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क़ानू की चोट


‌कुत्ते पालने का हमें बिल्कुल शौक न था। बचपन से घर-खानदान में किसी ने कभी भी कोई कुत्ता न पाला था। कुत्ते देखते ही बुरी तरह चिल्ला कर डर जाया करते थे, और फालतू का शोर मचाने लग जाया करते। और कोई दूसरा भी कुत्ता पाला करता, वो भी हमें बेहद अजीब लगा करता था…हम अक्सर सोचा करते थे, की,”अरे !,पता नहीं कैसे कुत्ता पाल लेते हैं, दुनिया भर की गंद करता होगा घर मे। नहलाओ, खिलाओ, घुमाओ अजीब ही झंझट है, इन जानवरों का। पर मैने कभी ये न सोचा था, की वो ऊपर बैठा यानी कि परमात्मा मेरी सब बात सुन रहा है। वो कहते हैं, न कि कुछ भी कर लीजिये पर चलती उसी की है। परमात्मा ने मेरी कुत्ते को लेकर अपने-आप से की हुई सारी बात सुनी और कहा,”बहुत बोलती है, अब देखना, तू किस तरह से कुत्ता पालती है, और उसे अपने रिश्तों के तार से कैसे जोड़ती है। मैं तेरी गोद में ऐसा खिलौना डालूँगा जिसके बगैर तेरा एक पल भी न बीतेगा, और तू उस खिलौने को अपने रिश्तों रूपी माला का एक अनमोल मोती बना लेगी”।
‌बस!,फिर क्या था, परमात्मा ने तथास्तु कर क़ानू को हमारी गोद में डाल दिया, और हमारी  कुत्ते शब्द की परिभाषा को ही बदल डाला। अब देखिए क़ानू आज हमारे परिवार का एक महत्वपूर्ण और प्यारा सा सदस्य बन गई  है। खैर!ऐसा भी न है, बाहर बैठे गली के कुत्तों को अक्सर हम भी रोटी डाल दिया करते थे, पर लगाव तो हमें सिर्फ अपनी क़ानू से ही हुआ है।
‌अब क़ानू हिसाब से ज़्यादा शैतान तो बचपन से ही है, दौड़ती तो इतना तेज़ है,कि अगर चैन पट्टा न बाँध रखा हो तो पकड़ पाना मुश्किल काम है। जब हमारी क़ानू छोटी थी, तो हम क़ानू को घुमाने बाहर न ले जाया करते थे, क्योंकि बाहर देसी कुत्ते बैठे रहते थे, और हमें हमेशा यही डर लग रहता था कि कहीं झपट्टा न मार दें। खैर!अब तो हमारी क़ानू बड़ी हो गई है,दिमाग़ की तेज़ तो बचपन से ही है।
‌शाम होते ही करीब चार बजे क़ानू को पता लग जाता है,कि घूमनें का टाइम हो गया है, बस!हमारे पीछे बुरी तरह से पड़ जाती है, क़ानू का कहना होता है,”चलो न मम्मी नीचे चलते है”। हमारी भी क़ानू के साथ सैर हो जाती है, इसलिए हम भी क़ानू का चैन और पट्टा लिए नीचे की तरफ़ चल पड़ते हैं। अरे! हाँ एक बात तो हम बताना भूल ही गए कि हमारे ही घर में क़ानू की एक सहेली और भी है। हमारा परिवार संयुक्त परिवार है,सब लोग मिलजुल कर एक ही मकान में रहते हैं,एक ही एरिया में सभी परिवार के सदस्यों के अलग-अलग पोर्शन हैं। हाँ!तो में क़ानू की सहेली की बात कर रही थी, हमारे जेठ ने भी एक कुत्ती पाली हुई है, जो देखने में क़ानू जितनी सुन्दर तो न है, पर ठीक ही है…काले और एकदम ब्राउन कलर की। सभी लोग मेरे जेठ से अक्सर उनकी कुत्ती के बारे में पूछते रहते हैं, जिसका नाम ब्रांडी रखा हुआ है, उन लोगों ने,”अरे! भई ये देसी कुत्ता क्यों पाल रखा है, आप लोगों ने”। पर हमनें कभी भी ब्रांडी को देसी कुत्ता न बोला है, क्योंकि जब से हमनें क़ानू को पाला है, हमें सभी