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खानदान 15

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सुनीता अभी कुल बाईस साल की ही तो थी, जब उसे अपने माँ बनने की खबर का अहसास हुआ था। सुनीता को यह अहसास अपने मायके दिल्ली में रहते हुए हुआ था। ख़बर पक्की होते ही उसने रमेश को यह बात फ़ोन पर ही बता दी थी। कुछ दिन दिल्ली में रहने के बाद सुनीता अपनी ससुराल वापिस इंदौर आ गयी थी। इस बात की ख़बर का रमेश के घरवालों पर कोई ख़ास प्रभाव नज़र नहीं आ रहा था।नया मेहमान परिवार में आयेगा इस बात को लेकर कोई भी हलचल न थी, हालाँकि घर मे पहले से ही विनितजी की दो बेटियाँ थीं, पर रमेश की तो यह पहली सन्तान ही थी। चलो! कोई बात न थी, सुनीता इंदौर आ चुकी थी… और रोज़ की दिनचर्या शुरू हो गयी थी।

इस माँ बनने वाली ख़बर से अब सुनीता को दर्शनाजी का नया रूप देखने को मिला था, दर्शनाजी काम-काजी महिला तो शुरू से ही थीं… हरियाणे की औरतों ने खेत के खेत काट रखें होते हैं… मतलब जो गाँव से वास्ता रखतीं हैं। इसलिए घर के छोटे- मोटे काम उनके लिए कोई ख़ास वज़न नहीं रखते हैं। अब दर्शनाजी ने सुनीता को अपना प्यार दर्शाना शुरू कर दिया था… जिससे रमा को थोड़ी तकलीफ़ और ख़तरा महसूस होने लगा था। ख़तरे का आभास तो खैर सुनीता को नहीं होता था… पर दोनों सास बहू में झगड़ा रोज़ ही सुनीता को देखने को मिलता था। दर्शनाजी रोज़ सुबह से ही अपनी पुरानी आदत बेइज़्ज़ती करने और गाली देने से शुरू हो जाया करतीं थीं.. इस गाली और बेइज़्ज़ती का निशाना वही रमा का परिवार और अभी तक रामलालजी ही थे। शुरू के दिनों में जब सुनीता नई-नई इंदौर में ब्याह कर आई थी, तो दर्शनाजी ने अपना थोड़ा सा असली रूप दिखा दिया था.. दिल्ली वालों को गाली दे, और बार-बार यह बोल कि यह सब गाड़ी वगरैह तो कोई भी दहेज में दे सकता है। उनका कहना था,” मैंने अपना लड़का बेच्या कोनी”। यानी के मैने अपना लड़का बेच नहीं रखा है।

सुनीता को दर्शनाजी की सभी बातें बिल्कुल भी समझ न आया करतीं थीं.. लेकिन उनके हाव-भाव बात करने के तरीके बेहद फूहड़ और बदतमीज़ी भरे थे.. जिनकी वजह से सुनीता रोना शुरू कर दिया करती थी। शुरू के ग्यारह दिन बाद जब सुनीता वापिस दिल्ली पहुँची थी, तो उसनें अपने माँ और पिताजी के सामने पूरे ग्यारह दिन वैसे के वैसे ही रख दिये थे.. ऊपर से रामलालजी के फ़ोन पर नाटक कि,” हम लड़के को घर से भगा देंगें, हड्डी तुम्हारे गले पड़ जाएगी”।

इस नाटक के शुरुआत ने ही मुकेशजी का दिमाग़ शुरू में ही गरम कर दिया था। और क्योंकी अनजान रिश्तेदारी में बेटी ब्याही थी.. इसलिए मुकेशजी ने  धमकी के रूप में एक फ़ाइल तैयार कर इंदौर वालों को भेज दी थी। और फ़ाइल की एक कॉपी अपने पास भी रखी थी। रमेश ने इस फ़ाइल का जिक्र सुनीता से करते हुए कहा भी था,” क्या! था, वो सब हैं! मूँछ फ़ाइल देख कर चिल्ला रहा था”।

