जीने की राह बावन

जीने की राह बावन

चंद्रप्रभा के पानी का तोड़ बहुत था। मैं फूल सा हल्का-फुल्का मझधार में बहता ही चला जा रहा था। कभी मैं डूब जाता तो कभी ऊपर तैर आता। कभी दो चार घूंट पानी पी जाता तो कभी ऊपर आ कर सांस साध लेता। हाथ पैर मारता तो पानी के ऊपर तैरने लगता और हिम्मत हारने लगता तो डूबने लगता! तब...
जीने की राह इक्यावन

जीने की राह इक्यावन

गुलनार उस दिन बहुत खुश थी। उसने आज फिर अपनी अंतर वीथी से नोट निकाले थे और मुझे दे दिए थे। मैंने कई पलों तक गुलनार की आंखों को पढ़ा था। उन में कोई उदासी नहीं थी लेकिन उल्लास था – न जाने कैसा उल्लास! परिवार आज भोजपुर छोड़ कर अमरपुर जा रहा था। फिर गुलनार का वो...
जीने की राह पचास

जीने की राह पचास

भोर होते ही मुझे भोजपुर की वो भोर याद हो आती है जब हमारे परिवार के पराभव ने दस्तक दी थी। दो चार सरकारी आदमी आए थे। बबलू से बहस कर रहे थे। उनका कहना था कि जो भी हमने घर मकान बनाए थे वो जमीन सरकारी थी, मंदिर की नहीं थी। बबलू जिद करता रहा था कि हमने मंदिर को पूछ कर ही...
जीने की राह पचास

जीने की राह उनचास

मैं गुलनार और उसके परिवार के लिए मनहूस सिद्ध हो गया था। जो भी अशुभ या अन्यत्र घट जाता था उस सबके लिए पव्वा ही जिम्मेदार था। परिवार की आन बान शान को डुबोने का जुर्म केवल ओर केवल मुझे ही था। मैं ही था जिसकी वजह से बबलू की सगाई टूटी थी और .. “वो बहुत अच्छे लोग थे,...
जीने की राह पचास

जीने की राह अड़तालीस

आज शनिवार को भजनानंदी गुरु विशाल आश्रम में कीर्तन करने पधार रहे थे। वंशी बाबू इस तरह के भजन कीर्तन के समारोह करते रहते थे। बड़ी ही शुभ घड़ी होती थी जब लोग इकट्ठे होते थे और भजन कीर्तन का आनंद उठाते थे। सारा आस पास प्रफुल्लित हो उठता था। प्रभु की महिमा गाते गाते भक्त...
जीने की राह पचास

जीने की राह सैंतालीस

“एक कट्टा मैदा कम लग रही है।” बबलू गुलनार को बता रहा था। “मौसम नरम चल रहा है। गरम गरम कचौड़ियां तभी सुहाती हैं जब ..” गुलनार बबलू को समझा रही थी। लेकिन मैंने सुनते ही बीमारी की नब्ज पकड़ ली थी। कचौड़ियों की सेल डूब रही थी। इसलिए कि कचौड़ियों का...