“आप से कुछ कहना था स्वामी जी!” वंशी बाबू आए हैं और तनिक से नाराज हैं।
पलांश में ही मैंने अपने स्वयं को टटोल कर देखा है। कहीं कोई गलती तो नहीं बन गई – मैंने सोचा है।
“ये श्री राम शास्त्री तो बहुत गलत आदमी है!” वंशी बाबू बोले हैं। “सेठ जी से मोटी दक्षिणा मिली थी। जमा नहीं कराई। अब शादी में बेटे वालों से खूब कमा लिया है। एक पैसा जमा नहीं कराया। और तो और अब लोगों को भी ठगने लगा है। किसी का हाथ देखता है तो किसी की कुंडली बनाता है।” रुके हैं वंशी बाबू। उन्होंने मुझे पढ़ा है। “आश्रम से निकालना होगा इसे?”
“रोका किसने है?” मैंने सीधा प्रश्न पूछा है।
“कल ही भगा देता हूँ।” कह कर वंशी बाबू लौट गए हैं।
मैं अपने आप को संभालने लगा हूँ। अपने वैराग्य को मैंने पास से परखा है। मैंने धन माया के बारे सोचा है। गुलनार ही थी – जो धन माया के साथ थी, मैं नहीं था। और ये धन माया ही होगी जिसने गुलनार को मुझे मृत्यु दंड देने की सलाह दी होगी? हमारे भीतर बैठे हमारे ही काम, क्रोध और लोभ हमें बहकाते रहते हैं और हम राह भूल जाते हैं।
श्री राम शास्त्री का सजीला छबीला स्वरूप मेरे सामने आ खड़ा हुआ है।
बोल चाल और हाव-भाव से ये आदमी बड़ा ही विद्वान लगता है। संस्कृत के श्लोक बोलता निरा कोई प्रकाण्ड पंडित होता है। बात चीत की विपुलता और हाव-भाव की चपलता हर किसी को धोखे में डाल देती है। मैं तो श्री राम शास्त्री से मिल कर धन्य हो गया था। मुझे तो लगा था कि आश्रम के लिए शास्त्री एक आदर्श की तरह उपलब्ध होगा और आश्रम के लोग उससे प्रेरणा लेंगे।
लेकिन शास्त्री तो लोगों से ले रहा था, उन्हें ठग रहा था।
मैंने निगाहें पसार कर आश्रम को देखा है। कितना पवित्र, निर्मल और निष्काम वातावरण है। तन मन को शुद्ध बनाने के लिए चंद्रप्रभा का शीतल जल, सूरज का शुद्ध प्रकाश और तारों की छांव – एक विचित्र सा संगम है। फिर श्री राम शास्त्री को ये सब क्यों नहीं दिखा?
“विकार!” मुझे उत्तर मिला है। “अपने विकारों का शिकार हो गया है ये आदमी! तभी तो उसे बहू-बेटों ने धक्के मार कर घर से निकाल दिया है।”
“लेकिन .. है तो विद्वान और पढ़ा लिखा! संस्कृत का ज्ञाता है और चपल ..”
“और चालाक भी है! हाहाहा! पीतू, कानी की तरह है श्री राम शास्त्री! कभी सुधरेगा नहीं!”
विचित्र माया है प्रभु की – मैं सोच रहा हूँ। संसार में सब कुछ है लेकिन हर आदमी अलग अलग देखता है! जो वंशी बाबू देखते हैं वो श्री राम शास्त्री नहीं देखता, और जो मैं देखता हूँ – वह हर किसी को दिखाई नहीं देता!
और दृष्टि को पवित्र बनाना ही जीवन का सारा खेल है!
दृष्टि संगत से उपजती है। अहंकार है तो दृष्टि भी अहंकारी होगी! लोभ है तो दृष्टि भी मतलब को ही देखती है! और अगर आप कामी हैं तो घुंघरुओं की आवाजें आपको झींगुरों के स्वरों में सुनाई देंगी। भले बुरे का सोच तो बाद की बात होती है। पहली दृष्टि में जो आदमी देखता है – महत्व उसी का होता है!
फिर श्री राम शास्त्री की पढ़ाई लिखाई ने उन्हें पवित्र और परिष्कृत क्यों नहीं बनाया? ये इतने बौने कैसे रह गए?
“प्रकृति और परमात्मा अलग से खेल खेलते हैं पीतू!” पीपल दास बताने लग रहे हैं। “प्रारब्ध में जो लिखा है – वो तो टलेगा नहीं न!” उनका कहना है। “प्रेरणा भी बही देते हैं और हम बहक जाते हैं!” मुसकराए हैं पीपल दास। “अब तुम स्वयं को ही देख लो! गुलनार का तुमने कोई बुरा तो नहीं किया? तुमने तो उसे सब कुछ दे दिया था लेकिन उसने ..?”
“हां! उसने दगा क्यों खेली – आज तक समझ नहीं आया, गुरु जी!” मैंने हाथ जोड़ दिए हैं। कोई है – जो हमें जीने की राह भी सुझाता रहता है – मैंने अनुमान लगाया है!

मेजर कृपाल वर्मा