मैं भाग रहा हूँ! मैं सर पर पैर रख कर भाग रहा हूँ! मैं गुलनार से डर कर भाग रहा हूँ। मैं मान रहा हूँ कि गुलनार अब मुझे मोहित कर लेगी, रिझा लेगी, मना लेगी और .. और अपनी आंखों में आंसू भर कर मुझे मना लेगी और हर तरह से मुझे ..

लेकिन मैं हूँ कि भाग छूटा हूँ। मैं अब गुलनार के हाथ नहीं आने का।

“भाग कर कहां जाओगे लुच्चे!” अचानक गुलनार मेरा रास्ता रोक कर खड़ी हो गई है। “हम भी तो खड़े हैं इन राहों में!” उसने अपनी चितवन को मरोड़ कर मुझ पर दे मारा है। उसकी चंचल शोख आंखों में उन्माद उमड़ आया है। उसके होंठों पर खेलती मुस्कान ने मुझे भ्रमित किया है। “मुझे भूल कैसे गये बाबू?” गुलनार पूछ रही है। “इहां बाबा बन कर आ बैठे हो!” वह हंसी है। “हमका तो धोखा मत दो!” उसने अपनी गोरी गोरी बाहें मेरे गले में डाल दी हैं!

अब हम चंद्र प्रभा के किनारे लता गाछों में लुके छुपे बैठे हैं। गुलनार ने अपना गाल मेरे कंधे पर टिका दिया है। मैंने भी गुलनार की सुघड़ उंगलियों को अपने पंजे में भर लिया है। अब हम दोनों एकाकार हैं, सहज हैं और पास पास बैठे प्रेमिल पलों में बतिया रहे हैं!

हिरनी की तरह कुलांच भरती गुलनार का मैं पीछा कर रहा हूँ। अब मैंने उसे पकड़ लिया है। बाँहों में भर लिया है। मैंने उसे जीत लिया है, हासिल कर लिया है और फिर लरजा हूँ उसके ऊपर तो उसने मुझे रोक दिया है।

“न! अभी नहीं!” मुझे वर्जती है गुलनार। “अभी तो हम अल्हड़ प्रेमी हैं।” उसने बताया है।

मैंने हमेशा से ही गुलनार की हर बात को माना है।

“अरे सुन!” मैंने उसे अचानक पुकारा है। “वो .. वो भोजपुर वाला लाला करन मल, अरे वही जिसके यहां तू गहना गढ़ाती थी!”

“हॉं हॉं! पन क्या हुआ उसे?” गुलनार ने तुनक कर पूछा है।

“इहां आश्रम में आया था!” मैंने गुलनार को बताया है। “याद है न तुझे जब मैं काम के लिए भोजपुर में भटक रहा था तो इसकी दुकान के सामने घंटों खड़ा रहा था। लेकिन ये नए नए नोट गिन गिन कर अपनी तिजोरी में भरता रहा था। तब मेरा मन कैसा कैसा हो गया था गुलनार! सब कमा रहे थे, सब मौज उड़ा रहे थे और एक मैं ही था उनमें अभागा! फिर जब इसे फुरसत मिली थी तो मैंने कहा था – लाला जी क क .. कोई काम दे देते तो? चौकीदारी ही ..”

“आगे बढ़ जाओ कह कर इस कमीने ने मुझे हरी झंडी दिखा दी थी गुलनार। उस दिन मेरा मरने को मन हुआ था लेकिन मैं तुम्हें याद करके जी गया था।”

“फिर ..?” गुलनार ने विहंस कर पूछा है।

“लाइन में लगा था। जब सामने आया तो आंखें नीची कर बड़े विनम्र भाव से बोला था – संतान नहीं है स्वामी जी! लेकिन मैंने भी आशीर्वाद का हाथ उठाने से पहले पीपल दास की ओर देखा था। आदेश नहीं का आया था तो मैंने कहा था – आगे बढ़ जाओ भाई!”

“ठीक किया!” गुलनार ने मेरी प्रशंसा की है। “गिरहकट है!” गुलनार बताती है। “संतान को ले कर ये तो ..”

अचानक मुझे भी अपने चार बेटों की याद हो आती है।

हवा का एक समर्थ झोंका आया था और सारे दृश्य को उड़ा ले गया था।

कैसा विचित्र संसार बनाया है मेरे प्रभु ने – मैं महसूसता हूँ। सब है और कुछ भी नहीं है। सब आता जाता है ओर फिर सब ठहर जाता है। विगत जाता है और आपा खो बैठता है और फिर उपयुक्त पल आते ही सब उजागर हो जाता है।

सही गलत रास्ते भी बनते बिगड़ते रहते हैं! मन की गति तो आताल पाताल नाप देती है। अचल तो ये पीपल दास भी नहीं हैं!

मैं हंस पड़ा हूँ!

मेजर कृपाल वर्मा

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