रोते बिसूरते पीतू को मैं दिलासा दे रहा हूँ।
“कौन नहीं उजड़ता, कौन नहीं मिटता, कौन नहीं मरता और हर हर मिटने, मरने और उजड़ने का कोई न कोई बहाना तो होता ही है पीतू! तुम क्या सोच रहे हो कि तुम अब अमर हो गये हो? चुटकी बजाते ही किसी दिन .. यूं ही बैठे बिठाए ..” मैं हंस रहा हूँ।
“लेकिन .. लेकिन स्वामी जी चार चार बेटे थे गुलनार के और अटूट धन था उसके पास! वो सब कैसे ..?” रुलाई टूट रही थी पीतू की।
“न आते देर लगती है और न जाते वक्त लगता है!” मैं बता रहा हूँ। “सब होता ही चला जाता है – एक स्वप्न की तरह! और जैसे ही आंख खुलती है, सब नदारद हो जाता है। सहज भाव से समझो पीतू कि आना और जाना दोनों ही अनिवार्य हैं। लेकिन जब तक हम जिंदा हैं – किसी न किसी खेल खिलवाड़ में लगे ही रहते हैं।”
“लेकिन स्वामी जी जब लोगों को पता चलेगा कि गुलनार ..?” पीतू डरा हुआ है।
“तो इसमें असत्य क्या है?” मैंने पूछा है। “बता दो सबको कि गुलनार तुम्हारी पत्नी है। कह दो कि तुम्हारे चार बेटे थे। ढोल बजाओ कि तुम पीतू हो और तुम पव्वा पीते थे। कह दो लोगों से कि तुम उजड़े – ये तुम्हारी गलती थी।”
“फिर तो हम दोनों को आश्रम छोड़ कर भागना होगा स्वामी जी ..?” पीतू पूछ रहा है। ” क्या यह रहस्य, रहस्य न रह पायेगा?”
“यहां अज्ञात तो कुछ भी नहीं है पीतू!” मैंने कहा है। “भ्रम ही है कि हमारे बारे में कोई कुछ नहीं जानता। जबकि सच तो यह है कि सब को सब पता होता है।” मैं हंस पड़ा हूँ। “विचित्र विडम्बना है पीतू कि हम सच झूठ की लुका छुपी में स्वयं ही खो जाते हैं।”
पीतू चुप है। पीतू डरा हुआ है। पीतू निर्णय नहीं कर पा रहा है कि अब वह कौन सा मार्ग चुने।
वह और गुलनार कभी एक थे – लेकिन अब एक नहीं दो हैं। कब अलग हुए, क्यों अलग हुए और कब मन फटे – पता नहीं! लेकिन दो अमर प्रेमी आज अंजान बने खड़े हैं! वो एक दूसरे को पहचानना भी नहीं चाहते, छूना तक नहीं चाहते और देखना तक दुश्वार लगता है! लेकिन क्यों?
“गुलनार को माया ने अपने जाल में फंसा लिया था।” पीतू को उत्तर मिला है। “अपने चार बेटों के अभिमान ने और जमा हुए धन माल ने उसे अपने अमर प्रेमी पीतू से जुदा कर दिया था। और यहां तक कि गुलनार ने ..” कहते कहते रुक जाता है पीतू। वह कहना नहीं चाहता कि गुलनार ने उसे ..
“उसके चाहने से मरे तो नहीं तुम?” मैंने पूछा है। “उलटे अमर हो गये हो। स्वामी पीताम्बर दास बन गये हो! और गुलनार ..?”
होश लौटा है पीतू को तो मुझमें आ मिला है।
अब पीतू प्रसन्न है। मुक्त है – काम, क्रोध और मद मोह से। जो घट गया है उसके लिए शोक करना व्यर्थ है – उसकी समझ में आ गया है।
सत्य का मार्ग ही सही मार्ग है और यही उसके जीने की राह है – वह मान लेता है।
