बेड के किनारे यूँ छोटी सी जगह में घुस जाना,फँस-फँस कर चलना कानू की आदत सी हो गयी थी।मुझे कभी समझ में न आता था , कि कानू कैसे बेड के किनारे कोने में घुस जाती है,और फँस-फँस कर चलती है…बिल्कुल कोने में घुसकर घंटो मुहँ डालकर क्या इन्क्वारी करती रहती है। “बाहर निकलो चलो”आवाज़ लगाई थी मैने… बिल्कुल अनसुना कर दिया था न निकली महारानी… फँस कर खड़ी थी…पूँछ पकड़कर ज़बरदस्ती खींच कर निकाला तो काटने भागी और अड़ गई… डर गई थी मैं कि कहीं दाँत न गाड़ दे…आख़िर है तो जानवर–हालाँकि हमने vaccinate कर रखा है,कानू को पर डर तो लगता ही है…खैर!बाहर तो आ गई पर फिर वहीं घूमने की ज़िद्द… जानने की उत्सुकता हुई कि ऐसा क्या है जो मानती ही नही है,और बेड के कोने में घुसी चली जाती है…मैंने अन्दर जाने का रास्ता बंद कर दिया था।एक दो दिन के अन्दर राज़ खुल ही गया।

हम सब वहीं बिस्तर पर बैठकर टेलीविज़न का आनन्द ले रहे थे…कि मुझे चूँ-चूँ की आवाज़ आयी, और मैने टेलीविज़न की आवाज़ काम करने का ऑर्डर दे दिया…हम सब एकदम चुप हो गए थे—-एकदम वातावरण शांत हो गया था…अचानक देखा तो कोने में से जहाँ कानू रानी घंटो ज़बरदस्ती फँस कर खड़ी रहतीं थीं, गणेश जी की सवारी निकल कर ज़ोर से पर्दे पर कूदी…. चीख निकली थी…चूहा!!! बस! फिर क्या था चूहे महाराज पर्दे पर डर के मारे चिपक गये थे,और फिर जल्दी से परदे की रॉड पर जा बैठे।

हम सब चिल्लाये थे…डंडा लाओ… पकड़ो मारो कपड़े काट जाएगा..बस!इसी तमाशे कानू का राज़ सामने आया था…तेज़ी से कूदकर बिस्तर पर चढ़ी थी…और दोनों आगे के हाथ टिकाकर पर्दे पर एकदम सीधी खड़ी हो गयी थी….पेपर कटिंग जैसे प्यारे कान झुकाकर अँगूर जैसी सुंदर काली आँखे चूहे पर थीं… सच्च!बहुत सुंदर लग रहीं थीं…एकदम अलर्ट।ऐसे खड़ी हुई प्यारी सी गुड़िया कानू को मैने एक छोटी सी गाल पर पप्पी भी कर दी थी।हालाँकि गुस्सा तो आया था कि डिस्टर्ब क्योँ किया,अब तो इसे मारकर ही छोडूँगी…. बहुत दिनों से छुपा बैठा है….गाल पर छोटी सी पप्पी देने पर कुछ न बोली थी कानू।

नज़ारा देखने लायक था—चूहे महाराज ऊपर पर्दे की रॉड पर एकदम सतर्क बैठे थे…पता था नीचे शिकारी तैयार खड़ा है…हमने बच्चों को शोर मचाने से बिल्कुल मना कर दिया था..हल्ला-गुल्ला करते तो चूहा भाग जाता…एकदम चुप-चाप कोने में दुबककर बैठा हुआ चूहा अपनी जान बचाने के बारे में सोच रहा था…इधर कानू पूरी तरह से अलर्ट थी-मुकाबला ज़ोरों पर था..रेडी स्टेडी गो!चूहा तेज़ भागा था…दूसरी तरफ कानू भी फुल स्पीड में चूहे की तरफ तेज़ भागी थी…चूहा दीवार के साथ-साथ तेज़ी से नीचे उतरा था..फिर क्या था कानू ज़ोर से भौंकते हुए चूहे की तरफ सारे सामान पर से हाई जम्प लगाकार चूहे की तरफ झपटी थी.. भौंकने की आवाज़ सुनकर फोल्डिंग बेड के नीचे चूहा सरर से निकला था…..मानो कह रहा हो”भाग बेटा जान है तो जहांन है”। कानू का तेज़ दिमाग़ और फुर्तीलापन रुकने वाला नही था…उसी फोल्डिंग बेड के नीचे लंबी होकर घुस गई थी..महारानी……ये लो ये लगाई लंबी छलाँग, धर दबोचा चूहे को।

आगे का नज़ारा फोल्डिंग बेड के नीचे का था… चूहा कानू की शिकस्त में था… इस वक़्त हल्का हाथ रखकर बैठ गई थी चूहे पर… हम सब एकसाथ चुप-चाप टकटकी लगाकर तमाशा देख रहे थे।सच!बहुत मज़ा आ रहा था।यहाँ चूहा कानू से अपनी जिंदगी की भीख माँग रहा था–“छोड़ दो दीदी प्लीज अब कभी न आऊँगा अन्दर’सहमा सा डरा सा चुपचाप काँपता हुआ चूहा कानू के पंजे में था..हाँफ रही थी कानू…. आख़िर मेहनत का नतीजा था… शिकार हाथ में लेना आँखों में जीत की खुशी चमक दोनों थीं…. मानो चूहे से कह रही हों “बहुत होशियार बनता है,बाप लगते हैं तेरे’बस!अब नज़ारे पर से परदा गिर गया था… कानू ने चुहे पर रहम न खाकर दो दाँत मारकर पहले घायल किया,और फिर पूरी तरह से जान निकाल दी थी–मन को सुकून और आराम महसूस हो रहा था.. कानू के।

मैं तो सोच रही थी कि मार ही डाला है तो खायेगी भी…आख़िर!है तो जानवर.. पर नहीं अलग होकर आराम से वहाँ से निकल गयी थी….जैसे किसी मैच की बाज़ी जीत गयी हो।तमाशा खत्म हुआ था और हमने बच्चों से कहकर चूहे को बाहर फिंकवा दिया था। यह नया शिकारी और तेज़ तर्रार रुप नया देखने को मिला था कानू का।

चेहरा और आँखे कह रहीं थीं…” now i am happy at last i have won”.याद न आया काश!वीडियो फ़िल्म बना ली होती हमने। खैर! ऐसे वाकये बार-बार होंगे यह तो शुरुआत है नयी शिकारी बनी कानू की।इसी तरह सर नई शिकारी बानी कानू बड़ी हो रही थी हमारे साथ।

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