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Kaanu weds Jerry

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शरद ऋतु का आगमन हो चुका है, और अब तो पहले से थोड़ी सी सर्दी भी बढ़ गई है। सर्दी के मौसम में अक्सर हम सब अन्दर कमरे में न बैठ कर बाहर ही अपनी छत्त पर धूप का आनंद लेते रहते हैं। बच्चे भी वहीं अपनी पढ़ाई- लिखाई करते रहते हैं… और हम भी धूप में ही अपनी सब्ज़ियों को काटने छीलने का काम जारी रखते हैं। पहले क्या होता था, कि बच्चे और हम अकेले ही पूरी सर्दियाँ धूप में बिता दिया करते थे। बच्चे चुप-चाप अपने कामों में  यानी के पढ़ाई-लिखाई से लगे रहते थे… और हम अपनी निजी धुन में ही रहा करते थे। जब से हमारे आँगन में हमारी प्यारी कानू के कदम पड़े हैं, सच! मानिए घर के आँगन में तो रोज़ ही दीवाली जैसी रौनक हो आयी है। सारा दिन हमारे साथ ही छत्त पर उछलना कूदना और भौंकना… कभी चूहे को चैन न लेने देना तो कभी तितली रानी के ही पीछे पड़े रहना.. फूलों में बैठी तितली से अक्सर यह कहना,” क्यों आती हो हमारे आँगन में, मेरे फूलों को ख़राब करने, जाओ कोई और बागीचा ढूँढ़ो”।

सच! कानू के चेहरे के प्यार और आकर्षण से सारे घर के सदस्यों का मूड ही बदल जाता है। एक पल के लिए हम सब अपनी निजी जिंदगी की उलझनों को भूल कानू की दुनिया में प्रवेश कर जाते हैं। और कानू भी अपनी ज़बानी यानी के भोंक-भोंक कर, कभी अपनी फ्लॉवर जैसी पूँछ हिलाकर, तो कभी अपनी पिंक कलर की जीभ साइड में लटकाकर अपने सारे दिन की दास्तान सुनाया करती है… कि आज कानू-मानू ने तितली से क्या कहा… उसको कैसे डाँट कर भगाया या फ़िर चूहे को पकड़ने में कैसे कामयाब हो गई… और बेचारे को मार ही डाला।

बस! ऐसे ही हमारा कानू के साथ रौनक मेला लगा रहता है। अब हुआ यूँ कि एक दिन हम सब छत्त पर बैठकर मूंगफलियों का आनन्द ले रहे थे… और हमारी प्यारी सुन्दर सी कानू वही कूद-फाँद में लगी हुई थी.. शैतानी करती रहती और दौड़कर आती और हमसे मूँगफली का दाना मुहँ में दबाकर ले जाती, फिर से वही भोंकना और शैतानी शुरू हो जाती।

हमारे ब्च्चे वहीं बैठ कानू की शैतानियों को गौर से देख रहे थे.. तभी हमारी बिटिया बोल पड़ी थी,” माँ याद है, कुछ आपको कि हम बचपन में गुड्डे गुड़िया का खेल खेला करते थे, और उनका ब्याह भी रचाया करते थे”।

हम अभी अपनी मटर को छीलने में वयस्त थे..  और कानू भी हमारे ऊपर अपने दोनों हाथ लगाए हमेशा की तरह मटर खाने के लालच में खड़ी थी। पर छीलते-छीलते हम बोल ही पड़े थे,” हाँ! भई! रचाते थे, गुड्डे और गुड़िया का ब्याह”।

बस! हमारा मूड देखकर बच्चे अब हमारे पीछे ही पड़ गए थे,” इस बार भी हमें शादी करनी है”।

हमनें भी कह डाला था,” हाँ! देख लो कहाँ पड़ी हैं, तुम्हारी पुरानी गुड़िया..  और रचा लो ब्याह! हमें क्या करना है”।

बच्चे बोल पडे थे,” नहीं, नहीं, गुड़िया का ब्याह नहीं, कानू की शादी-शादी खेलेगें”।

