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कहाँ हो माँ!!

meri maa

कहाँ रह गईं हो तुम माँ! आ जाओ वापिस अब तुम्हें हम सब को छोड़ कर गए हुए एक साल होने को आया है। बहुत याद आती है, तुम्हारी। मान लिया माँ कि तुम्हारा वहाँ उन लोगों में मन लग गया है, जहाँ तुम हम सब को छोड़ कर चली गई हो..  पर क्या वह लोग जो तुम्हें लेने आए थे, वह इतने अच्छे थे.. हमसे भी ज़्यादा अच्छे जो तुम हमसे मिलने अब एक दिन के लिये भी नहीं आ सकतीं.. सब तुम्हारी बहुत याद करते हैं, माँ! क्या तुम्हें पता है, कि तुम्हारे जाने के बाद पिताजी और भाइयों ने मिलकर घर का रंग बदल दिया है। अब पहले वाले रंग से यह रंग कहीं बेहतर और सुन्दर लग रहा है। तुम्हारा और पिताजी का कमरा तो पहले से अधिक सुन्दर और जम रहा है। न कोई चिट्ठी न ही कोई ख़बर लगता है, बिल्कुल ही भुला दिया है, तुमनें हम सब को। माना वह लोग जिनके साथ पिछले एक साल से तुम रह रही हो, बेहद अच्छे हैं, और तुम्हारा ख़याल भी रखते हैं.. तो फ़िर तुम ऐसा करो कि उन्हीं के साथ सिर्फ़ कुछ पलों के लिये हम सब से मिलने आ जाओ.. कह देना अपने परिवार से मिल कर आज ही वापिस आ जाऊंगी, न रुकूँगी उनके साथ.. ऐसा कहने पर हो सकता है, कि वो लोग मान जाएँ और तुम्हें हमसे मिलवाने ले आयें।

बहुत नाराज़ हो कर गईं थीं तुम… इतनी नाराज़ कि न ही फ़िर कभी सपनों में ही आयीं, और न ही जाते वक्त तुमनें टाटा बोलने का ही मौका दिया था। माँ तुम्हारे साथ बीता हुआ इतना लम्बा सफ़र बहुत याद आता है, वो ज़िंदगी की रेल का हर एक स्टेशन और उस स्टेशन पर बिताए तुम्हारे साथ वो अनमोल पल.. तुम्हारा स्पर्श, तुम्हारे हाथों का वो स्वाद, तुम्हारी मीठी मुस्कान सभी तो यादों के रूप में छोड़ कर चली गई हो.. एक बार कहा तो होता, कि अब ऐसा न लग रहा है, कि “ लौट आऊँगी” तो हम तुम्हारे पास किसी को भी लेने आने के लिए फटकने ही न देते। बहुत चालाकी से तुम हम सब को छोड़ कर चलीं गयीं.. आ जाओ न माँ इस बार बहुत अच्छे से रखेंगें, न करेंगे कोई भी गलती तुम्हारे साथ.. बस! तुम हमारे सामने बैठ हम सब को यूँहीं देखा करना और कुछ नहीं चाहये तुमसे। बस! बहुत हो गया.. अब अपने लौट कर आने की खबर भेज दो.. पिताजी और सारा परिवार तुम्हें देख कर खुशी के मारे उछल पड़ेगा।

माँ जब तुम्हें ले जाने के लिए वे लोग खड़े थे, और तुम भी उन लोगों के साथ जाने के लिये तैयार हो गईं थीं.. जो हमारे और तुम्हारे लिये बिल्कुल अनजान थे.. अपना सामान बाँध तुमने भाईयों, पिताजी और सारे परिवार को बताया व सबसे मिलकर भी गईं… फ़िर मुझे क्यों न बताया माँ, कि तुम थोड़े से दिनों के लिये कहीं और रहने जाने वाली हो… लगता है, मेरी कोई बात तुम्हें बहुत ही बुरी लग गई थी, इसलिये तुमनें मुझे बताना जरूरी ही न समझा और तो और पिताजी को भी न बताने का आर्डर दे दिया था, चलो! कोई बात नहीं.. हो गई हो गी मुझसे कोई गलती.. एक बार तुम थोड़ी सी देर के लिये मुझसे मिलने आ जाओ, जिससे मैं तुम्हें अपने मन की अनकही बात बता सकूँ, जो में तुम्हें उस वक्त कहना चाह रही थी, जब तुम कहीं और जाने के लिए अपना सामान ले कर आने वाली रेल गाड़ी में चढ़ने को तैयार खड़ीं थीं।

माँ! मुझे तुमसे सिर्फ़ यही पूछना है, क्या! तुम उन लोगों के साथ जाकर खुश थीं, या फ़िर तुम्हारे साथ कोई ज़बरदस्ती हुई थी। जो भी बात हो आकर साफ़-साफ़ बता दो माँ!.. मन की सभी दुविधाओं को दूर करने एक बार आ जाओ न माँ!

