Posted on

खानदान 16

indian wedding

सुनीता अब पिताजी के साथ मायके आ गई थी। मुकेशजी के दिमाग़ से विनीत का किया हुआ इंदौर में बर्ताव निकल नहीं रहा था। यह बात उन्होंने अनिताजी से भी बाँटी थी, अनिताजी का जवाब था,” अब जैसे चल रहा है, चलने दो, देख लेंगें”। अब सुनीता अपने मायके में आराम से दिन बिताने लगी थी… सुनीता की आने वाली खुशी की ख़बर अब घर में सबको हो गई थी। इस बार भी सुनीता अपने मायके ज़्यादा दिनों के लिए न आई थी, केवल पन्द्रह ही दिनों के लिए आना हुआ था। एक नया तमाशा और था, इंदौर मे कि मायके से बहु को भाई ही लेने आते हैं। सुनीता को यह रिवाज़ बहुत अजीब सा लगा करता था। पर क्योंकि मायके में पैसों की कोई भी तंगी न थी, तो यह रिवाज़ काम कर गया था। एक तमाशा और किया था.. होता यह था, कि जब भी सुनीता से मिलने जाते या फ़िर उसको दिल्ली लाने की बारी हुआ करती थी, तो दोनों तरफ़ का किराया मुकेशजी ही लगाया करते थे। और तो और उस रमेश की टिकट भी मुकेशजी ही कराया करते थे.. अजीब सा रिवाज़ था, अब तो रमेश को आदत सी पड़ गई थी।

सुनीता के वापिस इंदौर जाने का टाइम एक बार फ़िर से आ गया था, और रमेश को सुनीता को दिल्ली लेने आना था। रमेश ने फ़ोन पर सुनीता से अपनी टिकट को लेकर कहा था,” मेरी दिल्ली आने की टिकट करवा देना”।

सुनीता को यह तमाशा बहुत ही बेहूदा लगा था। आख़िर सुनीता ने रमेश को फ़ोन पर सुना ही डाला था,” भई! दोनों तरफ़ की टिकट मेरे पिताजी ही क्यों करवायेंगे.. आप लोग टिकट तक नहीं करवा सकते क्या!”

इस पर रमेश का जवाब भी बड़ा ही घटिया सा था,” तुम कोई भूखे-नंगे हो क्या!”।

ये “ भूखे-नंगे” वाला डॉयलोग रमेश पहले भी कई बार इंदौर में अपनी माँ के साथ मिलकर बोला करता था। सुनीता ने यह डॉयलोग पहली बार अपनी जीवन में सुना था। वह सोचा करती थी…” आख़िर होता क्या है, ये भूखा-नंगा, और इस तरह से थोड़े ही बोला जाता है”।

रमेश की बातों से हर वक्त सुनीता को शिक्षा और संस्कारों का आभाव लगा करता था। रमेश हमेशा ही अपनी शिक्षा को लेकर एक ही बात कहा करता था, सुनीता से.. “ में सेंट्रल स्कूल में ही तो पढ़ा हूँ”।

सुनीता को रमेश के सेंट्रल स्कूल वाली बात एकदम ही झूठी लगा करती थी। सुनीता को भली भाँति पता था, क्या सेंट्रल स्कूल होते हैं, और क्या सेंट्रल स्कूल के स्टूडेंट्स हुआ करते हैं.. आदमी की पहचान तो पहली नज़र में ही हो जाती है.. ये सेंट्रल स्कूल चिल्लाने से कुछ थोड़े ही होता है। सोचने वाली बात तो यह थी, कि चलो दुनिया को तो छोड़ो पर यह रमेश सुनीता से क्यों झूठ पर झूठ बोलता जा रहा था। क्या दिखाने की कोशिश कर रहा था। रमेश ने जो ब्याह का बॉयोडाटा बनवाया था, वो भी एकदम झूठा था। पता ही नहीं क्या-क्या डिग्रियाँ लिखी हुईं थीं, उसमें और वो भी एकदम झूठी।खैर! होता क्या है, कि बिज़नेस परिवारों के लड़के कोई ख़ास डिग्री होल्डर तो होते नहीं हैं, क्यों भई! आख़िर फैमिली बिज़नेस ही जो संभालना होता है, उन्हें। अब शादी ब्याह के लिए अपनी मर्ज़ी से डिग्री छपवाने से थोड़े ही कुछ जाता है। और तो और रमेश ने सुनीता को यह भी बताया था, कि बॉयोडाटा पर जो बाबूजी के सिग्नेचर थे, वो जाली थे, यानी के रामलालजी के हस्ताक्षर रमेश ने ख़ुद ही कर डाले थे।

सुनीता ने रमेश से पूछा था.. आपने ऐसा किया ही क्यों? जिसका जवाब रमेशं ने कुछ इस तरह से दिया था,” अगर में अपना बॉयोडाटा खुद नहीं बनाता तो यह लोग मेरी शादी ही नहीं होने देते”।

आख़िर क्या तमाशा मचा रखा था, अच्छे-ख़ासे घर में। क्यों नहीं करना चाहते थे, इंदौर वाले रमेश की शादी!

