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खानदान 13

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शुरू के महीने में ही पारिवारिक नाटक ज़ोर और रंग पकड़ गया था। दर्शनाजी के कई तरह के रंग सामने आ रहे थे… एक बार सुनीता का यूहीं फ्रूटी पीने का मन हुआ था… खाते-पीते घर की लड़की थी, अभी ससुराल की भूखी नंगी मानसिकता जिसकी नींव उसकी खुद की सास ने ही रखी थी… वाकिफ़ न थी। सो, सासु माँ से कहने लगी, “माँ आसपास कोई मार्किट है, क्या! आज हमारा कोई फ्रूटी जैसी कोल्डन्ड्रिंक पीने का मन कर रहा है”।

दर्शनाजी सुनीता के मार्किट पूछे जाने पर मुस्कुरायीं थीं, और बोली,” चल तने मैं ले चालूं हूँ”। अब दोनों सास बहू मार्किट के लिए घर से पैदल ही निकल पड़ीं थीं। पैदल चलते वक्त दर्शनाजी ने बग़ैर साँस लिए जो रमा की बुराई करनी शुरू की थी… उसका तो भगवान ही मालिक था।

हाँ एक बात का बखान दर्शनाजी ने सुनीता के आगे और किया था, “ एक बार मने मेरी अलमारी का ताला टूटा पाया, और पेचकस उड़हे ही धराया था, के बेरा मेरी अलमारी किसने तोड़ के धर दी, पाँच हज़ार रुपये निकल गए थे”।

सुनीता शुरू-शुरू में हरियाणवी भाषा बहुत ही मुश्किल से समझ पाया करती थी।सुनीता को यह दर्शनाजी की बात तो थोड़ी-थोड़ी समझ आ गई थी.. पर क्योंकि सुनीता के दिमाग़ में इस वक्त मार्किट और फ्रूटी घूम रहे थे, इसलिए वह बात की गहराई में न गई बस जो कहा वो चुप-चाप ही सुन लिया था। मार्किट पहुँचने के बाद सुनीता ने अपने लिए फ्रूटी ख़रीदी… अब सासू माँ रह जातीं, यह तो हो ही न सकता था, इसलिए एक फ्रूटी उन के लिए भी खरीदी। यहाँ पर सुनीता ने एक बात गौर की थी, सासु माँ ने फ्रूटी तो झट्ट से पी ली, पर बटुआ न खोला था। फ्रूटी के पैसे सुनीता ने ही दिए थे।

अब सारे रास्ते सुनीता सोचती आ रही थी,” जब हम माँ और पिताजी के साथ बाज़ार जाया करते थे, तो उनके रहते हमनें तो कभी भी पैसे न दिये थे, फ़िर ये कुछ अजीब सा लग रहा था, सासु माँ तो रिश्तेदारों की तरह से झट्ट से फ्रूटी पी गयीं, पैसे धेले का पूछा भी नहीं”।

सुनीता को एक बार फ़िर सारे रास्ते दर्शनाजी का बर्ताव पैसों को लेकर अजीब सा लगा था… जिसने एक बार फ़िर से सुनीता को सोचने पर मजबूर कर दिया था, “ हो न हो कहीं ये औरत गड़बड़ सी लगती है, कहीं से भी खानदानी पैसे वाली लगती नहीं है”।

खैर!नाटकों में उलझती – सुलझती सी ज़िन्दगी इंदौर में सुनीता की यूँहीं चल रही थी, की एक नया नाटक सामने फ़िर से आ खड़ा हुआ था.. ऑर्नामेंट्स!

रामलालजी घर में ऊँची आवाज़ में रमेश के ऊपर चिल्लाए थे, “ वो ऑर्नामेंट्स हमें दे दो, सास के पास रखी जातीं हैं, ये चीजें”।

“ऑर्नामेंट्स! के बोल रहया है, मने सब बेरा है तू किसके चक्कर मे बकवास करे है”।

ऑर्नामेंट्स यानी के गहनों को लेकर घर में बहुत ही गन्दा नाटक शुरू हो गया था.. जिसकी रचियता थीं.. स्वयं दर्शनाजी और भूमिका निभा रहे थे… रामलालजी और रमेश। विनितजी का रोल सिर्फ़ और सिर्फ़ अपनी बड़ी-बड़ी मूँछे ऊपर कर नाटक का मज़ा लेना था। मूँछों से याद आया, एक बार सुनीता ने बताया भी था, कि जेठजी का नाम ही उनकी मूँछों की वजह से मूँछ रखा हुआ है। सब जेठजी को विनीत न कह कर मूँछ ही बुलाते हैं।

हालाँकि रमेश ने भी अब सुनीता के कहने पर मूँछ रख लीं थीं, जो कि विवाह के समय न थीं,  लेकिन रमेश का नाम मूँछ रखने पर बदला न था।

मूँछ रखने पर सुनीता का कहना हुआ था,” चलो! मूँछ की ही सही कोइ बात तो मानी”।

दो चार दिन से घर मे तरो ताज़ा मसला गहनों का ही चल रहा था। अब गहनों की बात अगर चली थी, तो गहने तो सुनीता के ही होने थे.. रमा तो दहेज में अपने मायके से दर्शनाजी और परिवार वालों के हिसाब से गहना लायी ही न थी। मुकेशजी ने सुनीता को अच्छे-ख़ासे दहेज में गहने दिये थे… जो रामलालजी ने ब्याह के तुरन्त बाद दिल्ली से इंदौर पहुँचते ही अपनी पत्नी व बड़ी बहू को दिखा दिये थे… गहने दिखाते वक्त दर्शनाजी के हिसाब से रामलालजी ने घर मे चिल्ला कर कहा था,” देखिए छोरी के बापू ने कितने गहने दे डाले हैं”।

