” या हमनें बसन कोनी दे..! बेरा न के बन री है..!।अपने-आप में”।
दर्शनाजी ने रमा को लेकर सुनीता से कहा था.. कि घर बसाने के रास्ते में रोड़ा है..! ये! जब से रामलालजी का स्वर्गवास हुआ है.. पता नहीं कहाँ की प्रधानमंत्री बन कर दिखा रही है!
” सीधी सी बात तो है..! माँ बुड्ढी और लड़का बेवकूफ़..!!”।
सुनीता ने दादी बनकर अपनी सास को समझाते हुए.. कहा था। सुनीता साफ़ शब्दों में दर्शनाजी जैसी शातिर दिमाग़ औरत को समझाने लगी हुई थी.. कि विनीत और रमा की तो पाँचो उंगलियाँ घी में हैं..! अरे! भई! आप समझ नहीं रहे हो.! क्या..!! कि माँ बुड्ढी और लड़का बेवकूफ़..!।
यहाँ पर रमेश बेवकूफ़ की उपाधि और दर्शनाजी बुढ़िया की उपाधि से जो अब कुछ भी कर नहीं सकती..! से सम्मानित हुई थी। माताजी ने बड़े ही गौर से सुनिता की बातें सुनी थीं.. जहाँ उन्हें रमेश को बेवकूफ़ कहना तो पसन्द आया था.. लेकिन अपने लिए बुड्ढी शब्द कुछ जमा नहीं था।
माताजी तो किसी रियासत की मालकिन से अपने-आप को कम नहीं समझ रहीं थीं.. पूरे साम्राज्य की मालकिन ” दर्शना देवी!”। और उन्हीं को बेकाम की और उन्हीं के मुहँ पर सुनीता ने बुड्ढा बता डाला था। अब सुनकर बुरा तो लगना ही था.. कुछ भी कहो.! वक्त और उम्र कोई भी हो..! पर ज़िन्दगी को जीने का जज़्बा माताजी का अभी-भी वही था।
मन में तो वही था.. पर रास्ता कहाँ से लूँ.. यह अब घर की मालकिन समझ नहीं पा रहीं थीं।
माताजी अपनी प्रोफाइल बदलने में लगीं हुईं थीं.. अब विनीत को मंत्री बना और इस रमेश को भगवान जाने कौन सी पोस्ट देने के चक्कर में थीं।
” नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली अब हज यात्रा को चल रही है!”।
ऐसे कैसे हज यात्रा कर सकती थी.. ये बिल्ली.! अभी तो पूरा हिसाब-किताब यहीं देना बाकी था। इस जंगली और कटखनी बल्ली से मुलाकात करेंगें अगले खानदान में।

