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क़ानू!!!

कानू का जन्मदिन

भोपाल हरा-भरा मस्त शहर है। बरसातों का मौसम यहाँ बेहद रँगीन हो जाता है। चारों तरफ़ मस्त फुहार और हरियाली छाई होती है। क़ानू-मानू को बारिशों का मौसम बेहद पसन्द आता है। बारिश में खेलना क़ानू का मन पसन्द काम था। हम तो क़ानू को बारिश में जाने से रोकते ही रह जाते थे,कि क़ानू हमारी बात सुनने को ही तैयार न होती थी। एक बार क़ानू बारिश में भीग जाए तो सुखाना भी तो मुश्किल होता था। और बारिशों में सूखती भी कैसे धूप तो होती ही नहीं है,सफ़ेद ऊन का गोला है,क़ानू सूखने में तो टाइम लगता ही है।

खैर! क़ानू का बारिशों में घर से तीन टाइम बाहर निकलना और घूमना तो बनता ही है। एक दिन हम  दोपहर के टाइम क़ानू को लेकर बाहर घूमने निकल पड़े थे..मौसम तो सुहाना हो ही रहा था,क़ानू को लिए अभी हम थोड़ा सा ही घर से दूर थे कि क्या देखते हैं, सामने वाली कोठी में चौकीदार भइया एक बहुत ही छोटे से प्यारे से कुत्ते को खड़े होकर खिला रहे है। सच!मे बहुत ही प्यारा सा कुत्ता था। हम भी वहीं क़ानू को लेकर खड़े हो गए थे,और पूछ बैठे थे,”अरे!भइया यह छोटा सा पिल्लू किसका है,बहुत ही स्वीट है”। और चौकीदार ने हमें जवाब में कहा था,”भाभी यह पिल्लू नहीं..अपनी क़ानू जैसी ही तो है,पता नहीं कहाँ से घूमती हुई रोज़ यहाँ आकर हमारे साथ ही खेलने लग जाती है”।

वाकई थी तो बहुत ही प्यारी एकदम सफेद और ब्राउन से कलर की। हमनें देखते ही नाम टुक-टुक रख दिया था। अब जब भी हम रोज़ शाम सवेरे क़ानू को लेकर बाहर निकला करते थे,तो हमें हमेशा ही टुक-टुक खेलती हुई नज़र आती थी। थी,तो देसी कुत्ती पर थी बहुत ही छोटी और प्यारी सी। क़ानू भी वहीं रुक कर हमारे साथ कुछ देर तक टूक-टूक के साथ खेलने लग जाया करती थी। टुक-टुक वाकई में बहुत ही ज़्यादा शरारती थी, कॉलोनी के बच्चों से भी टुक-टुक बहुत ज़्यादा हिल-मिल गयी थी,कभी कोई टुक-टुक को अपने घर ले जाया करता था,तो कभी कोई। क्योंकि टुक-टुक क़ानू-मानू की बेस्ट फ़्रेंड बन गयी थी..और बच्चों को भी बहुत ही प्यारी लगने लगी थी, इसलिए हम टुक-टुक को घर ले आये थे..और उसे अपनी छत्त पर अलग से रखने का इंतेज़ाम कर दिया था। वैसे तो क़ानू कभी किसी भी कुत्ते के साथ नहीं खेलती थी, पर टुक-टुक के साथ क़ानू-मानू की बहुत ही अच्छी दोस्ती हो गई थी। क़ानू टुक-टुक के साथ बहुत ही अच्छी तरह से खेलती कूदती रहती थी। टुक-टुक तो देसी यानी के गली की डॉगी थी,तो बाहर गेट से बाहर भी भाग जाया करती थी..और क़ाफी देर बाहर खेल-कूद करके वापिस अन्दर आने लगी थी। सभी परिवार के सदस्य टुक-टुक के साथ अच्छी तरह से घुल-मिल गए थे।

