शनिवार का दिन था। आश्रम में रौनक बढ़ती चली जा रही थी। राम बाबू ढोलकिया अपनी मंडली के साथ आज कीर्तन करने आ रहा था। आस पास के लोग जमा हो रहे थे। आश्रम के लोग व्यवस्था करने की फिराक में भागे फिर रहे थे।

वंशी बाबू आज बहुत व्यस्त थे।

राम बाबू ढोलकिया मंच पर मंडली सहित पधार गए थे। उनका साज-वाज सब देशी था। हारमोनियम, ढोलक, खड़ताल तथा मंजीरों के सुर ताल के साथ उनका स्वर था जो श्रेष्ठ था। ढोलक राम बाबू स्वयं बजाते थे और यही कारण था कि वो ढोलकिया के नाम से जाने जाते थे।

स्वामी पीतांबर दास भी अपने आसन पर पधार गए थे।

“हे राम ..!” राम बाबू ढोलकिया ने सुर साधा था – लंबा सुर! आनंद की हिलोरें उठी थीं और पूरे परिवेश में व्याप्त हो गई थीं। “हे राम ..” फिर से उन्होंने पुकारा था। “हे राम .. राजा राम मेरे राम!” कीर्तन का आरंभ हुआ था और सभी जमा भक्त मुक्त स्वर में राम का नाम गाने लगे थे।

स्वामी पीतांबर दास की खोजी निगाहें उस अपार भीड़ में कहीं गुलनार को खोज रही थीं। लेकिन चलते चलते निगाहें मौन बैठे अविकार पर जा टिकी थीं। अविकार चुप बैठा था। वह गा नहीं रहा था। उसका चेहरा विद्रूप था। वह स्वयं में असहज था। वह वहां था ही नहीं।

अविकार का सतही विषयों में सुख दुख खोजता मन प्राण रम ही न रहा था कीर्तन में। उसे तो पता ही न था कि ये राम कृष्ण और राधा सीता कौन थे और क्यों उनके नाम का कीर्तन किया जा रहा था। गाइनो के इर्द गिर्द घूमता उसका सुख सौहार्द अलग था, अपूर्व था और उसे ही उसका मन बार बार चाहता था, पुकारता था और प्राप्त करने के लिए मचल उठता था।

“हंसों के बीच आ बैठा कौवा!” अचानक स्वामी पीतांबर दास के दिमाग में विचार उगा था। “बेचारा! चौंच खोले भी तो कैसे? मोती चुगना उसे आता कब है!” इंग्लैंड भेज दिया था पापा ने ताकि मैं – अविकार के बोल आ खड़े हुए थे। वही पाप हुआ इस शिशु के साथ – स्वामी जी ने निष्कर्ष निकाला था। मां बाप की की गलतियों का खामियाजा कभी कभी संतान को भोगना ही पड़ता है – वह मान रहे थे।

“तुम्हारे भी तो चार बेटे थे पीतू?” किसी ने अचानक प्रश्न पूछा था। “किस हाल में होंगे – कुछ पता है?” वह पूछ रहा था। “क्या अविकार की तरह वो भी कहीं अनाथ बने धक्के खा रहे होंगे? गुलनार ओर तुम तो ..”

स्वामी पीतांबर दास का ध्यान मुड़ा था ओर भीड़ में गुलनार को फिर से खोजने लगा था।

भक्त गण आनंद विभोर थे। राम बाबू ढोलकिया ने समा बांध दिया था। उसकी ढोलक पर पड़ती थाप ने भक्तों के मन मोह लिए थे। लेकिन स्वामी पीतांबर दास आज चाह कर भी उस रस लीला का आनंद न उठा पा रहे थे। वो तो हाथी पर बैठे अपने पिता के साथ कानी को ब्याहने जा रहे थे। नए कपड़े पहने थे। मन प्राण एक उमंग में ओतप्रोत था। नई मां के आने की उमंग में! ओर जब कानी ने उनके बचपन को रौंदा था, पिताजी शांत खड़े रहे थे और वो रात के अंधकार में गांव छोड़ कर भागे थे .. तो ..

अविकार अकेला नहीं था इस संसार में!

“गुलनार!” उनका मन हुआ था कि जोरों से आवाज देकर गुलनार को बुलाएं और पूछे – कहां है हमारे चार बेटे? कहां है बबलू और उसकी वो गड़गड़ाती बुलट मोटर साइकिल और कहां हैं .. टपलू, पपलू और चूहा – उनके बेटे?”

पीतू के गृहस्थ की नाव बही चली जा रही थी और स्वामी पीतांबर दास किनारे पर खड़े खड़े देख रहे थे! पतवार पीतू के नहीं किसी और के हाथ में लगा था।

पर गुलनार कहां थी।

Major krapal verma

मेजर कृपाल वर्मा

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