by Major Krapal Verma | Oct 4, 2022 | जीने की राह!
अकेला बैठा अविकार अनवरत बहती चंद्रप्रभा को देख रहा था – अपलक। “यार अवि!” अचानक ही वह गंगू की आवाजें सुनने लगा था। “अगर तू भागने में सफल हो जाए .. और ..” उसने याचक निगाहों से अविकार को देखा था। “मुझे भी इस नरक से निकाल लेना .....
by Major Krapal Verma | Oct 2, 2022 | जीने की राह!
विस्मय से भरी आंखों से स्वामी पीतांबर दास सामने से आते एक सन्यासी को देख रहे थे। कोई ऋषि कुमार जैसा था। उसकी कंचन काया दमक रही थी। मस्त गजराज की चाल चल गत में अभिमान था। काले घुंघराले बाल और छोटी छोटी दाड़ी मूँछें बड़ी ही मोहक लग रही थीं। डूबते सूरज की ललौंही आभा ने...
by Major Krapal Verma | Sep 28, 2022 | जीने की राह!
प्रवहमान चंद्रप्रभा को देखते ही मेरे जेहन में कामातुर नदियां बह निकलती हैं। मैं हूँ। गुलनार है। दोनों निर्वस्त्र हुए नदी की स्वच्छ जलधारा में तैर रहे हैं – किलोंलें कर रहे हैं। गुलनार हंस रही है। मेरा मन फूला नहीं समा रहा है। मैं झपटा हूँ और मैंने गुलनार को पकड़...
by Major Krapal Verma | Sep 16, 2022 | जीने की राह!
वंशी बाबू के साथ मैंने आज आश्रम के तीन चक्कर लगा दिए थे। फिर भी मेरी आंखें प्यासी थीं, मन उदास था और मेरे जीने की उमंग नदारद थी। मैं फिर भी नहीं चाहता था कि मेरी तलाश का अंत आ जाए। वंशी बाबू ने कई बार मेरी आंखों में झांका था लेकिन मैंने निगाहें चुरा ली थीं और मौन ही...
by Major Krapal Verma | Sep 8, 2022 | जीने की राह!
शनिवार का दिन था। आश्रम में रौनक बढ़ती चली जा रही थी। राम बाबू ढोलकिया अपनी मंडली के साथ आज कीर्तन करने आ रहा था। आस पास के लोग जमा हो रहे थे। आश्रम के लोग व्यवस्था करने की फिराक में भागे फिर रहे थे। वंशी बाबू आज बहुत व्यस्त थे। राम बाबू ढोलकिया मंच पर मंडली सहित पधार...
by Major Krapal Verma | Sep 6, 2022 | जीने की राह!
चंद्र प्रभा में डुबकी लगाना और लंबे पलों तक पानी में पड़े रहना अविकार को अच्छा लगने लगा था। पेट भर पानी पीने से उसे स्वास्थ्य लाभ हुआ लगा था। शरीर खुलने लगा था और मन अचानक ही प्रसन्न रहने लगा था। आस पास के रमणीक कुंजों और लता गाछाें के झुरमुटों में अविकार अकेला ही...