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क़ानू का जन्मदिन

कानू का जन्मदिन


‌आजकल सभी के हाथ में  आपको मोबाइल फ़ोन पक्का मिलेगा। बड़ा हो या छोटा मोबाइल बगैर तो ज़िन्दगी चलती ही नहीं है।जब कभी हम बच्चे हुआ करते थे, तो न तो मोबाइल फोनों का चक्कर था,और न ही कोई फेसबुक एकाउंट हुआ करते थे।आज का समाज हमारा फेसबुक,व्हाट्सएप्प और अन्य सोशल मीडिया में सिमट कर रह गया है। हमारे खुद के घर में भी बच्चों को मोबाइलों से ही फुरसत नहीं है। मुश्किल से स्कूल का बस्ता लेकर बैठते हैं, वो भी जब,जब हम ज़्यादा ही पीछे पड़ जाते हैं। अब हुआ यूँ कि एक दिन दोपहरी में सब अपने-अपने मोबाइल फोन में लगे हुए थे, हम भी वहीं बैठे टेलीविज़न के मज़े ले रहे थे, तभी बच्चों ने हमें आ कर बुरी तरह से घेर लिया और हमारा टेलीविज़न सेट तुरन्त बन्द कर दिया था। हमनें बच्चों से कहा था,”क्या बदतमीज़ी है? हमें चैन से टेलीविज़न क्यों नहीं देखने दे रहे हो?” इस पर बच्चों ने कहा था,”माँ पहले हमारे और भैया के मोबाइल में यह फोटो तो देखो,डॉगी की कितनी अच्छी आयीं हैं। हमारे दोस्तों ने अपने डॉगी का जन्मदिन मनाया है”। हमने आराम से बैठ कर बच्चों के कहने पर तस्वीरें देखी थीं… वाकई तस्वीरें बहुत ही प्यारी दिख रहीं थीं, और भई डॉगी जिसका जमन्दिन मनाया गया था, वो तो और भी और भी प्यारा लग रहा था। बच्चों को दोस्तों के डॉगी की जन्मदिन की तस्वीरें देख कर चैन न आ रहा था,बस!हमारे ही पीछे पड़ गए थे,”चलो न मम्मी इस बार अपनी क़ानू-मानू का जन्मदिन मनाया जाय। देखते ही देखते तीन-चार साल की हो गयी है, पर आज तक हमनें कभी प्यारी क़ानू का जन्मदिन नहीं मनाया”। बच्चों का क़ानू का जन्मदिन मनाने का यह आईडिया हमें बहुत ही पसन्द आया था। शाम को जब पतिदेव दफ्तर से लौटे थे, तो हमनें उन्हें बच्चों का क़ानू  का जन्मदिन मनाने का सुझाव आते ही दिया था, हमारी बात सुन पतिदेव तपाक से बोले थे, “क्या?कुत्ते का जन्मदिन..दिमाग़ तो न फ़िर गया है, तुम्हारा..फिजूल की खर्ची बिल्कुल न करूँगा मैं”। हम तो खैर!क्या बोलते पर हाँ!बच्चों ने जैसे तैसे अपने पिताजी को क़ानू रानी के जन्मदिन के लिए मना ही डाला था। और हारकर उन्हें भी कहना ही पड़ा था,”चलो, कर लो मन मानी पर कुत्तों का तमाशा मत कर डालना, घर ही में खाना -पीना बना लेना”। अब तो और कुछ हो न हो सारे  परिवार में क़ानू के जन्मदिन की लहर दौड़ गयी थी। पढ़ाई- लिखाई सब एक तरफ़ रख अब तो सारा दिन एक ही बात ज़बान पर रहा करती थी..कैसे मनाएंगे क़ानू-मानू का जन्मदिन। काफ़ी दिमाग़ पर ज़ोर डालने के बाद बच्चों ने शोर मचाया था… आईडिया!!
