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कानू का पासपोर्ट

dog show

आज इतवार का दिन था.. सभी घर पर थे, और फूल छुट्टी मनाने का मन हो रहा था। अब सभी संडे मनाने के मूड में आ गए थे, तो हमनें भी सोचा था, चलो! पूरा परिवार इकट्ठा है, तो क्यों न भोजन में आज कुछ विशेष बनाया जाय। अब भोजन भी सारे परिवार की पसन्द का होना चाहये था.. ऐसे थोड़े ही अच्छा लगता है.. एक खा रहा है, और दूसरे की पसन्द ही नहीं है। हाँ! आ गया था, हमारे दिमाग़ में.. चलो! हलवा पूरी बनाते हैं.. हमारी कानू-मानू का प्रिय भोजन है.. हलवा-पूरी। और घर के अन्य सभी सदस्य भी पूरी-हलवे के बेहद शौकीन हैं। कानू को हलवे की खुशबू से ही पता चल जाता है.. कि आज माँ ने ख़ास हमारे लिये ही हलवा बनाया है.. तो बस! सवेरे से ही अपनी फ्लॉवर जैसी पूँछ हिलाकर हमारे आगे-पीछे घूमने लग जाती है। पर हम भी कम न हैं.. भोजन बनते ही, सबसे पहले पूरी का निवाला अपनी प्यारी सी गुड़िया कानू को खिलाते हैं.. और क़ानू के ही बाउल में क़ानू को हलवा भी परोस देते हैं।

आज भी हमनें हलवे-पूरी का भोजन तैयार कर लिया था.. और नन्ही क़ानू ने भी हलवे-पूरी का आनंद सबसे पहले उठा.. अपनी फ्लॉवर जैसी पूँछ हिलाकर और अपनी पिंक कलर की जीभ से हमारे गाल को हल्का सा चाटकर,” thankyou! माँ!” बोलकर खेलना शुरू कर दिया था। घर के बाकी के सदस्यों ने भी हलवा-पूरी भर-पेट खाकर संडे का आनन्द उठाया था।

अब इतवार का हलवा-पूरी तो हो गया था.. अब क्या करें। अचानक से बच्चों के ही दिमाग़ में आईडिया आया था,” क्यों न आज एक अच्छी सी फ़िल्म देखी जाय!”। तो बस! बच्चों ने “ हचिको” नाम की फ़िल्म हम सब को दिखाई थी। “ हचिको” फ़िल्म एक कुत्ते की कहानी पर है.. इस फ़िल्म में हचिको नाम का कुत्ता अपने मालिक से बेहद प्यार करता है.. और अंत तक अपने मालिक की सच्ची वाफ़ादारी, प्यार और इंतज़ार करते हुए भगवान को प्यारा हो जाता है। वाकई में! यह फ़िल्म सबको बहुत ही पसन्द आई थी.. फ़िल्म के अंत में जब हाचिको दुनिया छोड़ जाता है.. तो हम सब भी फ़िल्म देखते हुए रुआँसा हो गए थे.. क्या करते.. दृश्य ही कुछ ऐसा था। उस थोड़ी देर की फ़िल्म में ही हम सब को हाचिको से लगाव हो गया था। वाकई में बहुत ही प्यारा सा कुत्ता दिखाया था.. हचिको ।

फ़िल्म ख़त्म होते ही सब एकदम चुप-चाप बैठ गए थे.. अब सबको चुप-चाप बैठा देख, बच्चों ने हमारा और हमारे पतिदेव का मूड बदलने के लिये बात पलटते हुए कहा था,” यह फ़ौरन के कुत्ते होते ही प्यारे हैं, माँ! आप भी तो इंस्टाग्राम पर कैंडी और काफ़्का के वीडियोस और फ़ोटो देखती हो .. कितने प्यारे हैं, ये दोनों अमेरिकन कुत्ते! हचिको की तरह”।

