“आओ भक्त राज!” अविकार आया था तो मैंने उसे नए नाम से पुकारा था।
“आप भी .. स्वामी जी ..” तनिक अधीर हो आया था अविकार। “सभी तो मेरा मजाक उड़ाते हैं। भक्त राज कह कर हंसते हैं!” अविकार शिकायत करने लगा था। “मुझे तो भक्ति के मतलब तक नहीं आते .. और ..”
“भक्ति तो एक भावना है भक्त राज!” मैंने हंस कर कहा था। “सत्संग से सीखी जाती है। भक्तों की संगत करोगे तो स्वयं ही समझ आ जाएगी।” मैंने अविकार का हौसला बुलंद किया था।
मुझे तो याद था जब मुझे लोगों ने स्वामी जी कहकर पुकारा था, आदर दिया था ओर मैं पीतू – एक अबोध प्राणी स्वामी जी का अर्थ न जाने कैसे समझ गया था। फिर मेरे ज्ञान चक्षु स्वयं ही खुलने लगे थे। एक विकास और एक प्रकाश मुझमें अवतरित होने लगा था। प्रभु ने मुझे स्वयं संभाल लिया था। मुझे एहसास हुआ था कि मैं उन्हीं का एक अंश था .. और ..
अविकार भी तो प्रभु का ही अंश है! प्रभु उसे अवश्य शरण दे देंगे – मेरा अटल विश्वास था।
“लेकिन मैं तो पागल हूँ स्वामी जी!” अविकार ने जार देकर कहा था।
“पागल तो तुम नहीं हो लेकिन ये कहानी क्या है?” मैंने पूछा था।
“मैं इस बेरहम जमाने की एक बेरहम कहानी का पात्र हूँ स्वामी जी!” अविकार बताने लगा था। “अब मैं अनाथ हूँ। मेरे मां बाप मानुषि और अजय अवस्थि एक भयंकर एक्सीडेंट में मारे गए। मैं तब इंग्लैंड में था। लौटा – तब तक तो अवस्थि इंटरनेशनल अमरीश अंकल के हाथों में था। मैंने जब संस्था को गाइनो के नाम लिखने का प्रयत्न किया तो कोर्ट में जाकर पता चला कि बिना अमरीश अंकल की सहमति के मैं कुछ भी नहीं कर सकता था। ये मेरे पापा अजय अवस्थि की विल थी।” अविकार चुप हो गया था। उसकी आंखों में आंसू लटक आए थे।
“लेकिन .. ये पागल ..?”
“ये गाइनो की चाल है। वो मुझे पागल बना कर अमरीश अंकल से मेरा हक ले लेना चाहती है। वह मेरी गार्जियन नियुक्त हो चुकी है।”
“लेकिन पागल न होते हुए भी – पागल ..?”
“झूठी कहानी गढ़ी है गाइनो ने!” अविकार बता रहा था। “प्रेस में देकर छपवा दी है। अब सारा दुनिया जहान मुझे पागल मानता है!”
“अमरीश अंकल ऐसा क्यों कर रहे हैं?” मैंने बात पलट दी है।
“पता नहीं स्वामी जी!” अविकार ने विवश आवाज में कहा है। “पापा और अमरीश अंकल तो गाढ़े दोस्त थे। लोग उनकी दोस्ती की कसमें खाते थे। दोनों परिवारों का इतना एका था कि हमार लंच और डिनर भी साथ साथ होता था। फिर क्या हुआ – मैं नहीं जानता। मैं तो इंग्लैंड में था और ..”
“दोनों परिवार एक दूसरे को कैसे जानते थे?” मैं पूछ बैठा हूँ।
“पापा और अंकल एक ही कंपनी में काम करते थे। पापा सीनियर इंजीनियर थे और अमरीश अंकल उनके जूनियर थे। दोनों ने कंपनी छोड़ी थी साथ साथ और अपनी अवस्थि इंटरनेशनल आरंभ की थी। देखते देखते अवस्थि इंटरनेशनल परवान चढ़ गई और .. दोनों दोस्त ..”
“लालच का पाप ..?” मैंने अनुमान लगाया है।
“शायद ..!” अविकार ने भी हामी भरी है और चुप हो गया है।
“और ये गाइनो – तुम्हारी गार्जियन ..?” न जाने क्यों मैं गाइनो पर प्रश्न चिन्ह लगा बैठा हूँ।
“पुलिस को मुझे खोजने के लिए कह रही होगी हर दिन! जिस दिन पकड़ा जाऊंगा उसी दिन पागलखाने चला जाऊंगा!” अविकार रोने रोने को है।
अब अविकार का भाग्य उसे कौन सी राह पर ले जाएगा – मैं तो इसका अनुमान भी नहीं लगा सकता!
कितनी उलझ जाती है कभी कभी – ये जिंदगी! मेरे और गुलनार के बीच भी तो पति पत्नी होने के बावजूद भी ऐसे पेच पड़ गए हैं कि हम एक दूसरे से बतिया भी नहीं सकते।
किसी के साथ कोई संबंध होना कुछ होना नहीं होता! जीने की राह तो अपनी राह जाती है!

मेजर कृपाल वर्मा