कुत्ते बहुत प्यारे लगने लगे हैं। क्या बतायें कुत्ता जानवर होता ही ऐसा है,  चाहे, ब्रीड वाला डॉग हो या फ़िर कुत्ते की जात देसी हो लगते दोनों ही प्यारे हैं। कुत्ते से ज़्यादा वफादार और आपको प्यार करने वाला जानवर कोई और न मिलेगा। अपने आप से ज़्यादा प्यार ये अपने मालिक से करते हैं। कुत्ता अपने मालिक के आगे अपनी पूँछ रोटी दूध के लिए नहीं हिलाता बल्कि अपना सच्चा प्यार और दोस्ती जताने के लिए वह अपनी पूँछ हिलाता है। कुत्ता अपनी पूँछ हिलाकर ही अपना प्यार और अपनी दोस्ती का अहसास अपने मालिक को कराता है। मैं आप सभी मित्रों से यह सब बातें इसलिए कर पा रही हूँ, क्योंकि ये मेरा खुद का  निजी अनुभव है। मेरी क़ानू ने मुझे इतना प्यार और अपनापन दिया है, जिसको बयाँ करने के लिए मेरे पास पर्याप्त शब्द नहीं हैं। क़ानू से ही मुझे दोस्ती की सही परिभाषा का पता चला है।
‌हाँ! ब्रांडी जो है, वो क़ानू जितनी सुन्दर न है, यह तो मैं आप सभी मित्रों को बता ही चुकी हूँ,बच्चे तो अक्सर कहते हैं,”मम्मी क़ानू हमारी अंग्रज़ी मेम है, और ब्रांडी तो क़ानू जैसी गोरी और सुन्दर न है”। बच्चों ने कहा था, “मम्मी याद है, आपको आमिर ख़ान की एक फ़िल्म आयी थी..लगान उसमें जो गोरी मेम थी, वो हमारी क़ानू है, और जो हिंदुस्तानी लड़की हीरोइन का रोल कर रही थी वो ये ब्रांडी है। ठीक कहा न”। कहकर बच्चे ज़ोर से हँस पड़े थे,और हमें भी इस प्यारे मज़ाक पर हँसी आ गई थी। क़ानू को भी अपनी सुन्दरता पर घमण्ड हो ही गया  है, महारानी जो बनके चलती हैं, ब्रांडी के आगे। हमारी छत्त और हमारे जेठ की छत्त में ज़्यादा दूरी न है, साफ़-साफ़ दिखाई पड़ता है, एक दूसरे की छत्तों का। हमारी क़ानू जब अपनी छत्त पर खेल-कूद कर रही होती है, तो ब्रांडी अक्सर अपनी छत्त पर ठीक उसी समय आ जाती है, और गोर से अपने पैर दीवार पर रख अपने आप को ऊँचा कर क़ानू को ही घूरती रहती है। वैसे काफी इम्प्रेस हो गई है, ब्रांडी  हमारी क़ानू की सुन्दरता से। कभी-कभी हमें ऐसा लगने लगता है, थोड़ी जेलस भी है, ब्रांडी हमारी क़ानू से…अरे!भई, क्यों न हो मेरा काना है ही इतना प्यारा।
‌खैर!जब भी हम क़ानू को घुमाने जा रहे होते हैं, ब्रांडी तुरंत अपनी जाली वाला गेट ज़ोर से पीटकर दौड़कर क़ानू के पास आ जाती है। और क़ानू पर झपट्टा मारती है, ब्रांडी क़ानू पर झपट्टा क़ानू को काटने के लिए नहीं बल्कि क़ानू को अपने साथ खेलने के लिए आमंत्रित करती है, ब्रांडी का क़ानू से कहना होता है,”आ जाओ क़ानू, खेलेगें”। पर क़ानू हमारी कम न है, ब्रांडी को देखते ही नाक मुहँ सकोड लेती है, और ज़ोर-ज़ोर से भौंकने लग जाती है,क़ानू का कहना होता है,”नहीं खेलूँगी तेरे साथ, बता क्या कर लेगी,”। क़ानू के ऐसी एटीट्यूड को देख ब्रांडी थोड़ा चिढ़ जाती है, और क़ानू से कहती है,”देख लूँगी तुझे, क्या समझती है, अपने आप को,बड़ी आई होगी सुन्दर मैं भी कोई सुन्दर कम न हूँ”। खैर!