बारिशों का मौसम तो था  ही,एक दिन बहुत ही मूसलाधार बारिश हो रही थी,और तूफ़ानी मौसम हो आया था। हम सभी घर मे बन्द हो गए थे। हवाएँ बहुत ही तेज़ चल रहीं थीं, अचानक हमें क़ानू को देखने का मन हो आया था, हमनें फोल्डिंग बेड के नीचे झुककर देखा..क़ानू वहाँ पर थी ही नहीं, हमने सोचा घर में ही इधर -उधर होगी..अब हम यह तो नहीं कह सकते थे, कि क़ानू तूफान से डर कर छुप गई,क्योंकि डर नाम की चीज़ तो क़ानू के दिमाग़ में ही दूर-दूर तक नहीं थी।

क़ानू! क़ानू! पुकारते हुए पूरे घर मे घूम रहे थे, क़ानू का हमें कहीं अता-पता ही नहीं लग पा रहा था। वैसे जब भी हम क़ानू को आवाज़ देते हैं, तो एक ही आवाज़ में अपनी फ्लॉवर जैसी पूँछ हिलाते हुए और भौंकते हुए हमारे पास आ जाती है..पर उस दिन तो कमाल ही हो गया था,क़ानू! क़ानू! पुकारते हुए हमनें पूरे घर के चक्कर लगा डाले थे,पर न कोई क़ानू न कोई क़ानू का नाम। अब तो हम घबरा गए ..और हमनें घबराहट में सोचा कि हो न हो क़ानू ऊपर छत्त वाले कमरे में टुक-टुक के साथ बैठी है,सो हम फटाफट ऊपर छत्त वाले कमरे की तरफ़ दौड़े..देखा तो न क़ानू और न ही टुक-टुक। अब तो हम बहुत ही ज़्यादा घबरा गए थे,और घबराहट में अपने घर के गेट से नीचे दौड़ते हुए घर से बाहर ही निकल आये थे..ज़ोर-ज़ोर से आवाज़ें लगा रहे थे..क़ानू!क़ानू! पर कुछ नहीं पता लग रहा था,बारिश और भी तेज़ हो गयी थी।

हम पूरी तरह से क़ानू! क़ानू! करते हुए घबराए हुए ख़ड़े थे। तभी सामने के घर से चौकीदार भइया भागे-भागे आये और हमे क़ानू को यूँ आवाज़ लगता देखकर कहने लगे कि,”भाभी हमनें पहले आपकी वो नई वाली डॉगी है न टुक-टुक उसको गेट से निकलते भागते हुए देखा था,उसी के पीछे क़ानू भी निकलकर भागी थी, पीछे वाली लाइन में हमनें दोनों को जाते हुए देखा है”। बस, फ़िर क्या था,चौकीदार भइया की कही हुई बात पर हम उस तूफ़ानी बारिश में क़ानू! क़ानू! करते तेज़ी से पीछे वाली लाइन में भागे थे । पीछे वाली लाइन में एक मकान बिल्कुल ख़ाली पड़ा हुआ था,उसी मकान के पास जाकर हम क़ानू! क़ानू! चिल्लाने लगे थे,कि हमें टुक-टुक की भौंकने की आवाज़ आयी,पीछे मुड़कर जब हमनें देखा तो टुक-टुक और क़ानू आराम से बैठकर उस खाली मकान के बरामदे खेल रहीं थीं।

क़ानू ने हमें देख कर खुशी से अपनी फ्लॉवर जैसी पूँछ हिलाकर अपनी जीभ साइड में लटकाकर कहा था,”हम तो इधर ही खेलने आ गए थे,टुक-टुक के साथ माँ!, आप तो बेकार ही परेशान हो रहीं थीं”। हमनें अपनी क़ानू और टुक-टुक को गले से लगा लिया था..और अपने -आप से वादा किया था,कि कुछ भी हो जाये लेकिन मैन गेट पर हमेशा लॉक रखेंगें और ताला चाबी भी हमारे पास ही रहेगा। जब भी किसी को बाहर जाना होगा तो हम ही लॉक खोलेंगे और बन्द भी करेंगें।

खैर! क़ानू का पट्टा तो हम अपने हाथ में लेकर ही भागे थे,इसलिए हमनें क़ानू को उसके चैन और पट्टे से बाँधा और प्यारी टुक-टुक को गोद में उठाकर घर ले आये थे।
बारिशों के सुहाने मौसम का आनन्द लेते एक बार हमारी और हमारे परिवार की ज़िंदगी फ़िर चल पड़ी थी, क़ानू और टुक-टुक के साथ।