“मैं क्या करूं, स्वामी जी! कहां जाऊं?” बबलू मेरे पैरों में पड़ा गिड़गिड़ा रहा है। “पी लेता हूँ तो दो पल जी लेता हूँ वरना तो मेरा जीने का मन ही नहीं करता स्वामी जी!” वह कह रहा है।

मैं भी क्या करूं बबलू – मैंने भी उसे वही प्रश्न पूछा है। आश्रम है। यहां आचरण नियमानुसार करने होंगे। और फिर मैंने तुम्हें समझाया था और एक सीधा सीधा जीने का सुगम रास्ता बताया था और ..

“याद है स्वामी जी! आप ने कहा था – संतोष, शांति और सुख!” बबलू बता रहा है। “लेकिन .. लेकिन .. स्वामी जी मुझसे तो संतोष की पहली सीढ़ी ही नहीं चढ़ी गई और मुझसे तो ..”

“लेकिन क्यों?”

“इसलिए स्वामी जी कि जो मेरे साथ हुआ है और जो .. जो ..” रोने लगा है बबलू! “बेईमानों ने कहीं का नहीं छोड़ा स्वामी जी। मैंने अपना सब कुछ दिया। सोचा – नेकी कर कुएं में डाल! लेकिन मैं ही अंधे कुएं में आ गिरा।” वह मेरी आंखों में देखता है। “संतोष आए भी तो कैसे आए – स्वामी जी?”

अब क्या कहूं?

“जय श्री राम जपते हो?” मैंने उसे पूछा है। “राम का नाम ..?”

“लेता हूं लेकिन राम राम कहते कहते मुझे रामी याद हो आती है। और रामी बहका कर मुझे आश्रम से नसा ले जाती है। फिर तो मेरा मन ..”

“तमाम व्याधाओं का मूल ये मन ही तो है बबलू!” मैं आहिस्ता से बोला हूँ। “मना लो इसे। बुला लो इसे!” मैं बताने लग रहा हूँ। “इसे .. इसे .. रामी को भूल जाने के लिए राजी करो!”

“नहीं हो पाएगा स्वामी जी!” बबलू ने साफ इनकार कर दिया है। “आश्रम से ही चला जाता हूँ!” वह मान जाता है।

आज मैं भी अपने आजमाए मंत्र को असफल होते देख लिया है! आसान है – संतोष, शांति और सुख का मंत्र लेकिन आसानी से आता नहीं है। संतोष करो भाई – जब कोई कह देता है तो कभी कभी उसका मुंह नोचने का मन बन आता है। कारण – जब लगे घाव गहराने लगते हैं तब मन विध्वंस करने भागता है और बिना सब कुछ मिटाए नहीं मानता! तब न मरने से डर लगता है और न बिगड़ने से। बर्बाद होने में भी एक अजीब आनंद आता है। उजड़ता उपवन देखने का सुख भी अलग है! ये पैशाचिक आनंद कुछ अलग ही है।

अंधा हो जाता है – अच्छा खासा आदमी!

“क्या हुआ तुम्हारे उस उगाये उपवन का पीतू?” मैं अचानक ही प्रश्न पूछता हूँ। मैं अब कहानी के अंतिम छोर पर आ बैठा यह जानने के लिए उत्सुक हूँ कि आखिर क्या हुआ होगा जो .. गुलनार ..?

गुलनार भी चुप है। गुलनार की आंखों में एक अपराध बोध उग आया है। पीतू .. वह पव्वा जैसा लगने वाला पीतू – स्वामी पीताम्बर दास कैसे बना – गुलनार जान लेना चाहती है। उगे इस आश्चर्य पर अपने बोध की उंगली धर कर वह जिंदगी के मायने समझ लेना चाहती है।

मैं हंस पड़ा हूँ। मुझे तो पता है न कि यहां किसी को कुछ भी समझ नहीं आता। कुल मिला कर जिंदगी को एक आश्चर्य ही माना जाए – तो सही है। और मेरी बताई जीने की राह भी सच है – संतोष, शांति और सुख!

लेकिन हॉं! अकेले संतोष को ही साधने के लिए एक कला सीखने की तरह साधना करनी होती है।

मेजर कृपाल वर्मा

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