जैसे तैसे हम क़ानू का पीछा  ब्रांडी से छुड़ाकर क़ानू को गेट से बाहर घुमाने ले जाते है, बाहर सडक़ के किनारे गली के कुत्ते बैठे रहते हैं, क़ानू बिल्कुल कम न पड़ती है, ज़बरदस्ती पट्टे को खींच और ज़ोर लगाकर उन कुत्तों की तरफ पंगा लेने भागती है। हमें सड़क पर बहुत ज़्यादा ध्यान से और चैन और पट्टे को टाईट पकड़कर चलना पड़ता है, क़ानू के साथ…अब डर तो लगता ही है, की कहीं ज़ोर ज़बरदस्ती में हाथ से चैन और पट्टा छूट गया तो क़ानू जी की सारी पहलवानी धरी की धरी रह जाएगी। एक ही झटके में ये गली के कुत्ते काम लगा देंगे क़ानू का, नाज़ुक और सॉफ्ट सी ही तो है, हमारी क़ानू..शेर तो फालतू में ही बनती है। शरीर से कोमल और मेरी क़ानू दिमाग से बहादुर है, एकदम शेर जैसी है।
‌हाँ! तो हुआ यूँ की एक दिन क़ानू नहाई धोयी बहुत ही प्यारी लग रही थी , नहाने के बाद जब क़ानू  सूख जाती है, है तो फुला हुआ सा स्टफ टॉय दिखती है, एकदम सफेद!सुन्दर पेपर कटिंग जैसे कान और गुलाब-जामुन जैसी नाक तो है, ही। अब शाम होते ही हम क़ानू को नीचे घुमाने लेकर जाने लगे थे, पर उस दिन हमनें क़ानू के गले में चैन और पट्टा न बाँधकर हाथ में ले रखा था…सोच रहे थे कि नीचे उतरते ही झट्ट से गले में बाँध देंगें, पर जैसे ही हम नीचे उतरे नज़ारा एकदम बदल सा गया था…ब्रांडी को हमेशा की तरह पता चल गया था, कि क़ानू दीदी नीचे घूमने के लिए आ गयीं हैं, पता क्यों न चलता आखिर क़ानू के साबुन व शैम्पू की खुशबू  ब्रांडी की नाक तक जो पहुँच गयी थी। सीढ़ियों से नीचे उछल-उछल कर उतरती हुई क़ानू एकदम मिठाई  का पीस लग रही थी, मन हो रहा था, की एक कट्टी तो मार ही ली जाये मिठाई के पीस पर। बिल्कुल ऐसा ही कुछ ब्रांडी के दिमाग़ में भी चल रहा था, कि रसगुल्ले का पीस नीचे उतरकर आ रहा है, इसी ताक में ब्रांडी दीवार के साथ छुपी बैठी थी। जैसे ही क़ानू का नीचे गेट की तरफ भागना हुआ, बिल्कुल उसी टाइम बिना कोई वार्निंग दिए ब्रांडी ने क़ानू पर झपट्टा मार क़ानू की पीठ पर एक चब्बा मार दिया, दाँत  गाढ़कर क़ानू को काटा तो नहीं ..बस!युहीं मस्ती के मूड में आकर क़ानू की नरमाई के मज़े लेने के लिए क़ानू की पीठ पर मुहँ भर लिया था। हम एकदम तेज़ी से दौड़े और चिल्लाकर ब्रांडी को हटाया और एक हल्का सा थप्पड भी लगा दिया था,कहीं क़ानू हमसे बाद में ये न कहे कि ,”क्या मम्मी आपने इस ब्रांडी की बच्ची की पिटाई नहीं की ,देखो! न कितनी ज़ोर से चब्बा मारा है”। क़ानू गुस्से में आकर दोबारा से ब्रांडी की ओर झपटी थी, दोनों में बुरी तरह से झगड़ा होने ही वाला था,कि हमनें फटाक से लॉन में से एक बड़ी सी  सूखी छड़ी उठायी और बस! बीच बचाव कर डाला। हमारे हाथ में सूखी बड़ी सी लकड़ी देख क़ानू डर के मारे  गेट से बाहर की तरफ भागी उस के दिमाग़ में यह डर बैठ गया था, कि दीदी पिटे न पिटे पर मेरी पिटाई हो सकती है। गेट से बाहर क़ानू काफ़ी दूर तक निकल गई थी, और हम हाथ में चैन और पट्टा लिए आवाज़ ही लगाए जा रहे थे,”क़ानू!क़ानू!”