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खानदान 137

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रमेश एकदम ही money-minded और self-centered आदमी के रूप में बाहर निकल कर आ रहा था। शुरू से जब से रामलालजी का घर में राज़ था.. तो ऐसा कभी लगा नहीं था.. लेकिन पिता का साया हटते ही.. सबकी असलियत सामने आती जा रही थी.. अपने आप को चिल्ला-चिल्ला कर शुरू से ही बिज़नेस मैन बताता आ रहा था… ये रमेश!

सुनीता भी यही सोचा करती थी.. कि हो सकता है! कि बाप-भाई ने दबा रखा हो! नहीं तो यह भी बिज़नेस के शिखर छू सकते हैं। बोलता भी था.. रमेश!

” तू क्या सोचती है! अरे! एक दिन देखना..!! दिन के पाँच-लाख रुपये कमा कर रख दूँगा! ये दोनों कहीं भी नहीं लगेंगें मेरे आगे..!!”।

सुनीता को भी यही लगता रहता था..” हाँ! भई.! हो सकता है..!!”।

पर अब समय के साथ सुनीता को भी अहसास होने लगा था.. और लगने लगा था.. ,” इस परिवार ने पूरी तरह से ही धोखा दे दिया है.. लेकिन पीछे हटने का कोई भी रास्ता नहीं है!”।

” अरे! इनका पैर तो फ़िर से लाल पड़ता जा रहा है! और सूज भी रहा है!”।

सुनीता ने रमा से रसोई में कहा था.. लेकिन रमा को इस बात से कोई भी लेना-देना लगता नहीं था।

” अरे! याद है! आपको डॉक्टर ने कहा था.. रॉड नहीं निकलवाई पैर काटना पड़ सकता है!”।

रमेश का पैर वाकई में लाल और सूजा हुआ था.. सुनीता की बात सुनकर रमेश के मन में डर बैठ गया था.. कहीं पैर कट गया तो..!!

पर इलाज के लिए पैसा..??

क्या..!! फ़िर वही हाल हो गया.. क्या! पैर का!

सुनीता की सोच ही सही थी.. या घर वाले कोई और ही खेल, खेल रहे थे.. जानकारी पाते रहें खानदान के साथ।

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