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चटखारे

indian street food


चटखारे शब्द सुनकर चेहरे पर लम्बी सी स्माइल आ जाती है, और मुहँ में पानी भर आता है। इस दुनिया में शायद ही कोई ऐसा इन्सान होगा जिसे खाने-पीने का शौक न हो। हर दिन हमारा मन होता है , कि हमारी सुबह से लेकर शाम व्यंजनों में डूब जाए,काश!कोई ऐसा जहाज घर में आकर खड़ा हो जाये जो तरह-तरह के खानों से भरा हो। हर प्रदेश का खाना बहुत अच्छे ढंग से सजा कर रखा गया हो उसमें।व्यंजन की दुनिया ही कुछ ऐसी है,जो दुनिया की सारी खूबियों में से अपनी ओर खीचनें वाली है। देखने में सुन्दर और खाने में टेस्टी खाना किसको अच्छा नहीं लगता…सुबह से शाम तक इन्सान ज़्यादातर इसी चिन्ता में घुला रहता है, कि आज सुबह यह खाया है तो दोपहर को ये होना चहिये खाने में,वगरैह-वगरैह। हाँ!मैं इस बात से सहमत ज़रूर हूँ, कि भोजन के अलावा भी दुनिया है, और ज़माने में बहुत सी और चिंताएं हैं, पर फिर भी इन्सान की सोच रोटी से शुरू होकर रोटी पर ही ख़त्म हो जाती है। बंदा चाहे अरबपति हो या फिर एक मामूली सा इन्सान पेट में केवल वही दो चार रोटी जाकर आत्मसंतुष्टि पहुंचाती हैं। अगर तरह-तरह के वयंजन की गिनती की जाये तो शायद कभी खत्म ही न हो। और जैसे ही अलग-अलग टाइप की वैरायटी का नाम आता है, तो हर आदमी की लम्बी चौड़ी लिस्ट तैयार हो जाती है। बहुत ही स्वाभाविक सी बात है, पेट है, इन्द्रियाँ है, जो हमारे वश में नहीं होती। टेस्टी खाने को देखकर कंट्रोल करना बहुत मुश्किल हो जाता है, चाहे डॉक्टर ने परहेज ही क्यों न बता रखा हो।
खैर!अगर मैं आप सभी मित्रों से अपनी खुद की बात करूं भोजन को लेकर तो मुझे खाने और बनाने दोनों का ही बेहद शौक है। एक ज़माने में बेहद चटोरी और खायु टाइप की हुआ करती थी मैं। उम्र बढ़ी, विचार बदले, और खाने रूपी इस कांसेप्ट को लेकर मेरी सोच पूरी तरह बदल गयी। चटखारों में मेरा favourite भोजन जो है, वो है…साउथ इंडियन फ़ूड। साउथ इंडियन सभी dishes मैं बहुत बेहतरीन ढ़ंग से बना लेती हूँ। यकीन मानिए मेरा हाथ का बना हुआ इडली डोसा खाकर लोग कह उठते हैं,”अरे!आपने तो कमाल ही कर दिया”। जब भी इडली डोसे या और किसी स्पेशल वयंजन की चर्चा चलती है, तो मुझे मेरे माँ-बापू याद आ जाते हैं। जब भी मैं मायके में साउथ इंडियन या और कोई भी जायका बनाया करती थी, तो माँ और बापू मेरी तारीफ़ में कहा करते थे,”अरे!तूने तो कमाल कर दिया”मेरे पिताजी के मुहँ से मेरे हाथ का बना हुआ डोसा देखकर और खाकर यह शब्द निकला करते थे,”भई वाह!आज तो तूने एकदम प्रोफेशनल डोसा बना दिया। गज़ब ही कर दिया, और सांभर तो देखो कितनी कमाल बनाई है,ऐसी सांभर तो मैंने आज तक नहीं खाई…और चटनी तो इतनी चटक है..शाबाश”माँ का नाम लेकर कहा करते थे,”हेना!कुसुमजी” माँ कह दिया करती थीं”वाकई इसके हाथ में बात है”। आज भी विवाह के पश्चात अपनी ससुराल में अपने बच्चों के लिए कुछ स्पेशल बनाती हूँ, तो मन हो जाता है कि अपने पिताजी और सभी परिवारजनों को तुरंत आमंत्रित कर लूँ। पिताजी के कहे हुए तारीफों के बोल मेरे कानों में गूँजते रहते है,जब तक मैं किसी ख़ास वयंजन की तैयारी में लगी रहती हूँ।हर लड़की का यह पहला सपना होता है,की ब्याह के बाद वो जिस भी घर में जाये उसके मायके वालों को भी बराबर का मान -सम्मान मिले..जिसकी वो सही मायने में हकदार होती है। पर हमारे भारतीय समाज में आज भी नारी शोषित है। मेरा यह अनुभव है,कि आज की नारी चाहे जितनी भी पढ़ -लिख कर बाहर क्यों न निकल गयी हो, पर फिर भी कहीं शोषित है। एक महिला ही दूसरी महिला की सबसे बड़ी दुश्मन है…कारण है, इर्ष्या जो आप को औरत जात में पक्का मिलेगी। जिस दिन औरत औरत का शोषण बन्द कर देगी उस दिन हमारे समाज का रूप बदल जायेगा। मेरे विचार से पुरुष महिला के शोषण का कारण नहीं हैं। हमारे समाज में बहुत से शोषित क्षेत्र है, मैंने अपने विचार केवल छोटे से दायरे को लेकर वयक्त किए हैं, जो कि घर गृस्त माना जाता है।