नया रंग देखने को मिल रहा था, सुनीता को इंदौर में… दर्शनाजी काम तो खैर! कोई भी न करवातीं थीं, सुनीता से। बस छोटे-मोटे काम ही कर दिया करती थी.. सुनीता। रमा ने उसके साथ दर्शनाजी द्वारा किये हुए सारे नाटकों का धीरे- धीरे बखान करना शुरू कर दिया था।

रमा का कहना था,” कि जब मैं शुरू-शुरू में आई थी, एक कोने में चुप-चाप बैठ गई थी। किसी ने मुझे चाय पानी या खाने का बिल्कुल भी नहीं पूछा था। अगले दिन सुबह से ही मुझे रसोई में काम से लगा दिया था। घर का पूरा का पूरा काम मैं ही कर के दिया करती थी।

रमेश के मुताबिक रमा की दर्शनाजी ने कई बार पिटाई भी कर रखी थी, रमेश ने सुनीता को बताया था, कि एक बार  “ इस बिल्ली को अम्मा ने ऐसा थप्पड़ मारा था, कि इसका सिर गेट से जाके लगा था, रोती हुई भागी थी… ये हमारे पड़ोसियों के घर”।

यह सब सुनने में तो सुनीता को बेहद बुरा लगा था,” अरे! रमा इतनी भी बुरी तो नहीं है, फ़िर इसके साथ इतना बुरा व्यव्हार क्यों किया अम्माजी ने”।

रमा भी सुनीता का ब्रेनवाश ही करने में लगी रहती थी। सुनीता अभी नादान और भोली थी… लगातार बातों में आती ही चली जा रही थी। पर कुछ भी हो सुनीता को पता नहीं क्यों दर्शनाजी को देखकर थोड़ा अजीब तो लगा ही करता था।

अब असल में कहानी क्या थी.. कि तीनों औरतों में से एक यानी के सुनीता कही भी परिवार से मेल न खा रही थी। इसिलए बेवकूफ़ भी बनती जा रही थी। हाँ! यह बात बिल्कुल ठीक थी, कि दर्शनाजी ने रमा के साथ नाटकों में कोई भी कसर न छोड़ी थी.. पर यह कोई नया क़िस्सा न था, हरियाणे में इस तरह के नाटक औरतों के साथ आम बात होती है। इसमें कोई हैरानी वाली बात नहीं है। पर सुनीता के दिमाग़ को रमा पहले ही भाँप गई थी, इसलिए उसके स्वभाव और भोले-पन का फायदा उठाना चाहती थी। और उठाया भी।

रमा ने सुनीता के दिमाग़ में एक बात और बिठा दी थी, वो ये कि,” तेरे घर से जो फ़ाइल अंकलजी ने भेजी थी, बस! उसी की वजह से अम्माजी तेरे से कुछ भी नहीं बोलती हैं” ।

खैर! बात तो यह किसी हद तक सही थी।

इसी बीच रमा कुछ दिनों के लिए अपने मायके चली गई थी। घर मे अब सिर्फ़ एक ही बहु थी, सुनीता। सुनीता के साथ दोनों ही सास-ससुर बहुत ही अच्छे ढँग से पेश आया करते थे। सुनीता को फ़ाइल वाली बात जम रही थी। इस बार सुनीता बहु जैसा महसूस कर रही थी। इन्हीं दिनों दर्शनाजी थोड़ी बीमार भी पड़ गईं थीं, सुनीता ने एक अच्छी बहु की तरह से सारे काम कर दर्शनाजी की बहुत सेवा की थी। अब हुआ यह कि उधर रमा के मायके में रमा के भाई का ब्याह तय हो गया था, ब्याह का न्योता देने रमा अपनी ताऊ की लड़की के साथ इंदौर घर पर आयी थी। दर्शनाजी ने रमा और उस ताऊ की लड़की के आगे ही सुनीता की बहुत तारीफ़ की थी,” इसने इस बार मेरी बहुत सेवा की है”।

