न कोई thank you और न ही कुछ और, मुहँ खोला खा पी के अंदर”। थोड़ा सा अजीब एक बार फ़िर से महसूस हुआ था, सुनीता को। चलो! कोई बात नही, कच्चा दिमाग़ और नई जिंदगी की शुरुआत थी। दोनों ही व्यक्तियों यानी के सुनीता और रमेश के आचार और संस्कारों में बहुत अन्तर था, इसमें हैरानी वाली कोई बात है, ही नहीं.. दो लोगों में हर प्रकार का अंतर तो होता ही है।
अब इंदौर स्टेशन आने ही वाला था, रास्ते में सुनीता और रमेश ने थोड़ी बहुत नींद की झपकी भी ले ली थी। स्टेशन आने में केवल दस या पन्द्रह मिनट बाकी थे..सुनीता ने अपने आप को चारों तरफ़ घूम कर थोड़ा सा चेक किया था, और कम्पार्टमेंट के काँच में एक बार अपना नया नवेला चेहरा भी निहार ही लिया था..आख़िर ससुराल जो आने वाला था.. नए लोग और पूरी तरह नया परिवेश जो कि ज़िन्दगी की अब असलियत बनने जा रहा था। लो!आ गया इंदौर..रमेश और सुनीता अपना एक-आधा बैग लिए रेल से नीचे उतर गए थे, रमेश उतरकर तेज़ी से आगे की तरफ़ चलता ही चला जा रहा था, उसने पीछे मुड़कर एकबार भी सुनीता की तरफ़ देखा ही न था। सुनीता पीछे संभल कर अपनी हील की सैंडलों में धीरे-धीरे रमेश को ही फॉलो कर रही थी…और करती भी क्या चिल्ला तो सकती न थी”धीरे चलो भई, मैं भी पीछे हूँ, देख तो लो”इस तरह भी न बोल सकती थी, नया मामला जो था, सोचना तो रमेश को चाहिए था, कि पीछे तो मुड़कर देख ले एकबार धर्मपत्नि जी तो पीछे ही रह गई। जैसे तैसे सुनीता रमेश को फॉलो करती हुई बिना कुछ बोले प्लेटफार्म से बाहर आ गई थी, पीछे नहीं रह गयी थी।
सुनीता का सिर बनारसी खूबसूरत साड़ी के पल्लू से ढका हुआ था, यह साड़ी जो थी, वो सुनीता के ससुराल वालों की तरफ़ से ही थी। गहनों में ज़्यादा गहने न पहन रखे थे..बस एक सबसे छोटा वाला सेट गले में था..जो सुनीता के पिताजी की तरफ़ से था.. ससुराल वाले थे, तो पैसे वाली पार्टी जाने-माने उद्योगपति इंदौर के..पर कुछ खास ज़ेवर न चढ़या था.. सुनीता पर। केवल एक भारी सी पाजेब थीं, और एक सोने का सेट था। एक हल्का सिल्क में सूट था, और केवल दो ही सिल्क की साड़ी थीं.. कहते सुना था हमनें की हरियाणे में बहु को ज़्यादा न देते हैं। खैर! सुनीता रमेश के साथ आकर खड़ी हो गई थी। थोड़ी सी दूरी पर सफ़ेद रंग की मारुति 800 कार खड़ी हुई थी,जो कि सुनीता के पिताजी ने ही रमेश को दहेज में दी थी। कार की सजावट देखकर सुनीता फ़िर एक बार हैरान रह गई थी, “अरे!यह क्या इतने गंदे से अजीब से फूलों से गाड़ी सजा रखी है, वो भी इतने पैसे वाले लोग! हमारे बड़े भाई साहब का जब ब्याह हुआ था ,तो भई हमनें तो कार को गुलाब के फूलों से सजवाया था”। सोच में डूबी सुनीता रमेश के साथ कार में जाकर बैठ गई थी, जिसमें सुनीता के ससुर साहब श्री रामलाल जी और सुनीता के जेठ विनीत भाईसाहब थे। गाड़ी की ड्राइविंग सीट पर विनीत जी ही बैठे थे। विनीत जी का व्यक्तित्व जो था, वो भी रमेश की तरह ही एकदम हीरो जैसा ही था। विनीत साहब वैसे तो इंजीनयर थे, पर पिताजी के साथ कारोबार में ही शामिल थे। देखने मे तो दोनों भाई एकदम लम्बे चौड़े हीरो जैसे ही थे…नज़र तो ठहरती थी.. दोनों पर।
