जीने की राह पर अंतिम पड़ाव की तरह सेवकों ने मेरे लिए एक छोटी और सुंदर कुटिया छा दी है। चंद्र प्रभा के किनारे आश्रम से तनिक दूरी पर है ये कुटिया। कुटिया से सीढ़ियां नीचे चंद्र प्रभा में उतरती हैं। नीचे एक छोटा घाट बना है पानी के किनारे जहां मैं स्नान करता हूँ, ध्यान करता हूँ और उस परम एकांत में प्रभु को याद करता हूँ।

चंद्र प्रभा का शीतल जल मेरे सारे संताप हर लेता है!

“विभूति प्रसाद घर लौट रहा है स्वामी जी!” शंकर बता रहा है। “दर्शन लाभ के लिए आया है!”

विभूति प्रसाद का आर पार मुझे एक लमहे में दिख जाता है। जर जर काया और टूटा फूटा मन लेकर आश्रम में आ पड़ा था – विभूति। उसकी निस्तेज आंखें बता रही थीं कि वो जीएगा नहीं! जीने की चाह ही जाती रही थी।

“मेरा सब कुछ लुट गया स्वामी जी!” विभूति प्रसाद ने लड़खड़ाती जबान में कहा था। “मेरा .. मेरा लुट गया सब!” वह बड़बड़ाता रहा था।

“सब ठीक हो जाएगा!” मैंने उसे सुना कर कहा था। फिर मैंने उसके सर पर हाथ रक्खा था। “सब ठीक होगा!” मैं फिर से बोला था।

तब विभूति ने आंखें पसार कर मुझे देखा था। एक चमक लौटी थी उसकी आंखों में और फिर से जीने का विश्वास भी पास आ बैठा था!

“मैं .. मैं तो मरना चाहता हूँ स्वामी जी!” विभूति मरने का आग्रह कर रहा था। “अब .. अब मेरा जीने का मन नहीं है। न जीऊंगा अब! क्यों जीऊंगा?”

“आराम करो!” मैंने जैसे उसे आदेश दिया था। “थक गये हो!” मेरा अनुमान था।

और विभूति चंद पलों में ही गहरी निद्रा में जा डूबा था। और यह तभी होता है जब तमाम व्याधियां हमें छोड़ कर चली जाती हैं! जिन्हें हम मित्र मानकर पाल लेते हैं, पास बिठा लेते हैं और मुंह लगा लेते हैं वही व्याधियां हमें सताने लगती हैं और खाने लगती हैं! अब ये चाह कर भी हमें छोड़ कर नहीं जातीं!

“आपने जीवन दान दे दिया स्वामी जी!” विभूति प्रसाद ने आशीर्वाद लेते हुए कहा है। “पीकर पड़ा रहता था मरने के इंतजार में। सच में स्वामी जी मैं तो सब कुछ हार बैठा था। आसमान से गिरा था तो बहुत चोट लगी थी। विभूति प्रसाद कभी एक नाम हुआ करता था लेकिन जब गिरा तो किसी ने थूका तक नहीं मुझ पर!” भावुक था विभूति। “अगर आपकी शरण में ना आया होता तो ..”

“फकीरों के पास और होता क्या है, विभूति?”

“नहीं! फकीरी में ही सब कुछ है स्वामी जी! अमीर तो अभिमानी होता है। अहंकार उसे हाथ पकड़ कर सारे अपराध कराता है और वासनाएं हंस हंस कर उसे ठिकाने लगा देती हैं!” विभूति ने सीधा मेरी आंखों में देखा है। “यहां आ कर समझा में स्वामी जी कि जीने का अर्थ देना है – लेना नहीं!”

“सच्चा मार्ग तो यही है, वत्स!” मैंने साधु वचन कहे हैं।

आश्रम की अच्छी सच्ची भावनाओं से तरंगित हुआ विभूति लौट रहा है – वहीं जहां से वह परास्त हो कर आया था!

हार जीत का निर्णय भी आपकी जीने की राह पर ही निर्भर करता है!

मेजर कृपाल वर्मा

मेजर कृपाल वर्मा

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