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खानदान 163

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” इधर-उधर से सामान उठानिए का घर कभी नहीं बसता है! मेरा हल्दी पीसने का grinder घर से बेरा न कब उठ गया.. पता ही नहीं चला!”।

दर्शनाजी यहाँ अपनी हल्दी पीसने वाले ग्राइंडर का रोना रो रहीं थीं.. जो उन्होंने ख़ुद ही रमेश को इशारा कर रसोई से उठवा दिया था। जेब भरने और पैसों के लिए हमेशा से रास्ता जो दिखातीं आईं थीं.. देखा जाए.. तो चालाकी की भी हद ही पार गयी थी.. ये औरत! कारोबार हिस्से से दूर रखते हुए.. पूरे कन्ट्रोल के तहत अपनी ही हाँ-के जा रही थी.. कमाल देखो! किस ख़ूबी के साथ ऊपरवाले को मात दे रही थीं.. श्रीमती दर्शनाजी!

” बेरा क्यों न! आपने ख़ुद ही तो उठवाया था.. grinder मेरे आगे!”।

वहीँ खड़ी रमा दर्शनाजी से बोली थी।

“हाँ..!! मन्ने बिकवा दिए… यो तो आप ही उस्ताद से! मैं उल्टे काम करवाउंगी के ..!”।

सासू-माँ अपने रुतबे की धौंस दिखाते हुए.. बहु से बोलीं थीं.. पर सच तो वही था.. जो रमा कह रही थी।

खैर! दोनों सास-बहू की बहस अभी जारी थी.. और पीछे से रमेश आ खड़ा होता है.. जिसका पता माताजी को नहीं चलता.. अपनी ही धुन में जो होतीं हैं!

” हाँ..!! मैं बेच आया! तू तो बड़ी सीधी सै..!! यो पैसे कित आंगें! सामान रोज़-रोज़ कित्ते लाया करूँ हूँ! एक एक पैसा देना नहीं है.. बकवास अलग ते करें हैं!”।

वही इस घर का पुराना पैसे का रोना था.. अब पता नहीं! कौन सही था.. और कौन ग़लत! जिसकी भी अकेले में सुनो! वही सही लगता था।

सबसे ज़्यादा मुसीबत में इस बेच कर कमाने के धंधे में सुनीता का परिवार आ गया था.. पूरी गति के साथ चारों तरफ़ अपना स्टेटस बनाए रखने के लिए.. झाडू लगाता चल रहा था.. रमेश!

” रेत के अन्दर लोहे की प्लेट दब रही थी.. वा उठा ली! बहुत बड़ा चोर से यो..!!”।

विनीत ने शाम को घर आते ही माँ को।रिपोर्ट पेश की थी।

देखा जाए.. तो चोर तो घर में सभी थे.. पर जो पकड़ा जाए.. वही चोर वाली कहावत यहाँ नज़र आ रही थी।

” अरे! भई! कमरा अकेला है.. और मुझे थोड़ा काम है.. प्लीज! ड्यूटी पर बैठ जाना ज़रा!

लो! जी.. ड्यूटी का सिलसिला शुरू.. जुड़े रहें .. खानदान के साथ।

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