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खानदान 101

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सुनीता और दर्शनाजी विनीत की दस-लाख वाली बात सुनकर अभी वहीं खड़े थे।

“ अगर आपको मेरे गहनों की ज़रूरत पड़े तो मुझे बता देना!”।

सुनीता ने दर्शनाजी से कहा था।

“ एक बार विनीत ने घरां आ लेन दे! दखां! के बात बनी से!”।

इंतेज़ार ख़त्म हो जाता है.. और विनीत घर आ जाता है।

“ घणी बहस करी उन पुलिसियों ने मेरे गेल! जबके माथा मारन लाग रे सें! बड़ी मुश्किल ते साढ़े-चार लाख में माने! सवेरे बैंक में जमा करके ने.. काढ़ लयावायंगे उसनें!”।

विनीत आधी रात के बाद थाने से आकर सीधा ही अपनी माँ के साथ बैठ गया था.. और उन्हें थाने में हुई बहस की जानकारी दे रहा था.. विनीत के मुताबिक पुलिस वालों की  विनीत और उसके संग गए जानकारों के साथ जम कर बहस हुई थी। कई घन्टे माथा मारने के बाद बड़ी मुश्किल से पुलिस वाले दस से साढ़े-चार लाख में माने थे। अब विनीत का अपनी माँ से कहना ये था.. कि सुबह होते ही विनीत पैसा बैंक से निकाल कर और वहाँ जमा करके रमेश को घर वापिस लेकर आएगा।

दर्शनाजी को अब विनीत की बातें सुनकर थोड़ी सी तसल्ली हो गई थी.. कि चलो! कोई बात नहीं दस लाख से कम होकर बात साढ़े-चार लाख पर पहुँच चुकी है.. और विनीत जाकर सुबह रमेश को लेकर आ जाएगा। अब भई! पैसे वाली पार्टी तो थे ही.. दर्शनाजी.. पत्नी स्वर्गीय श्री रामलालजी दो-दो फ़ैक्टरियों के मालिक.. साढ़े-चार लाख पुलिस स्टेशन में देना उनके लिये कोई भी बड़ी बात नहीं थी, और वैसे भी अगर पैसा उल्टे कामों के लिये निकल रहा हो! तो दर्शनाजी उसमें बेहद ख़ुश हुआ करतीं थीं.. अब मातारानी के दिमाग़ की वजह से ही तो उनकी ज़मीन का पैसा कहाँ का कहाँ उड़ गया था.. पता ही नहीं चल पाया था। दर्शनाजी अगर चाहतीं तो पैसे का सही इस्तेमाल करके रामलाल विला को एक नया रूप दे सकतीं थीं.. पर विधि का विधान कुछ और था.. परमात्मा कुछ और ही चाहते थे। खैर! जो भी हो! रमेश के नाम के पैसे सवेरे थाने में जमा होने वाले थे.. और रमेश सफ़ारी को लेकर मामला रफा-दफा कर घर आ ही जाता।

रंजना ने भी अपना नाटक बखूबी निभाया था, विनीत के मोबाइल पर लगातार ग्यारह या फ़िर बारह बार मिस कॉल करे हुए.. थे, जिनके बारे में विनीत ने घर आने के बाद ही जानकारी दी थी। रंजना को भी सफ़ारी गाड़ी और रमेश के बारे में अच्छी तरह से पता चल चुका था।

सवेरे का वक्त था.. अब थाने जाने का समय होने ही वाला था, घर में पैसों को लेकर अभी थोड़ी चुप्पी थी.. इस चुप्पी को तोड़ते हुए.. ही दर्शनाजी विनीत से बोल पड़ीं थीं,” ए चाले ने! मैं अपने बैंक ते काढ़ लायउँगी पैसे!”।

दर्शनाजी ने चुप-चाप बैठे हुए.. विनीत से अपने पर्सनल बैंक एकाउंट से रमेश के लिये पैसे निकालने के लिये कहा था। जिसका विनीत ने दर्शनाजी को कोई भी जवाब नहीं दिया था.. और बिना ही कुछ बोले रमेश को पुलिस स्टेशन से लेने चला गया था।

“ मैं आपके लिये पैसों से भरा बैग और वकील लेकर आने ही वाली थी”।

अरे! कोई और भी तो था.. जो रमेश के लिये नोटों का बैग लिये तैयार खड़ा था। अगर इस शुभचिन्तक का पहले पता चल गया होता, तो फ़िर तो विनीत और दर्शनाजी की मुश्किल बिल्कुल ही आसान हो जाती। रमेश के इस शुभचिंतक से मुलाकात करने के लिये और कहानी का आगे का हाल जानने के लिये.. पढ़ते रहिये खानदान।