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खानदान 12

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ऐसा कोई भी दिन नहीं जाता था,जब घर में नाटक न हो,सुनीता के मन में तो सुबह होते ही दर्शनाजी का भय बैठ जाया करता था।

रमा के मुताबिक”अरे!यह तो कुछ भी नहीं है,पहले जब में नई-नई आयी थी, तब देखना था इसका रूप..जब भी मैं कभी दोपहर के वक्त सो जाया करती थी,तो दरवाज़े पर ज़ोर से धक्का मारकर कहा करती थी..उठ और काम से लग,यह कोई सोने का टाइम है। बोरे के बोरे गेहूँ मुझसे धुलवा कर ऊपर छत्त पर रखवाया करती थी”।

यह सब तो रमा ने सुनीता को दर्शनाजी के बारे में बताया था.. ओर दर्शनाजी ने भी सुनीता को रमा के परिवार की कहानी सुना रखी थी,”इसकी माँ बहुत ही खतरनाक है,अपनी बहू के बच्चों को खाना खाते वक्त लात मारती है, और इसका भाई भी ठीक नहीं है…अपनी पत्नी के लिए बोलता है.. यह सुन्दर नहीं है..मुझे तो बड़ी भाभी चाहये”।

यह सब सुन सुनीता के रौंगटे खड़े हो गए थे..सीधे भोले और पढ़े लिखे संस्कारी परिवार की जो लड़की थी। सुनीता ने रमा के मायके के बारे में सुनते ही सोचा था,”अरे ! बाप रे!इतने घटिया मानसिकता के लोग..मैं तो अम्माजी को ही बदतमीज़ और घटिया समझा करती थी,पर रमा की माँ तो तौबा!”

कहानी अब थोड़ी सी साफ़ होती जा रही थी.. रमा और दर्शनाजी एक ही पारिवारिक माहौल की थीं.. दोनों सास बहुओं का एकदम सही मेल मिलता था.. इसीलिए रमा ने अपने आठ साल शादी के इस परिवार के साथ खुश होकर बिताए थे..रमा भी कम न थी..थी कुछ और सुनीता को दिखाती कुछ और थी।

यह तो सुनीता को समय रहते समझ लेना चाहये था.. जो कुछ दिखता है, वो होता नहीं है..रमा तो सुनीता को हर मामले में नीचा दिखाती ही..या फ़िर यूँ कह लीजिए कि रमा सुनीता का और दर्शनाजी का दोनों का रास्ता काट रहीं थी.. रास्ता काटना रमा के लिए बहुत ही आसान काम था.. रामलालजी कानों के कच्चे इंसान थे,और दूसरा दर्शनाजी ने भी कोई कसर बाकी न छोड़ रखी थी..अपने पतिदेव के साथ।

मामला पूरा पैसे और संपत्ति का ही था..इस परिवार में..रिश्तों की डोर एकदम कच्ची थी। माँ -बाप और बच्चों के बीच संपत्ति की राजनीति चल रही थी..विनीत और रमा रामलालजी के आगे पीछे रहा करते थे.. खैर!रामलालजी में थोड़ी गुंजाईश थी..थोड़ा सा गुरुर तो अपने रुपयों पैसों का था..उनमें पर दर्शनाजी की तरह एकदम मुहाँफट और बदतमीज़ नहीं थे।

रमा विनीत को घर में चल रहे हर एक नाटक की ख़बर दिया करती थी..औरतें तो होती ही हैं..चुगलखोर, कहीं भी देख लो। विनीत रमा द्वारा लगाई गई चुगली को फ़िरअपने हिसाब से फैक्ट्री में रामलाल जी के आगे पेश किया करता था।

विनीत का मकसद केवल एक ही रहा रमेश के ब्याह के पहले दिन से..वो यह कि रामलालजी का ज़्यादा से ज़्यादा दिमाग़ ख़राब करना..रमेश,दर्शनाजी और सुनीता के ख़िलाफ़। विनीत अपने आप को और रमा को हमेशा ही सुथरा और कर्मशील साबित करने में लगा रहता था। विनीत के चरित्र की एक ख़ास बात और थी..वो कहीं किसी कोने में रामलालजी को भी बेवकूफ़ साबित करने में लगा रहता था..चाल हर तरफ़ से चल रहा था..विनीत की हरकतों से साफ़ ज़ाहिर होता था..की वो खुद सारे एम्पायर का मालिक बनना चाहता है..और मोहरे चलने में कम क्यों पड़ता,था तो दर्शनाजी का बेटा ही। उस घर मे ऐसा लगा करता था, जैसे दर्शनाजी प्रधानमंत्री हैं, विनीत मंत्री और रमेश दर्शनाजी का पालतू कुत्ता।

रमेश का लेना-देना केवल अपनी माँ के साथ ही था.. जो माँ ने कह दिया बस!आँख बंद करके करता ही चला जाता था,सीधा-भोला या फ़िर माँ भक्त बिल्कुल भी न था। माँ की जो पुश्तेनी ज़मीन थी उसका लालच था, रमेश को। रामलाल जी पैसे के मामले में कंजूस इंसान थे.. और होते भी क्यों नहीं..पैसा ऐसे ही थोड़े ही कमाया जाता है..आसान नहीं होता है कारोबार खड़ा करना। रमेश जो था..उड़ाने खाने वाला आदमी..उसको पैसों की कोई भी चिंता नहीं होती थी.माँ पिताजी से लड़ झगड़ कर पैसों का इंतेज़ाम कर दिया करती थी।

रामलालजी दर्शनाजी से कही किसी मामले में दबने वाले बन्दे थे..पत्नी की आवाज़ सुन कर डर जाया करते थे। रमेश जनता था.. कि पैसों का इंतेज़ाम केवल अम्मा ही करवा सकती है..ऐब तो कोई न था,खैर! रमेश में..बस पैसे को करोड़पति की तरह से उड़ाता था.. जैसे कि हजारों रुपये की परफ्यूम की बोतल ही खरीद लाएगा या फ़िर बिना हिसाब क़िताब की और कोई फ़िज़ूल खर्ची ही कर डालेगा..समझाने का तो रमेशं को कोई सवाल ही नहीं उठता था..अपनी माँ के अलावा और किसी की कोई भी अक्ल की बात उसके दिमाग़ में घुसती ही नहीं थी।

रमेश की किसी एक कमज़ोरी का दर्शनाजी को अहसास था.. इसलिए रमेश। की पैसों की पूर्ति कर रामलालजी से वो रमेश को अपनी गोट में रखा करती थी.. और जिसको चाहे जैसा बुलवा दिया करती थी। रमेश बेटा कम और अपनी माँ के साथ चिपकी हुई भाभी और अन्य लोगों की चुगली करती हुई बेटी का रोल ज़्यादा क्या हमेशा ही किया करता था। सुनीता रमेश को नोटिस करती जा रही थी,सुनीता के मन ने फ़िर से एक बार चुपके से कहा था,”मां ने कमाना खाना तो सिखाया ही नहीं”।

अजीब सा तमाशा था.. कमाने खाने को लेकर ..कहने को अभी सब कुछ शामिल था.. दर्शनाजी के हिसाब से,”पापे ही करेगा सब कुछ”। उस औरत के दिमाग़ में दूर-दूर तक यह बात न थी,की भई! दो लड़के हैं,और इनके ब्याह शादी भी हो गए हैं.. भगवान का दिया सब कुछ है..इनको अलग-अलग कर घर बसाने दे।

पर नहीं दर्शनाजी तो अपना ही सिक्का ऊपर रखते हुए कहा करती थी,”नाहीं” ये नहीं बोलने का तरीका उनका एकदम बुलन्द सी आवाज़ में रौबीला और घमंडी था।

सुनीता ने रमेश से एक बार पूछा भी था,”ये अम्माजी रसोई में काम करते वक्त क्या बड़बड़ाती रहतीं हैं”मैं मोर की ढाल नचा दूँगी सबने”। इस पर रमेश ने सुनीता को फ़िर एक बार अधूरा सा ही जवाब देकर टाल दिया था,”करती रहती होगी कोई बक़वास, पुरानी आदत है,इसकी”।