चलो! मत आओ अपने-आप से पर अपना कोई पता कोई फ़ोन नम्बर तो भिजवा दो, पूरा एक साल होने को आया जब तुम्हारी आवाज़ फ़ोन पर सुनी थी, आखिरी बार जब तुम्हारी आवाज़ फ़ोन पर सुनी थी, माँ! तो तुमनें मुझे ऐसे टाटा बोला था, जैसे कि दोबारा न मिलोगी.. क्यों! आखिर क्यों न मिलोगी.. लोग आते-जाते ज़रूर हैं, पर तुम्हारी तरह न लौट कर आने की ज़िद्द कोई भी न पकड़ता है.. चलो! भई! ठीक है, न तुमसे कोई काम करवाएंगे, न ही तुमसे कोई कुछ बोलेगा.. एक बार सॉरी कर दे माँ! पर लौट कर आ जा.. बहुत याद आती है, तेरी। अब सब बात मानूँगी जो कहेगी वो ही विदा ले कर ससुराल को आ जायउँगी किसी भी तरह की कोई ज़िद्द न होगो मेरी तरफ़ से.. बस! इस बार जब मैं मायके पहुँचूँ तो तू अपनी जगह बैठी मिलना।

कम से कम पिताजी के ही बारे में सोच कर देख न माँ! तुम्हारे बग़ैर कितने अकेले हो गए हैं, और तुम हो कि पता नहीं कौन से जहाँ में जा कर छुप गई हो.. वैसे इस बार तुमनें तो अपना पता भी न छोड़ा.. कौन हैं, किसके संग जा रही हो.. अब मेरी इन बातों पर मुस्कुराना छोड़ सामने आ जाओ माँ!

जब तक तुम्हारा मन हो रह लेना हमारे साथ फ़िर आगे जो तुम्हारी मर्ज़ी..

तुम्हें मालूम है, माँ! जब भी मैं डोसे वगरैह बनाती हूँ.. मुझे तुम्हारी बहुत याद आती है। जब भी तुम्हें और पिताजी को खिलाने का नम्बर आया करता था, तुम्हारा ही डोसा बेहद क्रिस्प और शानदार बना करता था। मैं तुम्हें हमेशा ही टोका करती थी,” कम से कम पिताजी को तो खाने देना.. मना मत करना, खुद भी कम खाती हो और पिताजी को भी टोक देती हो”।

पर अब तुम्हे मैं कभी भी किसी भी बात के लिये न टोकूँगी… माँ! मैं तुम्हारे लिये डोसे बनाने की तैयारी फ़िर से कर के रखूँगी, बस! कहाँ हो माँ! एक बार बता तो दो .. और जो हुआ सो हुआ.. पर अब मिलने आ जाओ।

बेशक तुम फोन पर बात करो या फिर बिल्कुल मत करो.. पर तुम्हारा चेहरा और तुम्हारे छोटे-छोटे से प्यारे हाथ, तुम्हारा वो कोमल स्पर्श बिल्कुल नहीं भूलता।

पता है, मेरा क्या मन होता है, कि तुम्हारे और पिताजी के साथ एक बार फ़िर से वही बचपन जी कर देखते हैं.. बस! तुम, हम तीन बहन-भाई और पिताजी। दोबारा से अपने उसी परिवार के साथ अपनी नई ज़िन्दगी की शुरुआत करके देख लेतें हैं। एक बार फ़िर हम बच्चे बन जाते हैं.. और तुम हमारी माँ, और यही पिताजी। वैसे तो ज़िन्दगी की रेल गाडी अब बहुत आगे वाले स्टेशन पर पहुँच गई है, बहुत सारे नए यात्री भी हम तीनों बहन-भाइयों और पिताजी के साथ इस सफ़र में शामिल हो गए हैं.. इन यात्रियों में से बहुतों को तो तुम भी जानती हो.. याद है, माँ! जब तुम पिछले स्टेशन पर उतर गईं थीं, तो हम पाँच सदस्यों के अलावा और जो भी यात्री हमारे साथ इस ज़िन्दगी रूपी रेल में बैठे थे, सभी से तो टाटा की थी, तुमनें।

