by Major Krapal Verma | Mar 5, 2023 | जीने की राह!
“जमाना उलटे पैरों चलता है अमरीश जी!” श्री राम शास्त्री अपना अनुभव बताने लग रहे थे। “मेरा अकेला बेटा था। अंगूरी कहती – इसी को लंबी उम्र दे परमात्मा। पढ़ा लिखा लेते हैं। नौकरी से लगा देंगे। ब्याह कर देंगे और बस। बड़ा ही सीमित संसार बसाया था हमने।...
by Major Krapal Verma | Mar 1, 2023 | जीने की राह!
“मैं तो हैरान हूँ जी!” सेठानी सरोज चंद्रप्रभा के किनारे अमरीश जी के साथ बैठी बतिया रही थी। इतवार था। दोनों साथ-साथ सैर-सपाटे कर रहे थे। खैर कुशल के बाद वो एक दूसरे के मन की बात भी सुनते थे। “ऐसी-ऐसी दर्द भरी कहानियां हैं इन श्रद्धालुओं की – सुन...
by Major Krapal Verma | Feb 23, 2023 | जीने की राह!
इतवार का दिन था। अवस्थी इंटरनेशनल के प्रांगण में भीड़ बढ़ती जा रही थी। नए पुराने सभी लोग थे। सभी की आंखों में बुझे-बुझे सपने थे। सभी एक आशा निराशा की जंग लड़ रहे थे। सब चुप थे। एक काना-फूसी चल रही थी। अपने-अपने कयास हर कोई लगा रहा था। उल्लास या खुशी की कोई उमंग वहां...
by Major Krapal Verma | Feb 18, 2023 | जीने की राह!
अपने एकांत में बैठे स्वामी पीतांबर दास आज अपने वैराग्य को नए पैमाने से नाप रहे थे। अमरीश जी ने जैसे उन्हें नए नेत्र प्रदान किए थे और दुनिया को फिर से देखने को कहा था। कहा था – धन को स्वार्थ के बजाए परमार्थ में लगा दिया जाए तो फलता फूलता है। धन को अगर संचित कर...
by Major Krapal Verma | Feb 15, 2023 | जीने की राह!
“ये आप की तरह संत नहीं है!” वंशी बाबू का स्वर तीखा था। “ये शठ है – कोरा शठ!” उन्होंने श्री राम शास्त्री की ओर उंगली उठाई थी। “अमरीश जी! ये आदमी जानता है कि आश्रम के पास पैसा है। इसे पैसा चाहिए। संस्कृत महाविद्यालय तो बहाना है...
by Major Krapal Verma | Feb 13, 2023 | जीने की राह!
आज शनिवार था। अंजली और अविकार अमरपुर आश्रम जा रहे थे। कार अविकार चला रहा था। अंजली शांत भाव से साथ वाली सीट पर बैठी थी। लेकिन अविकार के अंदर एक तूफान उमड़-उमड़ कर अंदर आ रहा था। लग रहा था कोई भूचाल था – जो धरा धाम को हिलाए दे रहा था। सारी भक्ति की शक्ति लगा कर...