अब जब सुनीता को एक अरसा बीत गया है, उस घर में, तो सुनीता उस बात को लेकर सोचती है,” ज़रूर ललचाई नज़रों से देखा होगा, इसने गहनों को, कभी देखा तो कुछ था नहीं”।

हाँ! तो उस वक्त रमेश ने सुनीता से कहा था,” सुनीं इनकी बक़वास! गहने माँग रहा  हैं… शान से बोल भी रहा है, कहाँ! हैं, ऑर्नामेंट्स! जैसे इसके बाप ने दे रखे हैं”।

हरियाणा स्टेट में बस! यही एक कमी नज़र आती है, कि बातचीत करने का सलीका लोगों में ज़रा सा भी नहीं होता, हालाँकि बेवकूफ़ तो नहीं होते हरियाणे वासी पर जब भी अपनी मधुर वाणी का उच्चारण करते हैं, तो सच! मानिए एक बार तो ग़ुस्सा आ ही जाता है। केवल भाषा में ही गँवार पना झलकता है… पर मतलब उसका उल्टा नहीं होता।

अब भाषा को लेकर सुनीता भी अपनी ससुराल में परेशान रहा करती थी… ससुरजी और जेठजी को गाली देकर या फ़िर बदतमीज़ी से बात करना सुनीता को बिल्कुल भी न भाता था। पर जन्म से जो परिवेश रहा हो, वह बदलना आसान थोड़े ही होता है। हाँ! बदलाव भी आ जाता है, ऐसा नहीं है… पर इस इंदौर वाले माहौल में दर्शनाजी और रमेश का मैगनेट वाला हिसाब-क़िताब था।

सुनीता के हिसाब से कमाल ही था,” अरे! यह रमेश तो चुम्बक की तरह खिंचता है, अपनी माँ को देखकर”।

करती भी क्या बेचारी थोड़ी सी कोशिश करती भी थी… उस रमेश के साथ तो दर्शनाजी कोई नई गोटी खेल जाया करती थीं। इसमें पूरा दोष किसी का भी नहीं था..कहानी थी, सिर्फ़ पैसा और इनसिक्योरिटी… मतलब के दर्शनाजी और रामलालजी ने विवाह तो अपने दोनों बेटों का कर दिया था… दुनिया में ढिंढोरा पीट कर,” देखो ! जी दो फैक्ट्री वाले हैं, पुश्तैनी ज़मीन है, घर में किसी बात की भी कमी न है”।

दर्शनाजी तो अक्सर पूरे घर में गाती घुमा करतीं थीं,”, राजा का घर है, मोतियों की के कमी से”।

उनका कहने का मतलब था… राजा के घर मे मोतियों की कमी नहीं होती है। घर में छोटा-मोटा जो भी नुक़सान हो जाया करता था, तो तुरन्त ही बोल दिया करतीं थीं,” ओर आ जागा, आड़े तो राजा का घर से, मोतियाँ की के कमी”।

सुनीता अपने सास के इस डॉयलोग पर अक्सर मुस्कुरा दिया करती थी। और अकेले में अक्सर सोचा करती थी,” कौन सा राजा का घर! और कहाँ है… मोती!” ।

दर्शनाजी और रामलालजी की न ही कोई बेटी थी.. बस दो ही बेटे थे… फ़िर माहौल को इतना इनसिक्योर क्यों कर रखा था… क्यों इस घर के सदस्य दर्शनाजी की बकवास से डर जाया करते थे.. पैसा तो बहुत था, फ़िर ये नंगापन और छीना झपटी की मानसिकता क्यों पनप रही थी.. रामलाल विला में।

वो कहते हैं न कि एक गन्दी मछली सारे तालाब को गन्दा करती है.. यहाँ तीन-तीन मछलियाँ थीं.. एक मछली यानी के सुनीता अभी नाटकों का ही पता नहीं लगा पा रही थी, तो दूसरी ओर दो सयानी मछलियाँ अभी और भी थीं.. थीं तो दोनों ही मछलियाँ गन्दी, पर सबसे गन्दी तो ये बूढ़ी मछली दर्शनाजी ही थीं।

दर्शनाजी पीछे की यानी के अपनी माँ के घर की और जन्म से इतनी भूखी औरत थी, की जब भी इस औरत का बचपन इसके सामने आता था, तो इसे सब कुछ खोने का डर फ़िर से लगने लग जाया करता था। दर्शनाजी जो चिल्ला कर घर में बोला करतीं थीं, वो उनकी रईसी नहीं.. डर बोलता था।

सम्पूर्ण वयक्तित्व ख़ामोश होता है, डर हमेशा चिल्लाता ही है। क्या सुनीता इस माहौल में जैसे-जैसे सीढ़ियाँ चढ़ेगी… वो डर कर चिल्लाएगी या फ़िर सुनीता का एक सम्पूर्ण वयक्तित्व उभर कर निकलेगा। वो कहतें है न.. सभी कोयले हीरे का रूप नहीं लेते हैं.. सिर्फ़ कोई-कोई कोयला ही आग में तप कर हीरे का रूप लेता है।

क्या! सुनीता हीरे का रूप इख़्तियार कर पाएगी या फ़िर नाटकों रूपी इस परिवार की आग में हमेशा के लिए राख हो जाएगी।