“क्या!” हमनें कहा था,” दिमाग़ ख़राब तो न हो गया है, आख़िर कुत्ता है, ये”।

क्या बतायें जब भी हम कानू को कुत्ता बोल जाते हैं, पछताते बहुत हैं। पर करते भी क्या! अब ये बच्चे तो हमारी प्यारी सी परी कानू के ब्याह रचाने के पीछे ही बुरी तरह से पड़ गए थे। हमनें भी सोचा, चलो! कोई बात नहीं बच्चे तो बच्चे ही हैं.. आख़िर कहाँ से लाएँगे कानू रानी के लिए दूल्हा! .. यही सोचकर कि कानू के साथ घर पर ही कोई निराला खेल करने की सूझी होगी.. सो! पीछे पड़ गए हैं, ज़बरदस्ती।

“चलो! बच्चों संग अपनी लाड़ली कानू के ब्याह के हम भी मज़े ले लेते है”। और हमनें बच्चों को खुले मन से हँसते हुए कहा था,” ठीक है, भई! बच्चों कर लो हमारी कानू-मानू का ब्याह पर हमें न्योता देना मत भूलना.. अपनी कानू रानी के ब्याह की मिठाई खाने हम भी आएँगे”।

बस! इतना कह हम तो यह बात भूल ही गए थे… कानू को लेकर हमारा रोज़ का रूटीन चालू हो गया था। एक दिन की बात है, हम अपनी कानू को शाम के टाइम बाहर घुमा रहे थे, कि अचानक हमारी मुलाकात हमारी ही पड़ोस की सहेली ऊषा जी से हो गई… ऊषा जी के पास भी हमारे ही जैसा pomerian डॉग है, उन्होनें उसका नाम जैरी रखा हुआ है।

अब हुआ यूँ जैसे ही हमारा और उनका मुहँ से मुहँ टकराया था, ऊषा जी फटाक से बोल पडीं थीं,” और! क्या हाल-चाल है, समधन जी”।

“समधन जी!”  “क्या! क्या! कहा आपने, हम तो हैरान ही रह गए हैं”। वाकई हैरान होने वाली तो बात ही थी.. आख़िर हमारे तो बच्चे अभी छोटे हैं… हमनें दोहराया था,” मज़ाक करने के मूड में निकलीं हैं… क्या आज आप बाहर, और हमीं मिले हैं, क्या आपको”।

ऊषा जी ज़ोर से हँसी थीं, और कहने लगीं थीं,” अरे! आप के घर से ही तो आपकी कानू का हमारे जैरी के लिए रिश्ता आया था”।

“क्या!” हमारा मुहँ एकदम फटा का फटा रह गया, और हमारी नज़र हमारे साइड में खेलती हुई हमारी प्यारी और कोमल सी रानी बेटी कानू पर जा पड़ी थी।

ऊषा जी  हमें एक बात देकर और हमें वहीं पर खड़ा छोड़कर अपने काम से निकल गयीं थीं। हम भी अपनी कानू-मानू को लेकर घर आ गए थे।

घर आते ही हमनें तो शोर मचा दिया था,” क्यों भई! बच्चों क्या कह रहीं थीं, ऊषा आँटी.. क्या फ़ालतू की बात करने गए थे, आँटी के यहाँ”।

“हाँ! न मम्मी मना मत करना हम जैरी और कानू का ब्याह रचाना चाहते हैं। आप भी प्लीज मान जाओ”।

और पतिदेव का घर में आना हुआ था, उन्होंने हमारी बात सुन ली थी। कहने लगे,” हाँ! हाँ! करलो तैयारी कानू के ब्याह की.. भई! जैरी हमें भी बहुत पसन्द है, गुड चॉइस”।

हमसे कहने लगे,” अरे! यार! तुम भी थोड़ा एन्जॉय कर लेना और बच्चों की मदद कर देना… आख़िर ब्याह है, भई! तुम्हारी बिटिया कानू का”।

हमें अपने पतिदेव की बातें सुन कर थोड़ा कानू के ब्याह में इंटेरेस्ट आ गया था, और सोचा था, चलो करते हैं… अपनी लाड़ो कानू का ब्याह।

“ हमें भी अपना दामाद जैरी पसन्द है। कानू जैसा ही स्वीट लगता है”। हमनें बच्चों से कहा था।