खैर!चटखारों को लेकर मेरे मन में बहुत से चटखारे आ जाते है, जैसे समोसे, आलू कचौरी इत्यादि। समोसे का जिक्र मैं ख़ास तौर पर इसलिए भी कर रही हूँ, क्योंकि समोसे खाने और बनाने में बहुत मज़ा आता है। पहले मुझे समोसे बनाने की abcd भी न आती थी। पर मुझे नई-नई चीज़े बनाने का इतना शौक है,कि मैंने समोसे बनाने सीख ही डाले। सच!सुनने में आसान लगता ज़रूर है, पर समोसा बनाने की विधि बिल्कुल आसान नहीं होती, इसकी तैयारी में मेहनत बहुत लगती है, और अगर कहीं चूक हो जाये तो समोसे महाराज कढ़ाई में ही खुल जाते हैं ,और सारे आलू तेल में स्विमिंग करने लग जाते हैं। समोसे बनाना सिखाने का क्रेडिट तो मेरे बड़े भाई साहब को जाता है, पहली बार जब मैंने अपने मायके में समोसे बनाने की कोशिश की थी, तो उन्होंने ही मुझे आईडिया दिया था,बस आईडिया कैच कर और ढ़ेर सारी प्रैक्टिस कर आज मैं समोसे भी प्रोफेशनल बना लेती हूँ। हाँ!एक बात तो माननी पड़ेगी की समोसे के आलू को कई बार मैंने भी तेल में स्विमिंग करवाई हुई है। होता!है भई सबके साथ….आख़िर बिगड़ेगा नहीं तो सुधरेगा कैसे।
कई तरह की पनीर की सब्जियां और बहुत सारी अन्य चीज़ें बनाने में भी महारत हासिल करती जा रहीं हूँ, मैं। मुझे ऐसा लगता रहता है, अपने आप से ही कि कुछ नया और टेस्टी बनाया जाए। अगले दिन क्या टेस्टी खाना बनाना है, उसे लेकर पहले से ही प्लानिंग शुरू कर देती हूँ। कभी-कभी रेसेपी से हटकर भी अपना दिमाग़ लगा लेती हूँ। सच!कहूँ तो मेरे अन्दर चौबीस घन्टे यही उधेड़-बुन चलती रहती है, कि क्या बनना है, कैसे बनाना है, और ज़्यादा टेस्टी कैसे बनेगा। मेरा दिमाग़ चारों तरफ़ से खाने पीने की चीज़ों से ही घिरा रहता है।
पहले छोटे-पन से लेकर बड़े होने तक खूब खाया पिया करती थी मैं,जो मैं आप से पहले ही बता चुकी हूँ, पर उम्र बढ़ने के साथ आज मैं अपने आप को बिल्कुल बदला हुआ पा रहीं हूँ, खुद भी नहीं समझ पाती कि अचानक इतना बदलाव कैसे आ गया है, मुझमें।खाना बनाने का शौक तो बरकरार है, उसमें कोई तब्दीली नहीं हुई है, पर भोजन खाने को लेकर आज मेरे विचार परिवर्तित हो गए है,पता नहीं क्यों, आज जब मैं अपने लिए कई तरह के बने हुए वयंजन की थाली लगती हूँ, तो मेरी आँखों के सामने समाज का वो वर्ग आ जाता है, जिसे एक वक्त की रोटी भी मुश्किल नसीब होती है।
इस सोच को मैं अपनी नेगेटिव सोच न बताते हुए समाज की गरीबी को लेकर चिंतित हो जाती हूँ,और ईश्वर से यही माँगती हूँ, कि हे!परमात्मा आप सब को रोज़गार और भर पेट भोजन मोहिया करवाओ। कोई बच्चा या बुज़ुर्ग रात को भूखे पेट न सोने पाए। युवा पीढ़ी को काम और अन्न की कोई कमी न रहे,और हमारा भारत वर्ष अमीर और खुशाल देशों में गिना जाए। पर फिर भी दोस्तों आज मेरे विचार इतने बदल गए है, की मुझे रोटी के आगे पनीर जैसा भोजन भी फीका लगता है। आज मुझे अपने नानाजी के कहे हुए शब्द याद आते हैं,कहा करते थे,”थाली में परोसा हुआ भोजन,ईश्वर के प्रसाद के समान होता है। एक बार भोजन का परमात्मा को भोग लग जाये तो उसे प्यार से गृहण कर लेना चाहिए”। उनकी बातों में जीवन की कितनी बड़ी सच्चाई छिपी है, यह आज मुझे समझ में आता है। भोजन से बड़ा कोई ईश्वर नहीं, अन्न की पूजा से बड़ी कोई पूजा नहीं होती। क्योंकि पापी पेट बहुत बड़ी चीज़ होती है,साहब!