बच्चों ने हमारा दिमाग़ हचिको से बदल कर काफ़्का और कैंडी की तरफ़ कर दिया था। जब कभी हमें अपने घर के काम-काज और अपनी कानू से समय मिलता है, तो हम अपनी फेसबुक वाली दोस्त कैथरिन जो कि अमेरिका में अपने कुत्तों कैंडी और काफ़्का के साथ रहतीं हैं, उनके साथ चैटिंग कर लेते हैं। हुआ यूँ  कि कैथरिन अपने दोनों कुत्तों.. कैंडी और काफ़्का के वीडिओज़ और फ़ोटो इंस्टाग्राम पर डाला करतीं थीं.. जो हमें बेहद पसंद आया करते थे, अब कैंडी और काफ़्का की तारीफ़ करते-करते हमारी कैथरिन से दोस्ती हो गई.. कैथरिन हमें फेसबुक पर भी मिल गईं थीं.. हमनें उन्हें अपनी कानू के बारे में भी बताया था, और अपनी गुड़िया कानू के भी वीडिओज़ दिखाए थे। कैथरिन को भी क़ानू बहुत ही प्यारी लगी थी.. बहुत तारीफ़ की थी.. कैथरिन ने हमारी प्यारी कानू की।

अब जब भी कोई हमसे फ़ौरन की बड़ी-बड़ी बातें करता है.. तो हम भी बढ़-चढ़ कर कह देते हैं,” हमारी कानू के भी कज़िन रहते हैं, फ़ौरन में.. कैंडी और काफ़्का!”।

हमारी इस बात पर बच्चे बड़ा हँसते हैं.. और हँसते हुए अक्सर हमसे कहते हैं,” अरे! वाह! मम्मी! अब आपने उन कुत्तों.. कैंडी और काफ़्का को भी अपनी कानू का कज़िन डिक्लेअर कर दिया है”।

हम भी बच्चों से कहाँ कम पड़ते हैं, हम भी इस बात पर कह दिया करते हैं,” हाँ! हैं, कैंडी और काफ़्का हमारे रुश्तेदार! और हमारी रानी कानू के कज़िन भी! और हाँ! कहे देते हैं, कैंडी, कानू और काफ़्का को कुत्ता कोई न बोलेगा.. वरना कहे देते हैं.. हाँ! नहीं! तो!”।

बस! यूँहीं अपनी कानू और बच्चों के साथ मन लगाते हमारे दिन निकल रहे थे.. कि अचानक से एक दिन हमनें अपने फेसबुक पर कैथरिन का मैसेज पढ़ा.. कैथरिन हमें कुछ दिनों के लिये अमरीका घूमनें बुलाना चाह रहीं थीं, उनका कहना था.. कि हम थोड़े दिन के लिये एक दोस्त की हैसियत से उनके पास घूमनें जायें, पासपोर्ट और विजा के मामले में हमारी वे जो हो सकेगी वो मदद कर देंगी। हमनें मैसेज के रिप्लाई में कैथरिन को कह दिया था,” परिवार से बात करके बताएँगे”।

हमनें कैथरिन के अमेरिका बुलाने वाली बात बच्चों और पतिदेव के आगे चलाई थी.. तो पतिदेव ने हमसे से कह दिया था,” कैथरिन से कह दो.. पासपोर्ट और विज़ा का इंतेज़ाम होने के बाद ही बताएँगे”।

अब तो घर में हल-चल सी मच गई थी। बच्चे तो खुशी से नाच रहे थे,” मज़ा आएगा! यदि हम कैथरिन आँटी से मिलने गए तो! कैंडी और काफ़्का से भी मिलेंगें”।

“ कानू तो यहीँ अकेली रह जायेगा, है! न! मम्मी!” बच्चों ने हमसे कानू को लेकर कहा था।

“ क्यों! क्यों! रह जायेगी हमारी कानू यहाँ अकेली! साथ लेकर जाएँगे हम कानू को! हमारी कानू भी कैंडी और काफ़्का से मिलेगी”। हमनें बच्चों से क़ानू को भी अमरीका लेकर जाने के विषय में कहा था।

“ हुर्रे! फ़िर तो डबल मज़ा आएगा!” बच्चे कानू का नाम लेकर उछले थे, और अचानक रूककर हमसे बोले थे,” पर.. मम्मी! कानू के पासपोर्ट का क्या!”।

हमनें कहा था,” अरे! हवाई जहाज में होगा कोई तरीका कानू को लेकर जाने का। पर हाँ! हो सकता है.. कानू का भी पासपोर्ट चाहये हो”।

