शनिवार की सुबह थी और कुमार गंधर्व की आंखें खुलते ही अंजली को तलाशने लगी थीं।
अंजली जैसे एक खोया सपना थी, जैसे कोई बिछुड़ गया मीत थी और जैसे कोई भूली याद थी – कुमार गंधर्व उसे रह रह कर पुकार रहा था।
“क्या सुनाऊं आज?” अचानक कुमार गंधर्व ने स्वयं से प्रश्न पूछा था। “कुछ .. कुछ ऐसा जो अंजली को अभिभूत कर दे! कुछ ऐसा जो उसे ..!” खुले आसमान को कातर निगाहों से निहारा था कुमार गंधर्व ने। “हां हां! राधे राधे ..! राधे राधे – श्याम मिला दे, श्रेष्ठ रहेगा!” अचानक वह एक निर्णय पर आ कर ठहर गया था।
“आज तो वो जरूर आएगी भक्तराज!” शंकर ने कुमार गंधर्व के मनोभाव ताड़ लिए थे। “प्रेम रोग है ये!” शंकर हंसा था। “हम भी तो इसी रोग के मारे हैं, महाराज!” वह हंस रहा था। “हम से वायदा किया और दूसरे से शादी कर चली गई थी – संतरा!” शंकर ने मुड़ कर कुमार गंधर्व की प्रेमाकुल आंखों को पढ़ा था। “बहुत बड़ा सदमा लगा था हमें, भक्तराज! संभल ही न पाए! पागल हो गए थे हम!” शंकर कहते कहते चला गया था।
दिन चढ़ आया था। आश्रम में चहल-पहल बढ़ गई थी। दूर दराज के लोग पहुंचने लगे थे। लेकिन .. लेकिन अंजली का आना तो अभी शेष था। अब इंतजार की घड़ियां कुमार गंधर्व को सताने लगी थीं। एक श भी कभी कभार आता और उसे छेड़ जाता और पूछता अगर वो न आई तो .. तो क्या जान दे दोगे?
“तुम तो बैरागी हो कुमार!” एक प्रश्न स्वयं से पूछा था कुमार गंधर्व ने।
“मैं कोई बैरागी नहीं!” तुरंत उत्तर दिया था – कुमार गंधर्व ने। “अंजली के लिए तो मैं ..”
तभी एक लंबी चौड़ी कार दूर दिशा में आ खड़ी हुई थी।
कुमार गंधर्व का मन हरा हो गया था। बड़े चाव के साथ उन्होंने अपने आप को संभाला था और सभागार की ओर चले गए थे।
स्वामी पीतांबर दास को भी न जाने क्यों गुलाब की मालाएं लिए आते उन तीन प्राणियों से लगाव हो गया था। आज वो फिर आशीर्वाद लेने आए थे। आज शायद फिर अंजली की अद्भुत गायकी सुनने का सौभाग्य मिलेगा – सोच कर स्वामी जी प्रसन्न हो गए थे।
गुलाब की मालाएं छूते हुए स्वामी जी ने आशीर्वाद दिया था।
आज की भीड़ के पारा वार अजब गजब थे। अंजली का आना जैसे हर किसी के लिए एक वरदान था! हालांकि कुमार गंधर्व ने भी आज – राधे राधे – श्याम मिला दे गाया था तो अनूठा आनंद बरसा था। लेकिन जब अंजली ने तान छेड़ी थी और सुर साध कर गया था – ए री मैं तो प्रेम दीवानी – मेरा दरद न जाने कोय, तो गजब ही हो गया था। निरी करुणा बरसी थी। छू गया था अंजली की आवाज में उभर आया मीरा का विछोह! प्रेम हो तो ऐसा पवित्र हो, निश्छल हो – इसे हर कोई मान गया था।
“जोड़ नहीं आपकी गायकी का!” कविराज कौशल ने अंजली की प्रशंसा की थी। “कहां से सीखी है आपने ये कला?” उन का प्रश्न था।
“वनस्थली में पढ़ी हूँ – मैं जयपुर में थी!” अंजली का उत्तर था।
अंजली का उत्तर सुन कर कुमार गंधर्व के दिमाग में प्रकाश पुंज उगे थे और अनंत में फैल गए थे। जब वो सेंट निकोलस लंदन गया था तभी तो अंजली वनस्थली जयपुर गई थी। उसके बाद से आज .. वो दोनों आमने सामने थे! विचित्र संयोग था!
“रुक जाइए न आज रात आश्रम में?” घबराते हुए कुमार गंधर्व ने अंजली से आग्रह किया था। “देखिए तो कैसा लगता है जमीन पर सोना और पत्तल पर बैठ कर खाना!” हंस गया था कुमार गंधर्व।
कई पलों तक चुप्पी बनी रही थी। अंजली कुछ सोचती रही थी।
“चलिए! आपकी बात मान लेते हैं!” अंजली ने विनम्रता पूर्वक कहा था। “आप का अनुरोध है तो मैं ..”
अंजली जैसे एक नई जीने की राह थी और उसके अनुरोध पर रुक कर खड़ी हो गई थी – कुमार गंधर्व ने महसूस किया था!
कोई नई राह खुलती है तो कितनी मनभावन लगती है – कुमार गंधर्व सोचता ही रहा था!

मेजर कृपाल वर्मा