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खानदान 87

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रमेश अस्पताल से घर आ गया था..  और अब रमेश की घर में ही ड्रेसिंग होनी थी। एक दो दिन तो रमेश ने ठीक-ठाक ड्रेसिंग करवाई थी.. फ़िर जैसे ही सुनीता रमेश के पैर को ड्रेसिंग करने के लिये हाथ लगाती थी.. रमेश ज़ोर से चिल्ला उठता था,” अरे! यह मुझे मार डालेगी!”।

रमेश इतनी बुरी तरह से चिल्लाता था, कि सुनीता समझ ही नहीं पाती थी.. कि यह रमेश ड्रेसिंग क्यों नहीं करने देता, अस्पताल में जब सुनीता ने ड्रेसिंग करी थी, तो कुछ भी नहीं बोला था.. अचानक से कौन सा भूत रमेश पर चढ़ बैठा था.. जो हाथ लगाते ही चिल्लाता था। भूत-वुत कुछ नहीं था.. सारा चक्कर दिमाग़ में घूम रही रंजना का था.. जब पुरुष के ऊपर परायी स्त्री का जादू चल जाता है.. तो ऐसा ही होता है.. पत्नी उसे फूटी आँख नहीं भाती। अपने पैर की ड्रेसिंग रंजना से न करवाकर रमेश खुदी करने लगा था। डॉक्टरों ने रमेश को साफ़-साफ़ शब्दों में बता दिया था, “ जब तक आप का पैर ठीक नहीं हो जाता.. ड्राइविंग बिल्कुल भी नहीं करनी है!”।

“ यो कित जा है!”

दर्शनाजी फटाक से ऊपर सुनीता के कमरे में भाग कर आयीं थीं.. रमेश तैयार होकर बाहर जाने के लिये.. सफ़ारी निकाल रहा था।” इसनें तो डाक्टरां ने गड्डी चलान ताईं मना करया है!”।

दर्शनाजी ने सुनीता से पूछा था.. जिसका जवाब पूछने के लिये सुनीता भागती हुई.. रमेश के पास पहुँची थी।

“ अरे! आपको तो गाड़ी चलाने से मना…!!”

“ अरे! मैं ख़ुद थोड़ी ही गाड़ी चला कर ले जाऊँगा.. किसी को चलाने के लिये बुलाया है.. मैने!”।

रमेश ने सुनीता को बता दिया था.. और वैसे भी ड्रेसिंग करवाने रमेश को अस्पताल जाना था। रमेश ड्रेसिंग करवाने घर से सुबह ही किसी दोस्त की मदद से गाड़ी चलवाकर निकला था..  और उसे लौट के आने में शाम हो गई थी। अब ड्रेसिंग कराने में इतना समय नहीं लग सकता था, दर्शनाजी का दिमाग़ तेज़ी से काम करना शुरू हो गया था.. दिमाग़ के घोड़े दौड़ाती हुई.. सासू-माँ सुनीता के पास आईं थीं..

“ रमेश इब तक कोनी आया! फ़ोन लगा!”।

सुनीता ने इस बार फोन लगाने से मना कर दिया था, और कह दिया था..” आते ही होंगें!”

रमेश शाम को अपने दोस्त जो कि गाड़ी चलाकर ले गया था.. के साथ वापस घर आ गया था। रमेश के पैरों में नई चॉक्लेट कलर की हवाई चप्पल थीं। रंजना रमेश की हवाई चप्पल देखते ही समझ गई थी,” ज़रूर सारा दिन लड़की के साथ बिताया होगा!”।

एक बार रमेश ने सुनीता को बताया भी था,” रंजना को चॉक्लेट कलर बहुत पसन्द है!”। इसी बात से सुनीता ने थोड़ा बहुत आईडिया लगा लिया था।

और फ़िर इस बात की सच्चाई पर रमेश के दोस्त ने पूरी तरह से ठप्पा लगा ही दिया था,” भाभी! ये पूरे दिन किसी लडक़ी के साथ थे!”।

डॉक्टरों के मना करने के बाद भी रमेश अब दोबारा से इन्फेक्शन वाला पैर लेकर रंजना के साथ ख़ुद ही सफ़ारी चलाकर घूमनें लगा था।

“ यो गड्डी चला के जान लाग गया! कुछ हो जागा!”।

दर्शनाजी को अच्छी तरह से पता होता था.. कि रमेश रंजना के साथ ही घूमता-फिरता है.. फ़िर भी घर में कुछ कहा सुनी हो! कुछ मिर्च मसाला हो.. इसलिये लगातार रामलालजी के कान भरतीं रहतीं थीं। अब घर में यानी के सुनीता के कमरे में एक बार फ़िर से रंजना को लेकर माहौल ख़राब होता जा रहा था.. छोटे-मोटे लड़ाई झगड़े फ़िर से जगह लेने लगे थे।

इधर रामलालजी की तबियत ख़राब होती जा रही थी.. पूरी तरह से बिस्तर में आ गए थे.. रामलालजी। विनीत रामलालजी के कहने पर उन्हें अस्पतालों के चक्कर कटवाने लगा था। डॉक्टरों ने रामलालजी के लिये साफ़-साफ़ शब्दों में कह दिया था,” बाबा! आप आराम करो! अभी उम्र है.. और कुछ हो नहीं सकता!”।

लेकिन रामलालजी को कहीं न कहीं अपने पैसे का घमंड था, उनकी सोच यही थी.. कुछ भी हो! कैसे भी हो! मुझे पैसा लगाकर फ़िर से वैसा ही बनना है। एक बार तो रामलालजी ज़बर्दस्ती सरकारी अस्पताल में जाकर ख़ुद ही भर्ती हो गए थे, पर होना-जाना कुछ नहीं था.. पैसे वाले आदमी थे, अच्छा-ख़ासा बिल बनवाकर लौट आए थे.. पर उनकी आत्मा संतुष्ट ज़रूर हो गई थी.. चलो! मेरा इलाज तो हुआ!

फिर एक दिन अचानक से सुनीता सुबह वहीं काम कर रही थी, कि अचानक रामलालजी की आवाज़ सुनाई दी,” हमनें ऑटो वाला बुलवाया है! देख कर आओ! आ गया क्या!!’”।

अब सभी तरह के इलाज तो करवा लिये थे.. रामलालजी ने! फ़िर ये ऑटो में बैठकर कहाँ जाने की प्लांनिंग थी.. हो सकता है.. रामलालजी के दिमाग़ में अब कोई नया और बेहतरीन तरीका आ गया हो! एक बार फ़िर से बीते हुए.. समय में लौटने का। कहाँ की योजना बनाते हुए.. ऑटो में बैठकर निकले थे.. रामलालजी… रामलालजी की सेहत के बारे में जानने के लिये पढ़िये.. खानदान।