अब बच्चों ने और हमनें आपस में बातचीत शुरू कर दी थी,” क्यों न एक क़ानू का भी पासपोर्ट साइज फोटो खिंचवाकर रख लिया जाए”।

आईडिया अच्छा था, अब शाम होते ही हम और बच्चे अपने पास वाले फोटो स्टूडियो में क़ानू को लेकर पहुँच गए थे। अब क़ानू को लेकर हम दुकान के अन्दर भी घुस गए थे.. कानू ने फोटोग्राफर भइया को देखकर ज़ोर-ज़ोर से भौंकना शुरू कर दिया था.. फोटोग्राफर कानू को देख घबरा गया था। हालाँकि चैन और पट्टा पकड़े हुए थे हम, कानू का.. पर फ़िर भी बाहर वालों को तो डर लगता ही है। उस फोटोग्राफर ने हमसे क़ानू के भौंकने पर कहा था,” हटाइये इस कुत्ते को यहाँ से!”।

जैसे ही उसनें कानू को कुत्ता कहा था.. हमें उस पर हल्का सा ग़ुस्सा आ गया था। पर चलो! कुछ न बोले थे, हम। फ़िर उस फोटोग्राफर भइया ने हमसे पूछा था,” किसका फ़ोटो खींचना है, मैडम!”।

हमनें अपनी कानू की तरफ़ इशारा करते हुए कहा,” हमारी क़ानू का पासपोर्ट साइज फ़ोटो खिंचवाने आए हैं, हम”।

“ हमारी दुकान में कुत्तों के फ़ोटो नहीं खींचे जाते.. ले जाइए.. अपने इस कुत्ते को!” फिटोग्राफर ने हमसे क़ानू के लिये कहा था।

“ हमारे इस मासूम से बच्चे को कुत्ता बोलते हो! शर्म नहीं आती तुम्हें, बड़े आये मना करने वाले.. हम भी देखते हैं, कैसे नहीं खींचते तुम हमारी कानू का फोटो”। फ़ोटोग्राफर के क़ानू को कुत्ता बोलने पर हमारी भारी ग़ुस्से में उसके साथ भयंकर कहा-सुनी हो गई थी। बच्चों ने हमें चुप कराने की बहुत कोशिश भी की थी, पर हमारा ग़ुस्सा काबू न हुआ.. फ़ोटोग्राफर भी क़ानू को लगातार कुत्ता बोलते हुए ही हमसे बहस करता चला जा रहा था, और क़ानू ने भोंकी-भोंक कर सारा हंगामा और भी ज़्यादा सिर पर उठा लिया था। अब मामला काबू से बाहर था.. बात केवल कानू को कुत्ता बोलने पर ही थी.. हालाँकि फ़ोटोग्राफर गलत न था.. अब है, तो क़ानू कुत्ता ही। लेकिन इस हंगामे में अब बच्चे भी शामिल हो गए थे, और उस फ़ोटोग्राफर का कैमरा ही ले भागे थे,” तुम रहने दो भइया! हम खुद ही खींच लेंगें अपनी कानू का फोटो!”। बच्चे ये कहते हुए भाग ख़ड़े हुए थे। हमनें फ़िर फोटोग्राफर भइया से कहा था,” मासूम बच्चे को कुत्ता बोलते हो! अब बोलो!”। और हम भी क़ानू का चैन और पट्टा हाथ में लिये वहाँ से निकल पड़े थे।

अब गलती तो हमारी ही थी। पर क़ानू के चक्कर में क्या बतायें कभी-कभी हमारी भी अक्ल पर पत्थर पड़ जाते हैं। अब फोटोग्राफर का ग़ुस्सा बाकी न रह गया था.. आख़िर उसका कैमरा भी अब हमारे पास था। गुस्से में आकर फोटोग्राफर भइया ने हमारी थाने में कंप्लेंट फ़ाइल करवा पुलिस को हमारे ही दरवाज़े पर ले आया था।

पुलिस वालों ने हमें नीचे बुलवाया.. जैसे ही हम नीचे पहुँचे थे, उन्होंने हमसे पूछा था,” क्या तमाशा बना रखा है, मैडम आपने! आप के अगेंस्ट कंप्लेंट है”। फोटोग्राफर भी वहीँ पर खड़ा था.. हमनें उसे देखते हुए पुलिस वालों से कहा…