एक बार रमेश की पढ़ाई को लेकर दर्शनाजी के मुहँ से ही सुनीता के आगे निकल गया था,” यहीँ इंदौर के लोकल स्कूल से पढ़े हैं, मेरे दोनों लड़के”।

विवाह जैसे बंधनो में झूठ पर थोड़े ही नींव रखी जाती है, जो है, सो है.. उसमें क्या बात है!

रमेश अपनी और सुनीता की कहानी को झूठ और दिखावे के तार से जोड़ता चला जा रहा था.. सुनीता सब समझ रही थी, पर कहती क्या!.. अब हर बार न झगड़ा किया जा सकता था, न ही बहस.. चुप रहकर ही नाटक देखने में भलाई थी।

खैर! सुनीता के कहने पर रमेश ने अपने दिल्ली आने की एकतरफा टिकट करवा ली थी। होता क्या था, जब शुरू-शुरू में रमेश सुनीता को लेने दिल्ली आया करता था, तो एकदम ही आठ-आठ दिन एकसाथ रुका करता था.. अब कहीं कोई काम-काजी वयक्ति हमनें तो नहीं देखा है, यूँ ससुराल में आठ-आठ दिन रुकते.. और वो भी फैक्ट्री वाला आदमी। सुनीता को भी रमेश का अपने मायके आठ-आठ दिन रुकना बहुत अखरता था, सोचा करती थी, कि ,” अरे! जब पिताजी नानी के यहाँ माँ को और हमें लेने जाया करते थे, तो केवल एक ही रात रुका करते थे, नानी के यहाँ, ये कैसा दामाद हुआ.. एक बार आ जाय तो वापिस जाने का मुश्किल से ही नाम लेता है”।

सुनीता ने एक बार अपनी माँ से भी इसी विषय में कहा था,” आपको रमेश का यहाँ आठ-आठ दिन रुकना कुछ अजीब सा नहीं लगता”।

जिस पर अनिताजी ने जवाब में कहा था,” इसमें अजीब वाली तो कोई बात न है, मेरी मामा की लड़कियों के दामाद भी आराम से लखनऊ में आठ-आठ दिन रुका करते थे”।

सुनीता एक बार फ़िर सोचने पर मजबूर हो गई थी,” आख़िर माँ इस रमेश को आँख बन्द करके क्यों सपोर्ट देतीं है”।

बातों को कभी भी यूँ हल्का-फुल्का न लेकर थोड़ा गहराई में सोचना चाहये। अनिताजी को भी सुनीता की बातों को थोड़ा गहराई का रूप दे देना चाहिए था, वो ठीक है, कि अपना दामाद और बेटी सभी के लाड़ले होते हैं, पर हर रिश्ते की अपनी एक सीमा और दयारा तो होता ही है.. हर रिश्ता अपनी सीमा और दायरे में रह कर ही सजता संवरता  है।

रमेश का दिल्ली आना हो गया था, सुनीता को लेने। शुरू-शुरू में सुनीता अपने भाई सुनील के साथ रमेश को लेने स्टेशन तक चली जाया करती थी, जब भी वो इंदौर से आता था। इस बार भी सुनीता और सुनील रमेश को लेने स्टेशन पहुँच गए थे। स्टेशन पहुँचते ही रमेश का सुनीता से पहला डॉयलोग था,” मेरे पास पैसे नहीं हैं, बस सो रुपये ही हैं”।

इस डॉयलोग ने सुनीता का दिमाग़ ख़राब कर दिया था, रमेश के इस सो रुपये के ड्रामे ने नाक में दम कर दिया था। वो भी जब, जब ससुराल आने का टाइम होता था।

सुनीता को मुकेशजी की स्टेशन वाली बात एक बार फ़िर याद आ गई थी, मुकेशजी ने सारे परिवार के आगे इंदौर वालों के नाटक शुरू होने के बाद बताया था, जब मैं सुनीता को रेल में बैठा विदा कर स्टेशन पर खड़ा ही था, कि इंदौर के ही परिवार के सदस्य ने मेरे साथ ख़ड़े होकर कहा था, या तो मुकेशजी सुपर इंटेलिजेंट हैं, या फ़िर बेवकूफ़!”

क्या परमात्मा इस इंदौर वाले सुनीता और रमेश के रिश्ते से मुकेशजी को सुपर इंटेलीजेंट की उपाधी से समान्नित करेगा या फिर…..