“ए बाई! इधर पोंछा तो छूट गया!” मैं बीमार, बेहोश बिस्तर पर पड़ी-पड़ी आवाजें सुनती। गुलनार बताने लगी थी। “ये क्या रे? तुम को तनिक भी शऊर नहीं बाई!” घर की मालकिन डाटने लगती। “गीले कपड़े से बर्तन पोंछ डाले!” वो मुझे मेरी गलती बताती। आंख खोल कर देखती तो चारों ओर सन्नाटा फैला होता। बबलू काम पर चला जाता और बहू सैर सपाटों पर निकल जाती। हलक सूख जाता। एक घूंट पानी तक ..

“बाकी के दो बेटे भी तो थे?” स्वामी जी किसी हिसाब की किताब में जा उलझे थे। “वो दोनों ..?”

“अब मैं गुलनार नहीं थी। उनकी मां नहीं रही थी। अब तो मैं बाई थी। घरों में काम करने वाली बाई!” गुलनार की आवाज से टीसें टपकने लगी थीं – वेदना की टीसें!

स्वामी जी गुलनार की इस वेदना में आकंठ आ डूबे थे। गुलनार – वो गुलनार जिसे ग्राहक मुड़-मुड़ कर देखा करते थे, वो गुलनार जिसे देखते-देखते उनकी आंखें कभी थकती नहीं थीं – वेदना के अथाह सागर में जा डूबेगी – ऐसा तो कभी सोचा भी नहीं था।

“आश्रम में कैसे पहुंची?” अचानक स्वामी जी पूछ बैठे थे।

प्रश्न के साथ ही गुलनार अपने विगत में लौटी थी।

“मर के नहीं देगी ये डायन!” बहू की आवाजें सुनने लगी थी गुलनार। “तू सगी तो किसी की नहीं है।” बहू की कर्कश आवाजें आ रही थीं। गुलनार ने पहचान लिया था कि वह उसे अपने पति पुरुष की मौत का उलाहना दे रही थी। सच भी था – उसने स्वीकारा था।

“अब तू इस घर से जा!” बहू ने ऐलान दिया था। “कर अपना मुंह काला! जहां जाए, वहां जा!” बहू रोष में थी। “चल निकल! छोड़ हमारा पिंड!” उसने गुलनार को बिस्तर से उठा कर घर से बाहर सड़क पर ला पटका था।

“गलती तो तुम्हारी ही है गुलनार!” उसका अंतर बोला था। “तुमने अपने सुहाग को संभाला नहीं! तुमने अपने सौभाग्य को सहेजा नहीं! लालच ने तुम्हें ठग लिया, मेरी बहन! गंवा बैठी अपना सर्वस्व!”

“तनिक होश था मुझे!” गुलनार स्वामी जी को बताने लगी थी। “बहू के चाहने पर भी मैं मरी नहीं थी।” गुलनार ने आंखें उठा कर स्वामी जी को देखा था।

“जैसे कि .. नदी में फिक जाने के बाद भी मैं मरा नहीं था!” स्वामी जी हंस पड़े थे। “बड़ा ही विचित्र होता है भाग्य!” स्वामी जी ने हाथ झाड़ते हुए कहा था। “कभी बुरा भला बन जाता है – तो कभी भला बुरा!”

गुलनार भी अपने गमों से ऊपर उठ आई थी।

“बीमार है बेचारी!” कोई पुरुष कह रहा था।

“ले चलते हैं इसे भी आश्रम!” किसी स्त्री ने परामर्श दी थी। “क्या पता! स्वामी जी के आशीर्वाद से ठीक हो जाए!”

“मुझे थोड़ा-थोड़ा अभी तक याद है कि आश्रम आते उन लोगों ने मात्र किसी दया वश ही मुझे साथ ले लिया था। मुझे पानी पिलाया था। मुझे चाय पिलाई थी। और ये दो घटनाएं – दो घूंट पानी पीना और गरम-गरम चाय की चुस्कियां – मेरे अंतर पर आज भी अंकित हैं – स्वामी।”

“तभी तो बुराई से अच्छाई जीत जाती है गुलनार!” स्वामी जी प्रसन्न हो कर बोले थे। “मारने वाले से जिलाने वाला ज्यादा समर्थ होता है।” स्वामी जी हंस गए थे।

प्राची में क्षितिज उद्भासित होने लगा था। नया सवेरा आने को था और अब नई-नई जीने की अनेकों राहें उजागर हो जाएंगी – गुलनार और स्वामी जी जान गए थे।

Major krapal verma

मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड

Discover more from Praneta Publications Pvt. Ltd.

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading