” दिखे सै! तन्ने मेरा पैर सूजन लाग रया सै!”।

रमेश अपनी माँ से बोला था.. और रमेश के मन में यह भी डर बैठ गया था.. कि डॉक्टर ने सही कहा था.. इस बार पैर पक्का से ही कट जाता!”।

पैर के इलाज के लिए एकबार फ़िर से पैसों का चक्कर पड़ गया था.. पिता का राज़ ख़त्म हो चुका था.. बटवारे के नाम पर कुछ भी नहीं था.. घर मे कुछ ऐसा रिवाज़ डाला हुआ था.. माताजी ने! कि बिना बुरी तरह से चिल्लाए और कोई नाटक के बगैर पैसे निकलते ही नहीं थे.. रमेश अपना पैर लिए पूरे दर्द में खड़ा हो गया था..

” तेरे धोरे पिसे सै! कि कोनी..! मेरा के होगा!”।

रमेश अपनी माँ के पास पैसों के लिए जा खड़ा हुआ था.. पैर के इलाज के लिए.. पैसे तो चाहिये थे।

” मेरे धोरे के सै..! के देके जा रया है..! बाप..”।

दर्शनाजी ने साफ़ शब्दों में मना करते हुए, कहा था.. कि उनको हिस्से में कुछ भी नहीं मिला है.. रामलालजी कुछ भी नहीं देकर जा रहे.!!”।

रमेश का डर अब बढ़ता जा रहा था.. अगर पैसे नहीं मिले, तो वो अपाहिज हो जाएगा.!

” मेरा तिरेसठ लाख का कम से कम हिस्सा बन रया सै!”।

” वे साठ-लाख कित गए..!”।

अब रमेश सही मुद्दे पर आ गया था.. साठ लाख रुपये कहाँ ट्रांसफर हो गए.. और अपना ख़ुद का हिस्सा तिरेसठ लाख का बताते हुए.. रमेश ने पैसे लेने के लिए अब नाटक शुरू कर दिया था।

” तेरे धोरे तो बस! वा ए बात सै!”।

दर्शनाजी ने पैसों पर टिप्पणी करते हुए, कहा था.. कि रमेश को पैसों के अलावा कुछ दिखता ही नहीं है.. पर फिर भी और कुछ भी कहो..! हिस्सेदार तो था ही..! रमेश..!! घर वाले कुछ भी देना नहीं चाह रहे थे.. वो बात अलग थी।

अपने आप को अच्छा दिखाते हुए.. और मुद्दे को पीछे रखते हुए.. दर्शनाजी इलाज के पैसे माँगने के लिए विनीत के कमरे में दौड़ीं चलीं गईं थीं।

इलाज थोड़े ही रुकने वाला था.. लेकिन पैसे देने से पहले पारिवारिक नाटक तो बनता ही था। विनीत रमेश को ख़ुद ही अपनी मोटरसाइकिल पर बिठा अस्पताल तक लेकर पहुँच गया था..

” जमा रुपया ना निकला..! दबाए बैठी सै!”।

रमेश रास्ते भर विनीत के कान खाते हुए.. गया था.. अपनी माँ के लिये कह रहा था.. कि पैसे दबा कर बैठी है! पर यह नहीं कि, मेरे इलाज के लिए ही निकाल कर दे दे।

यही चुगली विनीत ने घर आते ही कर डाली थी।

परिवार का नाटक एकदम सही दिशा में जा रहा था.. हिस्से को देखते हुए.. सदस्य सही रानी गोटी का काट कर रहे थे.. रानी गोटी यानी.. के इस वक्त परिवार की मुखिया.. दर्शनाजी!।

और वैसे भी रमा के मुहँ से स्पष्ट शब्दों में एकबार निकला भी था..” यह ही तो मुसीबत है.! नहीं तो चित भी हमारी और पट भी हमारी..!! अब तो विनीत ने पूरा का हाथी सरका ही लिया है”।

रमा का फैक्ट्री की मालकिन बनने का सपना अब पूरा होता दिख रहा था… जग-जाहिर सी बात थी.. विनीत ने रामलालजी के रहते फैक्ट्री और उससे संबंधित सभी चीज़ो पर कब्ज़ा जो कर लिया था.. और फूला समाती भी क्यों नहीं! रमा..!! आगे का रास्ता जो एकदम साफ़ था..

” माँ बुड्ढी और लड़का बेवकूफ़..!”

सही तो कहा जा रहा है..! पर किसके लिए यह नई कहावत बनाई गई है.. खानदान में… नई कहावत और नए रंगों के साथ जुड़े रहें.. हमारे खानदान के साथ।

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