“ लेट्स गेट स्टारटेड” और हमारी फूल सी बिटिया कानू के विवाह की तैयारियाँ हमनें और बच्चों ने मिलकर शुरू कर दी थीं।

हम सबने मिलकर दिमाग़ लगाया था.. विवाह कहाँ और कैसे होगा। बस! तो भई! प्लानिंग फाइनल हो गयी थी.. “ “ “ विवाह का इंतेज़ाम अपनी छत्त पर ही करेंगें, आप उस दिन टेस्टी खाना बना लेना..  ऊषा आँटी लोग जैरी के साथ लड़के वालों की तरह से आएँगे, इसलिए थोड़ा ज़्यादा ही बनना। बारातियों का स्वागत पूरे मन से करेंगें, आख़िर हमारी इकलौती कानू का ब्याह जो होने जा रहा है” ।

“ हाँ! हमनें अपनी मुंडी हिला दी थी।

अब सबनें अपना-अपना दिमाग़ लगाया था, कानू को ब्याह वाले दिन पहनाएंगे क्या! “  हाँ! याद आया आपकी वो सुन्दर सी राजस्थानी चुनरी पड़ी है न, उसी का क़ानू के लिए लहँगा चुन्नी बनायेंगे, आप प्लीज मना मत करना”। बच्चों ने हमसे बड़े ही प्यार से रिक्वेस्ट की थी।

अब तो हमारा भी मन वाकई अपनी कानू रानी का विवाह करने का हो आया था, सो हमनें बच्चों को हँसकर और पूरे मन से कहा था,” अरे! हाँ! हाँ! चिन्ता करने की कोई भी ज़रूरत नहीं है, अपनी प्यारी और सबसे न्यारी कानू की शादी की ड्रेस अपने हाथों से मशीन पर सिल कर देंगें, आख़िर माँ हैं, हम कानू की”।

अब तो विवाह की तैयारी ने ज़ोर पकड़ लिया था। बच्चों ने मिलकर सारी छत्त पर रखे गमले एक तरफ़ कर दिये थे, अब बहुत सारी जगह हो गई थी। कानू भी गमले सारे एक कोने में रखे देख बहुत ही खुश हो गई थी, अब कानू-मानू को खेलने के लिये बहुत सारी जगह जो मिलने वाली थी। कानू ने छत्त को खाली देख अपनी खुशी का इज़हार हमेशा की तरह अपनी फ्लॉवर जैसी पूँछ हिलाकर और अपनी पिंक कलर की जीभ साइड में लटकाकर किया था।

हमनें भी कानू के लिये छोटा सा स्कर्ट जैसा चुन्नी में से लहँगा सिल डाला था, और एक छोटी सी चुनरी भी शीशे वगरैह लगाकर सिल दी थी। “ चलो! अब ड्रेस तो तैयार हो गई थी। अरे! कानू को गहने कौन से पहनायेंगे”।

गहनों वाली बात पर बच्चों ने कहा था,” कानू का गले से पट्टा तो उतार नहीं सकेंगें, नहीं तो जैरी के साथ बजाए शादी के हंगामा खड़ा कर देगी, चैन और पट्टा तो सेफ्टी के लिये ज़रूरी है। हाँ! पट्टे के ऊपर ही एक मोतियों वाली माला हमारे पास रखी है, कलर भी एकदम सुन्दर है.. रेड!  खिलेगा प्यारी कानू पर”।

“चलो! भई! All done”। ब्याह की सभी तैयारियाँ हो चुकीं थीं, खाने से लेकर कपड़ों तक, और बारातियों की लिस्ट भी तैयार हो गई थी, कि जैरी के घर से कौन-कौन आएगा। हाँ! एक दो पड़ोसियों को भी हमनें न्योता दे ही दिया था, ,जो कुत्ता पालते हैं, पर उन्हें अपने कुत्तों के बग़ैर ही आना था, जानवरों को इकट्ठा करने का कोई फ़ायदा न था, बेकार का तमाशा हो जाता… अब एक दो पड़ोसी तो बुलाने ही थे, आख़िर हम ब्याह रचा रहे थे, अपनी लाड़ली बिटिया कानू का.. कोई मज़ाक थोड़े ही था।