। पर क़ानू तेज़ी से आगे की तरफ़ भागी जा रही थी, अब तो हमनें भी दौड़ना शुरू कर दिया था, हमें बस एक ही डर सताये जा रहा था,कि क़ानू किसी गली के कुत्ते के साथ न उलझ बैठे। जिसका डर था वोही हुआ,सडक़ के किनारे एक देसी यानी के गली का कुत्ता आराम से सो रहा था, पर नहीं क़ानू को तो पंगा लेना ज़रूरी हो गया था। क़ानू ने बुरी तरह से उस कुत्ते पर अपना रौब जमाने के लिए झपट्टा मारा, पहले तो वो कुत्ता क़ानू को कुछ न बोला …अरे!पर ये काना-माना तो पूरा ही जोश में आ गया था,वहीं ख़ड़े हो ज़ोर-ज़ोर से कुत्ते को देख भौंकने लगी थी। अब तो उस कुत्ते को इतना गुस्सा आया ,मानो कह रहा हो,”ठहर! समझती क्या है!अपने आप को, होगी कहीं की शहज़ादी  आज तुझे न छोडूंगा!! हर रोज़ इसी टाइम आकर दिमाग़ ख़राब करती है,ठहर!’। और इस कुत्ते ने आँव देखा न तांव और मेरी प्यारी सी क़ानू के पैर पर अपने दाँत गाढ़ दिए। हम भी वहाँ तेज़ी से  दौड़ते हुए पहुँच ही गये थे, क़ानू को हमनें चैन और पट्टा पहनाया और सड़क पर से पत्थर उठा कर तीन चार उस कुत्ते में दे मारे। अब अपने बच्चे को चोट लग जाये तो गुस्सा तो आता ही है, हालाँकि गलती तो क़ानू की ही थी। क्या ज़रूरत थी होशियार बनने की, फालतू में पिटवा दिया बेचारे कुत्ते को।
‌घर लौटना मुश्किल हो रहा था, क़ानू का ..हाथ में कुछ ज़्यादा ही ज़ोर से दाँत जो गाढ़ दिए थे, उस गन्दे से डॉगी ने। खैर!धीरे-धीरे घर तक चला कर लाये थे, हम अपनी क़ानू को।बड़े प्यार से आहिस्ता-आहिस्ता सीढ़ियों पर से ऊपर हमनें क़ानू को चढ़ाया था, दो-दो चोट जो लगीं थीं क़ानू-मानी को। ब्रांडी दीदी ने भी तो पीठ पर चब्बा मारा था। ऊपर आते ही छोटे बच्चे की तरह क़ानू ने अपना हाथ ऊपर कर अपने दीदी भईया को अपनी चोट बारे में अपना मुहँ खोल लम्बी साँस भर-भर बताया था। बच्चों ने भी क़ानू का कोमल सा हाथ अपने हाथ में ले कर क़ानू की चोट को गोर से देखकर हमसे कहा था,”क्या कर रहीं थीं, आप रोका क्यों नहीं आपने इसको उस कुत्ते के पास जाने से”। हमनें बच्चों को ब्रांडी और उस कुत्ते की घटना विस्तार से बताई थी,हमारी पूरी बात सुनकर बच्चों ने क़ानू को प्यार से कहा था,”क्यों पंगे लेती हो, आइन्दा बिना चैन और  पट्टे के बाहर जाने की ज़रूरत नहीं है”। और क़ानू की पीठ और प्यारे से  हाथ पर दवा लगाते हुए हमसे कहा था,,”कुछ भी हो, बिना चैन और पट्टे के इसे आप बाहर नहीं लेकर जाओगी, और ब्रांडी को अन्दर ही रखा करें, जब इसके घूमने का टाइम होता है, फालतू में काट जाएगी..हम ताईजी से कह देंगें”।
‌बच्चों के हाथ से क़ानू को मलहम लगवाना और उसकी पीठ पर लगी हुई हल्की सी चोट को प्यार करना क़ानू को अच्छा लग रहा था। अपनी पिंक कलर की जीभ थोड़ी सी साइड में लटका और अपनी गर्दन को टेढ़ा कर क़ानू अपने दीदी भईया से कह रही थी,”सॉरी!भईया!,सॉरी! दीदी अब ध्यान से खेलने जाया करेंगें, कभी न उलझेंगे फालतू में किसी के साथ। और इस ब्रांडी की बच्ची की तरफ तो देखेंगे भी नहीं”। क़ानू के प्रति बच्चों का प्यार  और लगाव देख हमें भी बहुत अच्छा लगा था।एक बार फिर क़ानू की चोटों पर मलहम लगाते और प्यारी क़ानू को पुचकारते ज़िन्दगी फिर से चल पड़ी थी हमारी क़ानू के साथ।