by Major Krapal Verma | Feb 9, 2023 | जीने की राह!
श्री राम शास्त्री आश्रम में फिर लौट आए थे। शंकर ने तनिक चौंक कर उन्हें देखा था और स्वयं से प्रश्न पूछा था – इनके उस चालाक चेहरे और चोर निगाहों का क्या हुआ? “मैंने वंशी बाबू से विनय की थी, स्वामी जी!” श्री राम शास्त्री का स्वर विनम्र था। “मुझे...
by Major Krapal Verma | Jan 27, 2023 | जीने की राह!
कोर्ट में अविकार की गवाही होनी थी। लेकिन गुनहगार गाइनो अभी तक पहुंची नहीं थी। अविकार और अंजली अनासक्त भाव से कुर्सियों पर बैठे थे। अविकार का मन डर-डर कर गाइनो ग्रीन के बारे सोचने लगता। लगता – गाइनो कोई ग्रह थी – अनिष्टकारी ग्रह जो उसके ऊपर आ चढ़ी थी। पढ़े...
by Major Krapal Verma | Jan 24, 2023 | जीने की राह!
अवस्थी इंटरनेशनल की दुर्दशा देख अविकार कांप उठा था। एक भूली बिसरी याद सी संस्था अचानक ही अविकार के दिमाग में उठ बैठी थी। कभी चमकती दमकती अवस्थी इंटरनेशनल आज मटमैली और मैली कुचैली लगी थी अविकार को। कहीं शेड टूट रहा था तो कहीं दीवार खिसक गई थी। सड़कें टूटी फूटी थीं तो...
by Major Krapal Verma | Jan 21, 2023 | जीने की राह!
पुनर्जन्म जैसा था वानप्रस्थ। एक यात्रा के बाद दूसरा यात्रा आरंभ था। अमरीश और सरोज आश्रम में साथ-साथ रह रहे थे लेकिन थे जुदा, अलग, असंपृक्त! अमरीश पुरुषों के साथ रहने लगे थे तो सरोज नारी निकेतन में थी। दोनों मिलते जुलते रहते थे लेकिन अजनबी की तरह। कभी अमरीश ठहर कर दो...
by Major Krapal Verma | Jan 17, 2023 | जीने की राह!
“साब! पागलखाने से हरकारा आया है!” दरबान ने सूचना दी थी। अविकार और अंजली बगीचे में बैठे चाय पी रहे थे। दरबान का लाया समाचार अविकार के जेहन के आर पार गोली की तरह निकल गया था। पागलखाने का हरकारा उसका पीछा करता यहां तक पहुंच गया था। अविकार हैरान था। वह डर गया...
by Major Krapal Verma | Jan 15, 2023 | जीने की राह!
एक अमंगल की तरह श्री राम शास्त्री अनायास ही स्वामी जी के सामने आ खड़े हुए थे। श्री राम शास्त्री ने स्वामी जी के चरण न लेकर एक चलता सा प्रणाम किया था। स्वामी जी ने भी देख लिया था कि श्री राम शास्त्री अभी भी अपनी आकांक्षाओं और महत्वाकांक्षाओं के घेरे में बंधे हुए थे।...