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खानदान 10

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हाँ! दर्शनाजी को अपने पालतू कुत्तों से बेहद लगाव था। सुनीता के घर में तो कभी कुत्ते पाले न थे,इसलिए वो तो अक्सर दूर ही रहा करती थी कुत्तों से। ब्याह के बाद सुनीता ने रमेश के घर में ही कुत्ते देखे थे, उसे अब रामलाल जी की कही हुई बात भी याद आ रही थी,”हमारे यहाँ तो अण्डे सिर्फ़ कुत्तों को ही खाना allowed है’।

वाकइ बिल्कुल सही बात थी..दर्शनाजी तो रामलालजी से भी ज़्यादा सेवा अपने कुत्तों की ही किया करतीं थीं.. कुत्तों को अंडे और केले रोटी में मिक्स कर के देना दर्शनाजी का रोज़ जा नियम था।घर में खान- पान को लेकर भी बहुत हाई सिक्योरिटी लगा रखी थी,दर्शनाजी ने..क्या किसको और कब खाना है,यह सब वो ही तय किया करतीं थीं।

सुनीता यह सब देखकर थोड़ी हैरान थी…सोच में डूब जाया करती थी,”क्या अजीब सिस्टम कर रखा है, इस औरत ने…बहुत ज़्यादा ही टोकती है,पता नहीं कौन सी करोड़पति है”। सुबह होते ही दर्शनाजी रसोई में सिपाही की तरह से घुस जाया करतीं थीं.. जैसे कोई मोर्चा संभाल रही हों। कितनी सब्ज़ी बननी है,और कौन सी सब्ज़ी बननी है..किसको कितने साइज के पराँठे और रोटी देने हैं.. यह सब दर्शनाजी ही तय किया करतीं थीं। यह कोई नई बात न थी,या फ़िर बहुत ज़्यादा सोचने का विषय ही था ..क्योंकि महिलाएँ ही घरों में रसोई की हैड होती हैं, और इस तरह की खाने पकाने वगरैह को लेकर क़िस्से सुनने में आ ही जाते हैं।

पर सुनीता को यह सब बिल्कुल भी न भाता था..उसके खुद के घर में यह माहौल था ही नहीं.. बहुत ही खुले विचारों का परिवार था..सुनीता का हर मामले में , तो अजीब तो लगता ही है। दर्शनाजी का वयवहार सुनीता को रामलालजी को लेकर भी बहुत ही फूहड़ लगा करता था..हर वक्त रामलालजी से गाली देकर और बदतमीज़ी से बात करना दर्शनाजी का स्टाइल लगा करता था.. सुनीता को। रामलालजी का हर एक सलीका सुनीता को बाकी के घर के सदस्यों की तुलना में थोड़ा भा गया था.. आख़िर उस वक्त के पढ़े-लिखे व्यक्तियों में से आया करते थे..रामलालजी अपने ज़माने के इंजीनयर जो थे।

इतने पढ़े लिखे होने और दो-दो फैक्टरियों के मालिक होने के बावजूद भी रामलालजी बीवी की इतनी गालियाँ क्यों खाया करते थे.. यह बात सुनीता को कुछ हज़म न हो रही थी। आख़िर उसने एक दिन यह सवाल रमेश से कर ही डाला था,” बाबूजी को अम्माजी इतनी गालियाँ देकर और बदतमीज़ी से बात क्यों करतीं हैं”। इस पर रमेश का जवाब था,”अरे!ये आदमी ही ऐसा है..बाद में कभी बतायउँगा”। यही बात सुनीता ने रमा से भी पूछी थी,”बाबूजी को गालियाँ देकर क्यों संबोधित करतीं हैं.. अम्माजी”। जिस पर रमा ने भी यही जवाब दिया था,”होगी कोई कमी,नहीं तो कौन किसकी गाली खाता है”।