‌कुदरती यह जो महीना था, यह बीच सेप्टेंबर का चल रहा था। क़ानू का जन्मदिन अक्टूबर की पाँच तारीख़ को ही आता है।हम क़ानू को डॉक्टर के पास से अक्टूबर महीने के आखिर में लेकर आये थे। आयडिया भी एकदम सही वक्त पर आया था, ज़्यादा समय न था, क़ानू का जन्मदिन आने में। यही कोई पन्द्रह बीस दिन रह गए थे, क़ानू के हैप्पी बर्थडे के। हमनें भी बच्चों के साथ बैठ कर पूरा दिमाग़ लगा लिया था। जन्मदिन से दो दिन पहले बच्चों ने अपने दोस्तों और दो चार पड़ोसियों जिनके पास पहले से ही कुत्ते थे, कार्ड दे दिए थे। बच्चों ने कार्ड बहुत ही सुन्दर छपवाए थे…कार्ड के ऊपर क़ानू की प्यारी सी छोटी सी तस्वीर थी.. और कार्ड के चारों तरफ़ लाल, हरे और  गुलाबी रंग के गुब्बारे बनवा दिए थे, बर्थडे कार्ड बिल्कुल क़ानू जैसा ही सुन्दर दिख रहा था। अब बारी आई थी कि क़ानू रानी को कैसे पेश किया जाए आख़िर जन्मदिन जो था, तो फ़िर ठीक है, एक और धाँसू आईडिया आया था बच्चों को..बच्चों ने हमें दोंनो हाथों से भींच लिया था, और हमारे गाल से गाल लगाकर प्यार से बोले थे,”मम्मी पता है, हमनें सोचा है, कि हम डॉक्टर अंकल से क़ानू के लिए एक प्यारी सी फ्रॉक,ले आएँगे हमनें रखी हुई देखी थीं”। हमनें बच्चों की बात मान मुस्कुरा कर हाँ!में सहमति दे थी।
‌प्लानिंग हो चुकी थी, और जन्मदिन का दिन आ ही गया था,अब सवाल यह था कि घर के किस पोर्शन में क़ानू का बर्थडे मनाया जाय। तो बस!घर में खुले में ही बर्थडे मनाने का प्लान हो गया था। क्योंकी दीवाली भी आने वाली थी, इसलिए घर में रंग पुताई का काम भी साथ-साथ चल रहा था, और हमारी कानू जो थी, वो पुताई वालों की भोंकी-भोंकी कर नाक में दम कर दिया करती थी।पर चलो कोई बात नहीं,कोशशि करके सब सँभाल लेंगे।
कल क़ानू का जन्मदिन था, आज तो हमें बच्चों ने सरप्राइज ही कर डाला था, सुबह सवेरे जल्दी उठ सब नाहा-धो लिए थे। हमनें पूछा था,”क़ानू का बर्थडे तो कल है, फिर आज सुबह से ही कैसे?”बच्चों ने हमारी बात का उत्तर दिया और कहने लगे थे, “माँ!भूल गयीं क्या आज हमें क़ानू के लिए डॉक्टर अंकल के यहाँ फ्रॉक लेने जाना है।कुत्तों का हर आइटम अच्छा रखते हैं, अंकल “। और भई क्यों न रखते भोपाल के बेहतरीन जानवरों के डॉक्टर जो ठहरे थे, नाम है पूरे भोपाल में इनका लोग बहुत दूर-दूर से अपने जानवरों का इलाज कराने आते है,और यहाँ पर हर तरह का विदेशी समान कुत्तों का भी मिलता है…जैसे कुत्तों के जूते, कपड़े कई तरह के पट्टे आदि। बच्चे नाश्ता वगरैह कर क़ानू की फ्रॉक लेने निकल गए थे, इतनी देर में हम सोच रहे थे, कि भोजन में क्या बनायेंगे… तो हमें भी क़ानू के हिसाब का आईडिया आ ही गया था। हिमने निर्णय लिया कि अंडों का केक बना लेंगे जो क़ानू को बेहद पसन्द है, और कोई भी चटपटी सब्जी व पूरियाँ अपनी चटोरी क़ानू के लिए बनाएंगे।अब तो बच्चे भी क़ानू के लिए सुन्दर सी फ्रॉक और जूते ले आये थे, हमनें फिर पूछ ही लिया था,”अरे!लेने तो बस फ्रॉक ही गये थे ,जूते भी”। चलो ठीक है। “पर क्या क़ानू जूते पहनेगी भी”।