रमा की थोड़ी भी तारीफ़ न की थी, जिसका की रमा को बेहद बुरा लगा था।

सुनीता के ये वाले दिन रामलालजी विनीत और दर्शनाजी के साथ अच्छे बीते थे, थोड़ी खुश भी लग रही थी। अब सुनीता का एक बार फ़िर से दिल्ली जाने का टाइम आ गया था, और पिताजी लेने आने वाले थे। पिताजी के स्वागत में इस बार पहली बार सुनीता ने ससुराल में बहुत ही स्वादिष्ट भोजन बनाकर रखा हुआ था। अब मुकेशजी इंदौर पहुँच चुके थे।स्टेशन पहुँचकर उन्होंने देखा कि,” अरे! उन्हें लेने तो कोई भी घर का सदस्य पहुँचा ही नहीं है”।  आख़िर मुकेशजी दूसरे तरह के संस्कारी लोग हुआ करते थे, और यहाँ तो संस्कारों और रिश्ते किस चिड़िया का नाम है, पता ही नहीं था।

मुकेशजी ने सीधा ही विनीत को स्टेशन से फ़ोन लगाया था,” बेटा हम इंदौर पहुँच गए हैं”। और विनीत ने मुकेशजी को सीधे ही जवाब दिया था,” हाँ! ठीक है, पहुँच ही गए हैं, तो फ़िर आप खुद ही देख लीजिए, आ जाईये”।

मुकेशजी को विनीत का यह जवाब बहुत ही अटपटा सा लगा था, पर बोले कुछ भी नहीं थे… बेटी की ससुराल का मामला जो था, हर बाप को थोड़ा डर लगता ही है।

खैर! मुकेशजी ने स्टेशन से टैक्सी करी और घर पहुँच गए थे।

मुकेशजी के आने की खुशी में सुनीता ने रमेश को कोल्ड्रिंक वगरैह लाने को भी बोल दिया था। रमेश ने कोल्ड्रिंक वाली बात विनीत के कानों में डाली थी, और विनीत का कहना था,” अरे! इसकी क्या ज़रूरत है, ऐसे ही चल जाएगा”।

सुनीता को  बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा था, उनके यहाँ तो मेहमानों की जम कर ख़ातिरदारी की जाती थी, और यहाँ देखा तो एकदम उल्टा.. फ़िर एक बार सुनीता ने सोचा था, कमाल ही है।

खैर! सुनीता ने अपने पिताजी के आने की खुशी में भोजन तो अच्छा बना ही रखा था, इसलिए उसने अपने पिताजी के लिये अच्छे ढँग से टेबल सजा कर ख़ातिरदारी करी। सुनीता के हाथ का भोजन रामलालजी को बहुत पसन्द आया था, और उन्होंने उस दिन बहु के हाथ के बने हुए भोजन की तारीफ़ भी की थी।

रामलालजी मुकेशजी से सुनीता के बारे में कुछ कहना चाहते थे, पर मुकेशजी ने साफ-साफ कह दिया था,” सुनीता मेरी बेटी है, लाड़ से अपने साथ ले जायउँगा और प्यार से अपने घर रखूँगा, सिखाने का काम आप लोगों का है, जैसे चाहे सिखा सकते हैं, आप ही की बहू है”।

रामलालजी को मुकेशजी की बातें भा गईं थीं।

इस बार बड़े ही प्यार से बाप-बेटी इंदौर से दिल्ली के लिये विदा हो गए थे।

इस बार सुनीता के साथ दर्शनाजी का इतना लाड़-प्यार और विनीत का मुकेशजी के साथ इस ढँग से पेश आना क्या था। सुनीता और सुनीता के परिवार के लोगों ने एक बात महसूस की थी… कि यह विनीत रमेश और उसकी ससुराल को लेकर नकरात्मक विचार फैला रहा था, रमा भी उसका साथ दे रही थी… आख़िर धर्मपत्नि जो थी। रामलालजी भी रमेश को लेकर विनीत की बातें ही मानते थे, क्योंकि यह रमेश अपनी माँ के कहने में आकर रामलालजी को उल्टा-सीधा बोल जाया करता था।

आख़िर कौन सी खिचड़ी पकनी शुरू हो गई थी, रामलालजी के परिवार में। क्या इस बार जो थोड़ी सी खुशी सुनीता ने इंदौर में महसूस की थी, वो रमेश के साथ गृहस्थ बसाने के अच्छे दिनों की शुरुआत थी… या फ़िर कुछ पल की गलतफहमी… अभी असलियत बाकी थी।