कानू के विवाह का दिन आ गया था, पूरी छत्त को बच्चों ने जो दीवाली की लाइट रखीं थीं, उन से सजा दिया था, और तो और छत्त के एक कोने में मेहमानों के भोजन वयवस्था के लिए मेज को चारों तरफ़ से फूलों की माला से लपेट कर आकर्षित कर दिया था। एक छोटा सा फूलों की मालाओं और लाइट से सजा हुआ” Jerry weds kaanu” लिखकर मंडप भी बच्चों ने मिलकर तैयार कर दिया था। वाकई! में हमारे बच्चों ने अपनी प्यारी गुड़िया जैसी बहन की शादी की तैयारी में बहुत मेहनत की थी। अब है, तो कानू कुत्ता ही, पर हम उसे कुत्ता न मानकर अपनी बिटिया ही मानते हैं, चाहे कोई जो भी कह ले… हमें बिल्कुल फर्क न पड़ता है। उसी हिसाब से क़ानू हमारे बच्चों की बहन हुई न।

आज ही शाम को घर में शादी की पार्टी थी। सुबह उठते ही हमनें दुल्हन कानू को नहला धुला कर तैयार कर दिया था। कानू धूप में सूखने के बाद रुई की तरह से फूलकर और भी सुन्दर लग रही थी। सफ़ेद ऊन के गोले पर काली गुलाब-जामुन जैसी नाक चार चाँद लगा रही थी। और क़ानू दुल्हन की फ्लॉवर जैसी पूँछ की तो बात ही अलग थी।

अब आख़िर में हमनें कानू को उसका छोटा सा लहँगा उसकी नाज़ुक सी कमर में कसकर पहना दिया था। और चुनरी भी घुँघरू वाले पट्टे और मोतियों की माला के बीच से निकालकर गले में इस तरह से लटका दी थी, कि वो कानू के  पैरो में न उलझे। अब तो कानू एकदम स्वीट लिटिल ब्राइड नज़र आ रही थी।बच्चे तो कानू को देखते ही खुश हो गए थे, और खुशी के मारे कई सारे पिक्चर्स भी कानू के कैमरे में कैद कर लिये थे।

बच्चों ने कानू के माथे पर एक लाल रंग की बिंदी भी लगा दी थी, अब तो दुल्हन कानू  को देखते ही रहें ऐसा मन हो रहा था, एकदम स्वीट लिटिल वाइट ब्राइड लग रही थी, हमारी प्यारी कानू-मानू।

शाम का वक्त हो आया था, हमारी पूरी छत्त  लाइट और सजावट से जगमगा रही थी। हम और बच्चे कानू को ऊपर कमरे में चैन और पट्टे से बाँधकर बारातियों के स्वागत के लिये तैयार हो कर अपने घर के गेट पर हाथों में मालाएं लेकर खड़े हो गए थे।

“ लो! आ गई, बारात!” बच्चों ने शोर मचाया था।

“ अरे! हाँ!” हमनें सामने देखा था, सामने से ऊषा जी और उनके घर के सभी सदस्य और एक दो हमारे पड़ोसी दोस्त जिनको हमनें न्योता दिया था, जैरी को लेकर आ रहे थे। बाजे का साउंड लाने के लिये गाजे-बाजे का टेप चला रखा था। म्यूजिक खूब ऊँचा बजाते हुए आ रहे थे, सब लोग। जैरी भी अपने रेड कलर के पट्टे और T-shirt में बहुत प्यारा लग रहा था। जैरी म्यूज़िक पर भौंकने की बजाए अपनी पूँछ हिलाता हुआ चल रहा था, और खुश था। ऊषा जी के हाथ में ही जैरी का पट्टा था।

बाराती अब गेट पर आ पहुँचे थे। हमनें ऊषा जी उनके पतिदेव और जैरी के गले में फूलों की माला पहना दी थी। और सभी को सीढ़ियों से जिन्हें भी हमनें फूलों से पूरा सजा रखा था, ऊपर ले कर आ गए थे। जैरी तो लाइट देखकर खुश हो गया था, और छत्त पर इधर-उधर भाग रहा था। कानू को पता लग चुका था, कि उसकी छत्त पर कोई और कुत्ता आ गया है, बस! कानू ने भोंक-भोंक कर नाक में दम कर दिया था। ऊषा जी और पड़ोसी मित्रों ने कानू को बाहर लाने को कहा था.. और हमनें बच्चों को  कानू को लाने का इशारा किया था।