आज क़ानू का जमन्दिन था, हम तो रोज़ की तरह ही सुबह के चार बजे उठ गए थे।हमारे  सुबह उठते  ही हमेशा की तरह प्यारी सी भोली सी क़ानू भी अपनी फ्लॉवर जैसी पूँछ हिलाते हुए बिस्तर में से उठ कर हमारे ही साथ बाहर आ गयी थी, हमनें क़ानू के मुलायम से गाल पर एक मीठी सी पप्पी देकर क़ानू को हैप्पी बर्थडे कहा था। और फ़िर क़ानू को दोबारा से बिस्तर में सुला दिया था,वरना अभी तो सुबह की ठंड में  नन्ही क़ानू बीमार जो पड़ जाती। दिन के करीब ग्यारह बज चुके थे, और बच्चों ने उठ कर सफेद से प्यारे से उन के गोले को अपनी बाहों में भरकर प्यार से जन्मदिन की बधाई दी थी। बच्चों ने क़ानू को उसके आगे वाले हाथों पर खड़ा कर लिया था, और ज़ोर से बोले थे,”हैप्पी बर्थडे, काना!!” क़ानू भी अपनी पिंक कलर की जीभ साइड में लटका कर खूब खुश हुई थी, मानो सब समझ रही हो। अब तो क़ानू भी अपना काले रंग का घुँघरू वाला पट्टा पहन कर बाहर निकल आयी थी, खेलने। हमनें कहा था,”अरे,भई जो इसके लिए जूते और फ्रॉक लाये थे, वो तो पहना दो”। बच्चे झट्ट से अन्दर से क़ानू की पिंक और रेड कलर मिक्स फ्रॉक निकाल कर लाये थे, और साथ मे डार्क ब्राउन से कलर के जूते भी थे। क़ानू ने फ्रॉक तो आसानी से पहन ली थी , बस!जूते पहनने में ड्रामा करने लगी और एकदम हमारी बिटिया का हाथ अपने मुहँ में ही ले लिया था,पर काटा बिल्कुल नहीं ..बस,अपना ग़ुस्सा दर्शा रही थी।हमनें कहा,”रहने दो जूते हम पहना देते हैं”। हमनें क़ानू को प्यार से अपनी गोद में बिठा कर उसके छोटे-छोटे पैरों में जूते फिट कर दिये थे ,बेकार ही बच्चों को तंग कर रही थी, और फालतू में भोंके जा रही थी, जबकि जूते एकदम आरामदायक थे, कुत्तों के हिसाब के ही तो थे।घर में लाल रंग का पतला सैटर्न रिब्बन भी रखा हुआ था,सो क़ानू के पेपर कटिंग जैसे कानों के आकार का काट कर हमनें क़ानू के कानों के चारों तरफ़ फूल बनाकर बाँध दिया था। अब तो फ्रॉक, रिब्बन और जूतों में क़ानू-मानू एकदम बर्थडे गर्ल लग रही थी। ऊपर से क़ानू के काले गुलाब-जामुन जैसी नाक तो बोनस थी ही। सच!बहुत ही स्वीट लिटिल गर्ल लग रहा था,मेरा काना। अब तो बच्चे क़ानू के गले में चैन और पट्टा बाँध क़ानू को लिए-लिए घूम रहे थे।अड़ोसी-पड़ोसी सब क़ानू को हैरानी से देख रहे थे, क्योंकि कुत्ते को कपड़ों और जूतों में देख उन्हें अचंभा लग रहा था।पड़ोस के अग्रवाल साहब ने तो बच्चों से पूछ ही लिया था,”अरे! यह क्या मदारी का सा बन्दर बना रखा है, आज आपने क़ानू को, खैर!स्वीट तो लग रही है”। बच्चों का कहना हुआ था,”अंकल आज क़ानू का जन्मदिन है”। अग्रवाल साहब हँसकर बोल पड़े थे,”ओहो!तभी आज क़ानू डॉल लग रही है, हम भी आ जाएं क्या जन्म दिन पर”।


