दीपावली का परम पावन पर्व उल्लास के साथ साथ मुझमें उजाला भी भरता जा रहा है।
भोज पुर आश्रम के स्वामी पूर्णानन्द जी महाराज का दिव्य स्वरूप मैं अचानक ही देखने लगा हूँ। मैं समझ रहा हूँ कि जाने अनजाने मुझ में उन्हीं का वो प्रतिरूप समाया है और मैंने भी उनके निरन्तर देते रहने के स्वभाव को आत्मसात कर लिया है।
“जो भी आग्रही प्रेम नीड़ में आये उन्हें बिना उनका नाम गांव और जाति-पाति पूछे बिना ही वो सहारे बांटे जाएं जिनकी उन्हें दरकार हो।” मैं बंशी बाबू को बताने लग रहा हूँ। “वो जब तक चाहें रहें सहें। उनपर कोई प्रतिबंध न लगाये आश्रम। बिना किसी शर्त और सुलहनामे के आश्रम उनकी सहायता करे।” मेरा स्पष्ट मत है।
बंशी बाबू प्रसन्न दिखे हैं। उनका मन भी औरों के लिए ही मरता है – मैं जानता हूँ। अपना घर बार छोड़ कर यों आश्रम का हो जाना बंशी बाबू का एक उच्च कोटि का उदाहरण है। मैंने भी तो बंशी बाबू से बहुत कुछ सीखा है।
“मैं भी यही मान कर चलता हूँ स्वामी जी कि मनुष्य को मनुष्य मान कर ही हमें बर्ताव करना चाहिये। किसी ओर वाहियात संज्ञा से हमें परहेज करना चाहिये।” बंशी बाबू बताने लगे हैं। “सब आदमी अच्छे होते हैं – मैं तो यही मान कर चलता हूँ।” वो हंसते हुए बता रहे हैं। “बुरा तो उन्हें समाज और संसार बनाता है।” बंशी बाबू ने पते की बात बताई है।
और कमाल की बात तो यही है कि यहॉं आश्रम में आकर सब अच्छे बन जाते हैं। मैंने भी तो कभी यहॉं पहुँच कर पव्वे को नहीं पुकारा। जबकि भोजपुर में तो मैं पव्वे के नाम से ही पुकारा जाता था।
“ये पव्वा क्या है – तुम्हारा?” एक ग्राहक ने मेरे बड़े बेटे बबलू से पूछा था। मैंने उस ग्राहक को भरपूर निगाहों से देखा था। वो कोई संभ्रांत सज्जन लगा था।
“नौकर है हमारा।” बबलू ने उसे बताया था। “कचौड़ियां उतारता है!” साथ में उसने मेरा काम भी बताया था।
मैं उसी दिन मर जाना चाहता था।
“क्यों पी आते हो इत्ती ..?” गुलनार ने मुझे कोसा था। “जीने भी दोगे हमें कि ..?” वह रोने रोने को थी।
“मैं तो मरूंगा ..! मैं अब मर जाऊंगा ..!” बिलख कर मैंने गुलनार से कहा था और घर से बाहर कहीं मरने की जगह तलाशने निकल पड़ा था।
लेकिन मुझे कहीं भी चैन न मिला था।
और यहां आकर अचानक ही मुझे चैन मिल गया था ओर मेरी मुलाकात हुई थी इस आश्रम से जहां आचरणों का उपवन उगा था और उसमें भक्ति वैराग्य और प्रेम प्रीत के वृक्ष उगे थे। हारे थके मन को अब आ कर विश्राम मिला था। और आश्चर्य ये कि जी भर कर सुस्ताने के बाद भी उसने कभी पव्वा नहीं मांगा!
मैं इसे स्वामी पूर्णानन्द जी महाराज की कृपा ही मानता हूँ। अगर वो न होते तो मैं और गुलनार कभी न बसते और मैं यों उजड़ कर भी फिर से कभी हरा न होता!
और अब आश्रम के भक्त लोग एक तैयारी के साथ लौटते हैं संसार में और अच्छाई सच्चाई की जीने की राह पर चलते उनके मन भी भटकते नहीं हैं – मेरी तरह!
