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खानदान 100

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“ रमेश ने अंदर बिठा लिया से!”।

दर्शनाजी सुनीता के पास ऊपर भागी-भागी आयीं थीं, उनके साथ विनीत भी था। रमेश को थाने में बैठा लेंगे ऐसा सुनीता ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था, इसलिये दर्शनाजी की बातें सुन और विनीत को दर्शनाजी के संग देख सुनीता घबरा गई थी।

“ उनको निकालने के लिये चाहे मुझे अपना कुछ भी बेचना पड़े, मैं उन्हें निकाल लूँगी! आप लोग प्लीज पैसे की चिन्ता मत करना.. मैं जो बोलोगे करने को तैयार हूँ!”।

सुनीता ने विनीत और दर्शनाजी के आगे कहा था, यह सब बोलने की सुनीता को कोई भी ज़रूरत नहीं थी.. पर चलो! कोई बात नहीं, उसनें अपनी समझ का प्रदर्शन वक्त पर ठीक ही कर दिया था। सुनीता के इस तरह से अपने योगदान देने को लेकर विनीत और दर्शनाजी एकदम चुप खड़े रहे थे। और नीचे आ गए थे। विनीत अभी थाने में न जाकर घर में ही कुछ सोचते हुए, इधर से उधर चक्कर लगा रहा था। तभी रमा सबके बीच में वहाँ आकर खड़ी हो गई थी।

“ नहीं भई! ये थाने नहीं जायेंगे!”।

“ ओर कोन जागा!”।

रमा नहीं चाहती थी, कि विनीत थाने रमेश के चक्कर में जाए.. पर दर्शनाजी का क्योंकि रमेश बेटा था, और फ़िर जो भी वो उस वक्त सोच रहीं हों.. विनीत को ही भेजना चाह रहीं थीं। विनीत न तो अभी तक कुछ बोला था.. और न ही उसनें अपना फैसला लिया था, पर थोड़ी देर तक इधर-उधर घूमनें के बाद विनीत बिना माँ और पत्नी को कुछ कहे पुलिस स्टेशन के लिये निकल गया था। अब न जाने वहाँ थाने में क्या होना था, और क्या नहीं.. इस बात का किसी को भी पता न था.. लेकिन रमेश को वहाँ से निकालने में पैसे लगेंगें इतना अंदेशा तो था। रामलालजी के घर में रिश्तों का न होकर पैसों का ही तो खेल था.. अब वे तो बीच में थे नहीं.. और घर में किसी के न चाहते हुए भी विनीत सभी चीज़ों का मालिक हो गया था। रमा को पुलिस स्टेशन में लगने वाले पैसों की चिंता सताने लगी थी.. और इसी बात को लेकर उसनें दर्शनाजी के सामने बहस शुरू कर दी थी।

“ ये तो राम हैं! अपने लक्ष्मन को बचाने ज़रूर जाएंगे!”

रमा के बढ़िया-बढ़िया डॉयलोग शुरू हो चुके थे.. सीधा पैसों को लेकर बोलने में रमा सासू-माँ के आगे थोड़ा सा डर महसूस कर रही थी.. क्योंकि रमेश आख़िर था तो.. कंपनी में हिस्सेदार.. और माँ ही सामने बैठीं थीं, सीधी बात करने में डर तो लगना ही था। खैर! दोनों सास-बहू में पिछली बातों को लेकर जम कर बहस शुरू हो गई थी.. रमा ने सासू-माँ की बिकी हुई ज़मीन की चर्चा शुरू कर दी थी.. उसका दर्शनाजी से कहना साफ़ था.. कि विनीत थाने में रमेश के लिये ज़रूरत पड़ने पर पैसे क्यों भरे.. वो सारे ज़मीन के पैसे कहाँ गए..?

पर दर्शनाजी भी कम न थीं.. बहस और बातों में वाकई में रमा की सास लगतीं थीं। उन्होंने उनकी पुश्तेनी ज़मीन जो की सारी रमेश ने ही बेची थी.. उसकी बात बिल्कुल भी ऊपर नहीं आने दी थी।

बहस और बातें चल ही रहीं थीं.. और विनीत का कोई थाने से फ़ोन भी नहीं आया था। समय आधी रात से भी ऊपर का हो चुका था, रमा सासू-माँ के आगे हार मानकर अपने कमरे में चली गई थी.. लेकिन सुनीता विनीत के फोन के इंतेज़ार में अभी वहीं दर्शनाजी के संग ही खड़ी थी.. कि अचानक दर्शनाजी के फोन पर विनीत का फ़ोन आ ही जाता है।

“ दस लाख रुपये माँगे हैं!’।

“ के!”।

पुलिस स्टेशन में विनीत के सामने दस-लाख रुपयों की माँग रख दी गई थी.. आख़िर सफ़ारी गाड़ी का मामला था.. और फ़िर पुलिस वाले पूरी फैक्ट्री और घर का जायज़ा लेकर ही गए थे।

ओहो! पैसा प्रेमी परिवार के लिये यह बहुत मुश्किल की घड़ी थी.. ऐसा तो होना ही था.. जोड़ा हुआ धन अगर सही जगह नहीं लगाया जाए.. तो वो कहीं न कहीं निकल ही जाता है। तो फ़िर कितने पैसे रखवाए पुलिस ने विनीत से सफ़ारी के मामले में रमेश को लेकर। सही रकम जानने के लिये पढ़ते रहिये खानदान।