अब यहाँ पर रमेश के बोलने के तरीके का बिल्कुल भी बुरा नहीं माना जा सकता..हरियाणे की भाषा तो होती ही है..लठमार.. आइए जी खाईऐ जी थोड़े ही होता है..इनके यहाँ। परिवार में दोनों बेटों में से रुपये पैसों के इंतेज़ाम कौन कैसे कर रहा है..इसकी केवल पूरे परिवार की रमेश को ही ख़बर थी…दर्शनाजी का पालतू जो था,और रमा अपनी सास की गोटी का सीधा-सीधा काट थी। एक ही थाली की चट्टी-बट्टी जो थीं दोनों। और दूसरा क्योंकि रमेश माँ का पूरा ईमानदार कुत्ता था.. इसलिए भी उसका पूरे घर को पता चल जाता था।

विनीत का रुपये पैसों के मामले में किसी को भनक ही नहीं थी..दोनों मियाँ बीवी के व्यव्हार से आप आमदनी या रुपया पैसे की बात का पता ही नहीं चला सकते थे। इसका कारण एकदम साफ़ था.. रमा को पैसे की अहमियत का पता था..और विनीत की नज़र पूरी फैक्ट्री की संपत्ति और कारोबार पर शुरू से ही थी। विनीत को सामने बैठी सोने की चिड़िया एकदम साफ-साफ दिखाई पड़ रही थी..और वो जनता था.. कि मैदान एकदम साफ है..आगे बढ़े चल..रमेश महाशय तो अम्मा के साथ ही लगा रहता है..काम-धंधे से इसे कोई भी लेना-देना है, ही नहीं। विनीत को सिर्फ़ रामलालजी को अपनी गोट में रखना था.. बाकी के दो मोहरों यानी के रमेश और दर्शनाजी की गोटी काटना मुश्किल काम न था..,क्योंकि इस घर के अन्दर चल रहे गेम का सबसे खूबसूरत हिस्सा दर्शनाजी ही थीं..जिसकी कमज़ोरी बेटा, पति नहीं केवल पैसा था।

कमाल की भूख थी..दर्शनाजी की पैसों को लेकर। पैसा तो सबको प्यारा होता है पर इतना भी नहीं। सुनीता ने अपनी सासु माँ की पैसों की भूख को गौर से कई बार देखा था..एकबार दर्शनाजी रमेश के साथ सुनीता को लेने दिल्ली गईं थीं..विदाई के वक्त मुकेशजी ने हाथ में जो नोट थमाए थे.. वो दर्शनाजी उसी वक्त ललचाई हुई नज़रों से देख लिया करतीं थीं,कि पत्ता सो का है कि पाँच सौ का..पाँच सौ का पत्ता देख आँखों मे चमक सी आ जाया करती थी। और सुनीता की गोद भराई पर भी तो पाँच के पच्चीस हज़ार माँग लिए थे।

एक बार सुनीता रमेश के साथ और सासू माँ के साथ किसी के घर बुलावे में गए थे,लौटाबाद में उन्होंने भी सुनीता को जो बहु की विदा दी थी, वो भी दर्शनाजी ने झट्ट से अपने पर्स में रख ली थी..सुनीता देखती ही रह गई थी..नई नवेली जो थी..नाटकों को लेकर दिमाग़ अभी तैयार न था।

हाँ! जब इंदौर में सुनीता की रिसेप्शन पार्टी हुई थी..तो भी दर्शनाजी काजल-,वाजल लगाकर कंधे पर बैग टाँग कर शगुन में जो भी लिफाफे मिल रहे थे.उन्हें बैग में भरती चल रही थी।

सुनीता स्टेज पर बैठी यह सब नोट कर रही थी,”हमारे घर के पैसे तो वैष्णो देवी पर लगवा दिये,और अपने यहाँ से कुछ भी देना ही नहीं चाहती”।”और यह रमेश भी पता नहीं क्या नाटक कर रहा है”।

पैसा!पैसा और पैसा!, कहाँ है.. हमारे यहाँ तो कुछ है ही नहीं.. वगरैह!वगरैह! एक अजीब तरह का करोड़पति परिवार का दल-दल था, जिसमें सुनीता अब धँसना शुरू हो गई थी… क्या सुनीता इस दल-दल के नीचे तक धँसती चली जायेगी या फ़िर परमात्मा अपना हाथ देकर ऊपर की तरफ़ खींच लेंगें।