बच्चे क़ानू को घर ले आये थे,और हमें अग्रवाल साहब की बात बताई थी। हमनें पड़ोस की बात समझ एक -आध पड़ोसी को आमंत्रित करने का निर्णय ले लिया था।फ़ोन पर ही हमनें अपने पड़ोसी मित्रों को निमंत्रण दे दिया था। अब तो बच्चे क़ानू को पूरे घर में लिए-लिए घूम रहे थे। बच्चों ने और हमनें  पूरी छत्त को गुब्बारों से सजा दिया था। क़ानू का तो खुशी का ठिकाना न था, वह अपने आप में ही खुद को थोड़ा सा अलग महसूस कर  थी, बस! जूतों में  थोड़ी सी परेशानी महसूस कर रही थी, बार-बार अपने मुहँ से बैठकर उन जूतों को काट रही थी, और भोंके जा रही थी, भोंक-भोंक कर हमसे कह रही थी,”ये जूते उतार दो हम न पहनेंगे”। जूतों में बहुत ज़्यादा परेशान देख हमनें क़ानू के जूते उतार दिये थे,और क़ानू को खुल कर खेलने-कूदने दिया था। जूते उतरते ही मेरी क़ानू-मानू एकदम मस्त हो गई थी। अब तो पिंक कलर की जीभ साइड में  लटकाकर और भी मज़ा आ गया था। बच्चों ने हाई वॉल्यूम पर बर्थडे सॉन्ग चला दिया था, हालाँकि हमारी क़ानू को गाना समझ में तो न आ रहा था, पर क़ानू अक्सर जब भी कोई हम गाना चलाते हैं, तो अपनी गर्दन इधर-उधर करके एन्जॉय करती है। आज भी ठीक उसी तरह से क़ानू अपनी गर्दन को इधर-उधर कर और अपनी पिंक कलर की जीभ को साइड में लटका कर खूब एन्जॉय कर रही थी।
“मम्मी आज हम क़ानू को लेकर थोड़ी सी देर पार्क में चले जायें। प्लीज्!मना मत करना आज तो इसका बर्थडे है”। हमनें बच्चों की बात मान ली और हम सब क़ानू को लेकर थोड़ी देर के लिए पार्क में चले गए थे, वहाँ हम सब ने मिलकर क़ानू सहित बॉल से खूब खेला और जमकर एन्जॉय किया था। क़ानू भी पार्क में खूब बॉल के पीछे इधर-उधर भाग रही थी, पार्क के आसपास से जाते हुए लोग क़ानू का ड्रेसिंग स्टाइल देख हैरान होते हुए निकल रहे थे। हैरान हों भी क्यों न कभी किसी कुत्ते को यूँ फ्रॉक और कान में रिब्बन बाँधे तो देखा नहीं था। बस!खूब खेल-कूद होने के बाद हम सबने अपनी क़ानू को लेकर झूले के साथ फोटो-वोटो करवाये थे। क़ानू जब बॉल से खेल रही थी, तो एक छोटी सी वीडियो भी हमनें चुपके से क़ानू की बना डाली थी।
अब खेल-कूद खत्म कर सब वापिस घर आ गए थे, और बच्चों को और क़ानू की ज़ोरों से भूख लगी थी। हमारे पड़ोसी मित्र भी न्योते के अनुसार हमारे घर पर आ गए थे। मज़ाक में कहने लगे थे,”क़ानू के दोस्त कुत्तों को भी ले आयें क्या भाभी”। और हम इस बात पर हँस कर बोले थे”दोस्त कुत्तों का खाना तो हम भाई-साहब आप के ही हाथ भिजवा देंगें”। सबने और क़ानू ने खूब खुश होकर भोजन फरमाया था, अभी जन्मदिन यहीं ख़त्म नही हुआ था, अभी तो क़ानू के वो दोस्त रह गए थे, जो क़ानू को रोज़ शाम को जब हम क़ानू को घुमाने लेकर जाया करते थे, यानी गली के कुत्ते। हमने उन सभी कुत्तों के लिए रोटी दूध का इंतेज़ाम कर उन्हें भी खिलवा दिया था, यहाँ तक की छोटे-छोटे नाली के नीचे जन्मे पप्पी को भी न छोड़ा था, उन्हें भी दूध दिया था। कुछ इस तरह से हमनें मनाया था, क़ानू का बर्थडे।
बर्थडे वाले दिन हमनें अपनी क़ानू की लम्बी उम्र की कामना करते हुए क़ानू-मानू को गले से लगाकर ढ़ेर सारा प्यार किया था।हालाँकि कहना तो न चाहते  हैं, पर कुत्तों की उम्र तो होती ही वही दस पन्द्रह साल है। सच!क़ानू को हम सबने बहुत लाड़ किया था, और इसी तरह से क़ानू के जन्मदिन मनाते हमारी सबकी ज़िन्दगी फ़िर से चल पड़ी थी, क़ानू के साथ।