जीने की राह एक सौ चौबीस

जीने की राह एक सौ चौबीस

“ए बाई! इधर पोंछा तो छूट गया!” मैं बीमार, बेहोश बिस्तर पर पड़ी-पड़ी आवाजें सुनती। गुलनार बताने लगी थी। “ये क्या रे? तुम को तनिक भी शऊर नहीं बाई!” घर की मालकिन डाटने लगती। “गीले कपड़े से बर्तन पोंछ डाले!” वो मुझे मेरी गलती बताती। आंख...
जीने की राह एक सौ चौबीस

जीने की राह एक सौ तेईस

रात ढलती आ रही थी। आसमान पर चांद उग आया था। चंद्रप्रभा में नाचती चांद की तस्वीर हम दोनों से ठिठोली कर रही थी। ज्यों-ज्यों जीवन के रहस्य हमारे सामने उजागर हो रहे थे त्यों-त्यों हम दोनों बौखलाते जा रहे थे। झींगुरों के स्वर वेद मंत्रों की तरह हमें सांत्वना देने में सहयोग...
जीने की राह एक सौ चौबीस

जीने की राह एक सौ बाईस

“तुम्हें नदी में फेंकने के बाद एक अजीब सा हर्षोल्लास था परिवार के बीच! एक विजय भाव था चारों बेटों के चेहरों पर। ऐसा लगा था मानो उन्होंने अपने किसी जन्मजात दुश्मन को सावधानी से, चालाकी से और मिलकर समाप्त कर दिया हो।” गुलनार बता रही थी। “ये योजना किसने...
जीने की राह एक सौ चौबीस

जीने की राह एक सौ इक्कीस

तारों की छांव तले, खुले आसमान के नीचे, चंद्रप्रभा के किनारे बनी कुटिया में आज पीतू और गुलनार फिर से मिल रहे थे। दोनों के मनों में भूडोल भरा था। दोनों अतिरिक्त रूप से सजग थे। दोनों के बीच बहुत कुछ घट गया था। बहुत कुछ था जिसे दोनों फिर से जान लेना चाहते थे। जहां उनका...
जीने की राह एक सौ चौबीस

जीने की राह एक सौ बीस

चोर औरत गुलनार के साथ आते स्वामी पीतांबर दास को देख शंकर हैरान था। “बैठो!” सामने पड़े मोढ़े पर गुलनार से बैठने का आग्रह किया था स्वामी जी ने। “शंकर! जल पिलाओ हम दोनों को!” स्वामी जी ने दूसरे मोढ़े पर बैठते हुए कहा था। जल पिलाते वक्त शंकर ने गौर...
जीने की राह एक सौ चौबीस

जीने की राह एक सौ उन्नीस

वंशी बाबू को अपने परास्त हुए मन प्राण में तनिक सी जान लौट आई लगी थी। पुलिस को बुलाओ – यह स्वामी जी की दहाड़ अभी तक उनके कानों में गूंज रही थी। आज पहली बार उन्होंने स्वामी जी का रौद्र रूप देखा था। आज पहली बार लगा था कि स्वामी जी भी कठोर आदेश दे सकते थे। गुलाबी...