माँ! वो हमारे साथ बैठे यात्री जिनसे हम सबका एक रिश्ता कायम हो चुका है.. तुम्हारी बहुत याद करते हैं। चल! ठीक है, मैं इस रेल के ड्राइवर से कह रेल गाड़ी उसी स्टेशन पर पीछे बैक करवा देती हूँ, पर तू गाड़ी में चढ़ने के लिए तैयार मिलना.. हाथ का सहारा दे तुझे अपने साथ अपने डब्बे में फ़िर खींच लेंगें। हम चार सदस्य और हमारे साथ वो यात्री जो एक-एक कर के हमारे जीवन में शामिल होते चले गए, और आज ज़िन्दगी की इस रेल गाड़ी का अहम हिस्सा बन गए हैं.. अब तो इनके बग़ैर भी यह सफ़र अधूरा और सूना हो जाएगा.. पर तेरी सीट अभी-भी खाली है.. चिन्ता मत कर तेरी सीट पर कोई और आकार न बैठेगा.. बस! तू अब आने की जल्दी-जल्दी तैयारी कर ले.. मैं परमात्मा रूपी ड्राइवर से कह कर गाड़ी को सिर्फ़ तेरे बैठने के लिये रिवर्स करवा देती हूँ।

तुझे याद है,कुछ जिन नन्हें और मासूम यात्रियों को तू टाटा कर के गई थी, सब तेरी बहुत याद कर रहे हैं.. कहते हैं, इस खाली सीट पर वही आकर बैठेंगी जो पहले यहाँ बैठा करतीं थीं।

माँ! तू अकेले ही समान वगरैह ले कर इतने लम्बे सफ़र पर निकल गई थी, बिना ही खाना-पानी लिये चली गई.. भूख-प्यास लगी होगी तुझे, पता नहीं रास्ते में कुछ खाने-पीने का इंतेज़ाम था, कि नहीं।

हाँ! पर तु मेरे लिये तो इस बार ढ़ेर सारी विदा छोड़ कर गई थी.. बहुत अमीर बना गई माँ तू मूझे जाते वक्त। तुझे पता भी है, कि मैं इस बार तेरे जाने के बाद मायके से तीन-चार बैग भर कर ले गई थी, पिताजी ने मुझे वो बचपन वाला सूटकेस भी दे ही डाला.. मैने तो बहुत मना किया, पर पिताजी ही न माने।

मुझे याद है, जब मैंने तुमसे अपनी आख़िरी बार तुम्हारे जाने से कुछ ही दिन पहले बात की थी, तो तुम मुझे गर्म कुर्ता देना चाह रहीं थीं.. पर मैने ही मना कर दिया था.. पर अब नहीं माना करूँगी.. चलो! अब अपना सामान वगरैह बांधो और वापिस आने की तैयारी कर लो। कौन सी गाड़ी से तुम लौट कर आ रही हो, किसी से कहलवा देना.. तुम्हें लेने के लिये सब तैयार ख़ड़े मिलेंगें।

आ जाओ न माँ! मैं कचौड़ियों का आटा तैयार कर व आलू उबाल कर रखूँगी। तुम्हारे लौट कर आने की खुशी में एक बार फ़िर सारा परिवार मिलकर तुम्हारे हाथों से बनी मस्त कचौड़ियों का आनन्द लेंगें।

ज़्यादा तो नहीं सिर्फ़ एक दिन के लिये खुश करने तो आ ही सकती हो.. आ जाओ माँ! घर के द्वार पर अब आँखे तुम्हारे आने के इंतेज़ार में टिक गयीं हैं.. कब तुम एक बार फ़िर द्वार पर आकर खड़ी होगी, और हम तुम्हारे लिये कब लपक कर दरवाज़ा खोलेंगें। तुम्हारे बग़ैर घर-संसार अधूरा है.. इस अधूरेपन को एक बार आकर फ़िर से भर दे न माँ। अपनी खाली जगह पर फ़िर से आकर बैठ जा।

कहाँ हो माँ! बस!बहुत हो गया.. अब लौट आ!