बच्चे अंदर से तैयार कानू को उसके चैन और पट्टे सहित बाहर छत्त पर ले आए थे। एक बात हम देखकर हैरान थे, कि कानू भोंक क्यों नहीं रही, अभी तक तो चुप होने का नाम न ले रही थी। हमनें अपनी बिटिया को कानू के न भौंकने के बारे में कोने में ले जाकर पूछा तो उसनें हमें बताया था कि,” माँ हमनें कानू को थोड़ी सी बेहोशी की दवा सुंघा दी थी, नहीं तो यहाँ जैरी के साथ हंगामा खड़ा हो जाता”। अच्छा! अब हम समझे थे, कि प्यारी कानू का भौंकना क्यों बन्द हो गया है।

“चलो! ठीक ही है, बेहोशी की हालत में ठीक से काम हो जाएगा”। हमनें सोचा था। कानू को देखकर ऊषा जी बोल ही पडीं थीं,” कितनी प्यारी लग रही है, हमारी दुल्हन कानू.. कहीं नज़र न लग जाए”।

बच्चों में से ही एक बच्चा पंडित बना हुआ था। सबके आपस में मिलने चाय वगरैह के बाद पण्डित बने बच्चे ने कहा था,” दूल्हे दुल्हन को फेरों और वर माला के लिये बुलाया जाय”।

हम अपनी कानू को चैन और पट्टे के साथ ले आये थे, और ऊषा जी ने भी जैरी को खेलते-खेलते पकड़ लिया था। जैरी ज़्यादा भौंकने वाला कुत्ता नहीं है, शान्त खेलता कूदता रहता है।

कानू और जैरी के गुड्डे गुड़िया की तरह से हमनें फेरे करवाए और दोनों को एक-एक छोटी-छोटी फूलों की माला पहना विवाह सम्पन्न किया था। सबनें तालियाँ बजाकर फूलों की पंखुड़ियाँ कानू और जैरी पर डालीं। कानू को बेहोशी की दवा का पूरा असर हो चुका था, इसलिये हमनें कानू का चैन और पट्टा खोलकर उसे उसके बिस्तर पर सुला दिया था।

बच्चों ने अपने-अपने मोबाइल फोन पर विवाह की वीडियो रील भी बना डाली थी। हमने, ऊषा जी के परिवार और पड़ोसी मित्रों ने हँसकर खूब चर्चा की,” भई! शादी हों तो ऐसी, मज़ा आ गया, वाह!”।

विवाह सम्पन्न होने के पश्चात हमनें सबनें मिलकर छोले-भठूरे और गुलाब जामुन का आनंद लिया था, जो हमनें बड़े ही प्यार से क़ानू बिटिया के ब्याह के लिए अपने हाथों से बनाये थे।

विवाह सम्पन्न होने के बाद हमनें अपने दामाद जैरी जी को एक नया काले रंग का पट्टा उपहार में दिया,और जिन मित्रों के पास कुत्ते थे, उन सब कुत्तों को भी शगुन के तौर पर एक-एक पट्टा उपहार उनके घर वालों के हाथ भेजा था।

ऊषा जी का कहना था,”हमारी दुल्हन कानू का ख़याल रखना, आज तो उसकी तबियत ठीक न है, पर कल हम लेने ज़रुर आएँगे”। और सब ज़ोर से हँस पड़े थे।

हाँ! हम तो बताना ही भूल गए हैं, कि ऊषा जी भी क़ानू के लिये नीले और सफ़ेद रंग की माला उपहार में लाईं थीं।

ऐसे ही ढ़ोल मंजीरे  बजाते, नाचते- गाते और खुशियाँ मनाते हम सब की ज़िंदगी एक बार फ़िर से चल पड़ी थी, शहनाई की धुन पर क़ानू की डोली के साथ।