शनिवार का मुझे बेसब्री से इंतजार रहता है।

न जाने क्यों कीर्तन के इन पलों में मैं प्रभु के गुण गान में खोया और सोया सोया सा जीवन के उन सोपानों को चढ़ जाता हूँ जो अन्य प्रकार से दुर्लभ होते हैं। मन रम जाता है भक्ति में, जम जाता है पूजा में और बढ़ चढ़ कर पुकारता है ईश्वर को, आवाज देता है अपने नियंता को और उसमें एकाकार हुआ पूर्ण रूपेण लीन हो जाता है।

खूब रंग बरसता है आश्रम में शनिवार को और अच्छी भीड़ आ जाती है। हर कोई इस दिन कुछ न कुछ लेकर जाता है मेरी ही तरह – यह मैं मानता हूँ।

“आना हे भगवान हमारे हरि कीर्तन में!” धुन बज रही है। “आप भी आना गोपियों को भी लाना, आकर रास रचाना हमारे हरि कीर्तन में! आना हे भगवान ..”

धुन टूटी है तो मैंने आंखें खोली हैं और ठीक मेरे सामने आ बैठी गुलनार ने भी आंखें खोल ली हैं। हम दोनों की नजरें मिल गई हैं। लेकिन हम दोनों ने फिर से आंखें बंद कर ली हैं। ये तो चली गई थी शायद – मैंने स्वयं से पूछा है पर उत्तर उलटा ही आया है।

दुल्हन बनी गुलनार को मैंने बंद आंखों के पार पलंग पर बैठा देखा है।

अब उसे मेरा इंतजार है कि मैं घूंघट उठा कर उसके सुहाग को अमर होने का आशीर्वाद दूंगा। और मैं .. मैं .. छोटे छोटे कदमों से पलंग के पास जा रहा हूँ। अब मैं गुलनार को पा लेना चाहता हूँ, छू लेना चाहता हूँ और मैं चाहता हूँ कि हुस्न के उगे उस चांद को घूंघट से बाहर बुला लूं और खूब मीठे मीठे संवाद बोलकर उससे बतिया लूँ और बता दूं अपनी प्रेम दास्तान और अपनी ..

ये क्या! गुलनार की सिंदूर से भरी मांग और माथे पर सजी बिंदिया ने मेरा स्वागत किया है तो गुलनार ने उठ कर मेरे चरण स्पर्श किये हैं। मैंने भी गुलनार को अपनी बलिष्ठ बांहों में सहेज लिया है। वह अब पिघलने लगी है। मैं उसे समेटने लगा हूँ। एक खोज टटोल का आरंभ हुआ है तो होता ही चला गया है। हम नहीं चाहते लौटना अपने इस अभिसार पथ से और हम ..

काश उस पल का अंत ही न हुआ होता और ये पल न लौटा होता?

“क्यों कोई लेने तक नहीं आया गुलनार को?” मैंने अपने परम गुप्त पलों में चुपके से प्रश्न पूछा है – स्वयं से। “भोज पुर के बाद मैं तो माने कि पीतू तो अदृश्य है। मर गया है। फिर ये इतना बड़ा अंतराल जिसमें पीतू स्वामी पीताम्बर दास बन गया और गुलनार ..?

“प्रसाद बांटना है स्वामी जी।” शंकर ने आवाज दी है तो ही मैंने आंखें खोली हैं।

कमाल हो गया। कीर्तन ही समाप्त हो गया और मैं अब लौटा हूँ? और अब .. हॉं अभी तो गुलनार प्रसाद लेने भी सामने आएगी? फिर क्या करूं? ये मेरा कोई पाप उदय हुआ है या कि ये मेरा कोई पुण्य है जो मुझसे पृथक हो जाना चाहता है।

गुलनार प्रसाद लेने नहीं आई है तो मेरी जान में जान लौटी है। शायद .. शायद ही क्यों गुलनार को तो सब पता है। भोज पुर के बाद तो वही है इस कहानी की नायिका। मैं तो मात्र एक आश्चर्य की तरह उसे यों ही राह चलते चलते मिल गया हूँ।

ये भविष्य भी कितना निर्दयी है? खूब दौड़ाने के बाद और खूब तड़पाने के बाद भी अपनी आंखें खोलकर नहीं देता।

स्वामी पीताम्बर दास का अब आगे क्या होगा – मैं नहीं जानता और गुलनार भी नहीं जानती।

लेकिन मेरी तपस्या का क्या होगा – मैंने स्वयं से नहीं आज लोगों से ये प्रश्न पूछा है।

मेजर कृपाल वर्मा 1
मेजर कृपाल वर्मा

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