“ हमनें तमाशा बना रखा है, पूछिए इससे सर्, कि इसने हमारे मासूम बच्चे को कुत्ता कहा कि नहीं”।

“ अरे! है, तो वो….”। फोटोग्राफर एक बार फिर कानू को कुत्ता ही बोलने को था।

“ हाँ! हाँ! बोल के दिखाओ कुत्ता! बताते हैं, तुम्हें”। हमनें एक बार फ़िर ग़ुस्से में आकर फोटोग्राफर से कहा था।

एक बार फ़िर फोटोग्राफर और हमारी बहस हो गई थी। तमाशा तेजी पर आ गया था…और पुलिस वाले चिल्लाए थे,” शाँत! शाँत हो जाईये आप दोनों। और मैडम आप प्लीज! अपने मासूम बच्चे को लेकर आइये, जिसकी वजह से यह बखेड़ा खड़ा हुआ है”। पुलिस वालों ने हमें आर्डर दिया था, और हम अपनी कानू को अन्दर लेने चले गए थे।

क़ानू को हम चैन और पट्टा बाँध कर बाहर ले आये थे.. और क़ानू ने वहाँ खड़े बहुत सारे लोगों को देख भौंकना शुरू कर दिया था। “ इसे चुप कराइये! और प्लीज हमें बताएँ की कहाँ है, आपका मासूम बच्चा!”। पुलिस वालों ने हमसे पूछा था।

हमनें कानू की तरफ़ इशारा करते हुए कहा था, “ यही तो है,हमारा प्यारा सा मासूम सा बच्चा!”।

“ क्या! क्या कहा आपने!”। पुलिस वाले कानू की तरफ़ देखते ही रह गए थे.. और मामला भी समझ गए थे। हमारी और क़ानू कि तरफ़ देखकर हँसे भी थे, और थोड़ा ग़ुस्सा भी आया था। हमसे कहने लगे,” मैडम! खाली-पीली हमारा टाइम वेस्ट करवा दिया आपने। अब है, तो यह…”।

कानू को कुत्ता बोलते-बोलते रुक गए थे, और अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा था,” मैडम! आइन्दा से आप अपने मासूम बच्चे की वजह से प्लीज किसी को परेशानी न पहुँचाए”।

“ और यार तुम भी, खींच ही देते एक फ़ोटो मैडम के मासूम बच्चे का! खैर! कोई बात नहीं! हमनें मैडम को समझा दिया है, सँभाल कर रखेंगी अपने इस मासूम बच्चे को”। पुलिस वालों ने उस फोटोग्राफर को भी समझाते हुए कहा था।

“ पर सर् मेरा कैमरा इन्हीं मैडम के पास है”। फोटोग्राफर ने कहा था।

“ पर उसी में हमारी कानू का फोटो है, हमनें खुद ही खींच लिया था”।

“ लाइए! मैडम! कैमरा, यह आपको आपके मासूम बच्चे का फोटो निकाल कर दे देगा। पर आइन्दा तमाशा न बनाएं ध्यान रहे, हम कोई फ़ालतू न बैठे होते हैं”। पुलिस वालों ने हमें और फोटोग्राफर दोनों को समझाया था, और अपनी जीप स्टार्ट कर आगे निकल गए थे। लेकिन तुरन्त बाद ही जीप बैक कर पल भर के लिये वापस आए थे.. जीप की खिड़की का काँच नीचे कर कानू को देख एक प्यारी सी मुस्कुराहट फेंकते हुए अपनी ड्यूटी पर आगे निकल गए थे।

बच्चे थोड़े दिन बाद जाकर दुकान से क़ानू का पासपोर्ट साइज फोटोग्राफ निकलवा लाए थे। वाकई! जो हुआ सो हुआ पर हमारी कानू का फोटो बहुत ही प्यारा आया था, और अब कानू हमारे साथ अमरीका जाने को तैयार थी। हम भी अपने मासूम बच्चे क़ानू के साथ अब अंतरराष्ट्रीय उड़ान भरने को तैयार थे।

अपने मासूम बच्चे कानू के साथ अंतरराष्ट्रीय उड़ान भरते हुए.. एक बार फ़िर हम सब उड़ चले थे.. प्यारी कानू के साथ।