यह हरियाणे का ऊट-पटांग सा माहौल सुनीता को बिल्कुल भी रास न आ रहा था.. पर करती भी क्या!! सारे घर में केवल दर्शनाजी का ही व्यक्तित्व आकर्षित करने वाला था..शक्ल से घमण्ड और एक अजीब सा भाव झलका करता था..जैसे कि कोई अत्याचारी महिला हो। एक बात तो गौर करने वाली थी..और वो यह कि हमेशा ही गिरनी नहीं चढ़ती थी.. दर्शनाजी को..सुनीता ने एक दूसरा रूप भी देखा था उस महिला का। परिवार में खुश भी रहा करती थी..और कभी-कभी तो शाम को खुश होकर बहुओं को ले कुत्ते घुमाने भी निकल जाया करती थी। दर्शनाजी में मैं के अलावा और कुछ भी नज़र न आया करता था.

खैर!परिवार में पैसे की तो कोई कमी थी ही नहीं.. कहते भी तो हैं.. पैसा बोलता है,आदमी नहीं। पर जिस हिसाब से करोड़पति और फैक्टरियों वाले लोग थे..उस हिसाब से परिवार की मानसिकता नहीं थी। ऐसा नहीं है,कि हरियाणे की औरतों में सलीका नहीं होता..हमनें भी हरियाणवी परिवार देखे हैं, और सुनीता के मायके में से भी उनकी जान पहचान वालों ने अपनी बेटियों के रिश्ते हरियाणे में कर रखे थे..पर यह तमाशा तो देखने और सुनने में पहली बार ही आ रहा था..सुनीता के सामने।

दर्शनाजी ने अपने परिवार को कोई भी संस्कार नहीं दिए थे। हाँ! हरियाणे की भाषा ज़रूर लठ मार हो सकती है.. पर रिश्ते तो अपनी जगह ही होते हैं। पर यहाँ तो कमाल ही था..न कोई रिश्तों की अहमियत ही थी.. और न ही कोई अहसास था।
दर्शनाजी किसी भी राजनीतिज्ञ से कम न थीं, खुद तो सबसे रिश्ते और प्यार दर्शाती फ़िरती थीं.. पर इस रमेश के मन में रमेश के पिता भाई और भाभी, यहाँ तक की सुनीता और सुनीता के परिवार के ख़िलाफ़ भी ज़हर घोले जा रहीं थीं। सुनीता ने रमेश को कई बार समझाने की कोशिश भी की थी.. पर कमाल का आदमी था,अपनी माँ की सही बात को तो छोड़ो..पर गलत और उनकी बदतमीजियों में भी पूरा-का पूरा भागीदार था।

क्यों अपनी माँ का इतना अंधा भक्त था,रमेश..अपने बाबूजी को तो माँ के आगे बिल्कुल भी न पूछता था,और भाई का तो कोई नाम ही न था। दर्शनाजी के पीछे रमेश के इतने ज़्यादा पीछे घूमने के कारण को अभी सुनीता ठीक से समझ नहीं पाई थी.. दिमाग़ का बेहद तेज़ इन्सान था,रमेश अपने आप को एक्सपोज़ होने ही नहीं देता था। सुनीता अभी सीधी भोली और मासूम थी.. रमेश और रमेश की माँ के ड्रामों के रहस्य से थोड़ा बेख़बर ही थी.. वो तो अपनी तरफ़ से ससुराल में ईमानदारी से रिश्तों को निभाने में जुट गई थी..माँ बापू से संस्कार जो लेकर आई थी।

वो कहते हैं.. न..काजल की लिख में केसों सयानो जाय..क्या सुनीता इसी परिवार के रंग में रंग अपने आप को कहीं खो देगी..क्या दर्शनाजी सुनीता पर इतनी ज़्यादा हावी हो जायेंगी की सुनीता का वजूद ही मिट जाएगा। या फ़िर परमात्मा का नाम लेकर सुनीता इसी कीचड़ में जन्मे और संस्कारों रहित पुरुष के साथ अपना ग्रहस्थ बसाने में कामयाब हो जाएगी।