गाड़ी घर के दरवाज़े पर आ खड़ी हुई थी, एक बार फ़िर सुनीता की नज़र पूरे के पूरे घर पर घूम गयी थी,”यह क्या,कोई ख़ास लाइट-वाइट नहीं न ही कोई डेकोरेशन, हमनें तो भईया के ब्याह में, खूब बढ़िया डेकोरेशन करवाया था, सो ही हमारे ब्याह में पिताजी ने पूरा का पूरा घर सजवाया था”। सोच में डूबी हुई थी, सुनीता की गाड़ी घर के गेट पर खड़ी हो गई थी.. और विनितजी सुनीता के जेठ ने कार का गेट खोला था.. पहले रमेश बाहर आये थे..फिर पीछे सुनीता कार से नीचे उतर कर खड़ी हो गई थी। सब कुछ भूल सुनीता के चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कुराहट आ गई थी। अपने नए हमसफर के साथ कदम बढ़ाते हुए सुनीता ने रमेश के साथ घर के मुख्य द्वार पर कदम रखा था.. जहाँ पर सुनीता की सासु माँ थी..श्रीमती दर्शना एकदम शुद्ध हरियाणे की महिला…देखने में गोरी और खूबसूरत कद की लम्बी चौड़ी। दूसरी तरफ़ विनीत की धर्मपत्नी रमा थी.. देखने में ठीक-ठाक,सीधी-साधी छोटे से कद की महिला थी, विनीत और रमा की दो सुपुत्री भी थीं.. मीना और टीना। मीना और टीना अभी ज़्यादा बड़ी न थीं.. अंदाज़न होंगी पहली और दूसरी तीसरी कक्षा में। खैर!सीधी तरह से सुनीता को घर के अन्दर ले लिया गया था…बिना कोई गृह प्रवेश की रस्म के..जो कि नई दुल्हन के आने पर होती हैं। रात तो हो ही चुकी थी..सुनीता को एक कमरे में बिठा दिया गया था..मासूम दुल्हन फ़िर एक बार अपने मायके की यादों में चली गई थी,”जब हमारी बड़ी भाभी घर नई-नई आयीं थीं, तो बुआजी व मामीजी,मैसीजी लोगों ने कितने अच्छे लोक गीत गाकर गृह प्रवेश करवाया था.. रात को भाभी ने कितना अच्छा डांस भी किया था,ढ़ोलक पर।हमारा घर तो रिश्तेदारों से खचाखच भरा था, यहाँ तो कोई रिश्तेदार ही हमें नज़र नहीं आ रहा है”। अभी मायके के खयालों की उधेड़-बुन सुनीता के ख्यालों में चल ही रही थी ,कि सुनीता की जेठानी रमा एक मुस्कुराहट के साथ सुनीता के सामने आकर खड़ी हो गईं थीं, और कहा था,”आजा खाना खा ले”। एकदम हरियाणवी लहज़ा था। रमेश ने सुनीता के स्वागत में डेक पर अच्छे दो-चार गाने चला दिए थे। भोजन करने जेठानी के साथ जाते वक्त सुनीता की नज़र पिताजी द्वारा दिए गए दहेज के सोफे, सेंटर टेबल और डाइनिंग टेबल पर पड़ी थी,जिसका जिक्र तो घर पर हुआ ही था..कि सगाई में घर का सामान दिया है। मन ने एक बार फ़िर कहा था,”अच्छा है, पर पिताजी तो कह रहे थे, सब रमेश की पसंद का है,हम सब साथ में ही बाज़ार गए थे..जिस-जिस पर रमेश हाथ रखते गए हमनें खरीदवा दी थी”। खैर!सुनीता ने मन में ही कहा था,”अच्छा है”।
अब तीनों जनी रात का भोजन करने बैठ गईं थीं… यानी के जेठानी,सासु माँ श्रीमती दर्शना और हमारी बिटिया सुनीता। भोजन ने एक बार फ़िर हैरान किया था,और सब चीज़ों की तरह जिन पर कि सुनीता ने पहले गौर किया था। एकदम सूखी झाड़ कर रखी हुई रोटियाँ और मोटे-मोटे उबले आलू की रसे वाली सब्ज़ी। सुनीता फ़िर एकबार हैरान थी…सुनीता के घर के माहौल और खान-पान और रमेश के घर के माहौल और खान-पान में ज़मीन आसमान का अन्तर था। सुनीता ने सोचा था,”हो सकता है, कि ये लोग इसी तरह से भोजन बनाते हों,चलो ठीक है”। घर से माँ पिताजी व ताऊजी का फ़ोन सुनीता के लिए आ गया था..कि बिटिया समय से ठीक-ठाक पहुँची की नहीं।
रमेश के दो-चार दोस्त हाथ में फूलों की टोकरी लिए अन्दर आ गए थे..रमेश के कमरे की सजावट करना चाहते थे। रमेश ने सुनीता को अपने साथ अपनी जेठानी के कमरे में बिठाया था..दोनों वहीं पर बैठे थे…पर अचानक यह क्या…रमेश की माँ अपनी हरियाणवी भाषा मे न जाने ज़ोर-ज़ोर से क्या अनाप-शनाप बकना शुरू हो गईं थीं..रमेश की माँ का बोलने का तरीका इतना गन्दा और बदतमीज़ी भरा था..कि सुनीता का रोना निकल गया था।रोते हुए सुनीता रमेश से बोली थी,”मेरे पिताजी को बुलवा दो,मुझे घर जाना है”।
To be continued

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